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Monday, April 22, 2019

खतरनाक है यह लत


शक्कर या मिठाइयाँ खाने की लत बच्चों के स्वास्थ्य को बहुत हानि पहुँचाती है | इससे चिड़चिड़ापन, मोटापा, दाँतों में दर्द व सडन होना आदि अनेक समस्याएँ पैदा होती हैं | 

इनके बदले बच्चों को ऐसे खाद्य पदार्थ दिये जायें जिनसे उन्हें प्राकृतिक शर्करा पाप्त हो | जैसे – किसमिस, खजूर, शुद्ध शहद, अंजीर आदि | इससे जिन बच्चों की ज्यादा शक्कर खाने की आदत हो उनकी वह आदत भी छूटेगी और स्वास्थ्य-रक्षा भी होगी | 

नमक का सेवन भी अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए |

लोककल्याणसेतु – एप्रिल २०१९ से      

बल व भूखवर्धक एवं स्वास्थ्य-संरक्षक फल – बेल


ग्रीष्म ऋतू में सामान्यत: जठराग्नि मंद तथा शारीरिक दुर्बलता रहती है | बेल इन दोनों समस्याओं में लाभदायी है | यह हलका व पाचक होने के कारण आसानी से पच जाता है | यह भूख बढ़ाता है तथा बलवर्धन भी करता है | अत: ग्रीष्म ऋतू में बेल का सेवन विशेष लाभदायी है | यह कसैला, कड़वा एवं मल को बाँधनेवाला है | इसमें विटामिन बी -१, बी -२ व सी तथा फाँस्फोरस, कैल्शियम आदि पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में होते हैं | बेल आँव, मरोड़, संग्रहणी आदि पेट के रोग तथा उलटी, बवासीर, मधुमेह, वातरोग, पीलिया, सूजन, कान के रोग, बुखार आदि में लाभदायी है | यह कमजोर पाचनशक्ति व पेट की खराबी से बार-बार होनेवाले दस्त, खुनी बवासीर एवं आँतों के घाव को दूर कर आँतों की कार्यशक्ति बढ़ाता है | पके बेल की अपेक्षा कच्चा बेल विशेष गुणकारी होता है |

कच्चे बेल के गुदे से बनाये गये ‘बेल चूर्ण’ का सेवन कर बेल से होनेवाले स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त कर सकते हैं |
बेल चूर्ण की सेवन-विधि : २ से ५ ग्राम चूर्ण आधा या १ गिलास पानी में मिला के दिन में १ या २ बार ले सकते हैं |

बेल-पत्र के लाभ :

बेल के पत्ते ह्रदय के लिए हितकर, वायुशामक तथा सूजन, बुखार, कफ व शरीर की दुर्गंध को दूर करते हैं | ये रक्तस्राव को रोकने तथा पेशाब की शर्करा व गर्भाशय की सूजन कम करने में लाभदायी हैं |

पूज्य बापूजी द्वारा बताये गये सुंदर प्रयोग

बेल-पत्तों से जो गंध निकलती है वह अजीर्ण को, मंदाग्नि को ठीक करती है | बेल-पत्ते छाया में सुखा दिये व
कूट के उनका चूर्ण बना दिया | ५० ग्राम यह चूर्ण तथा ५०-५० ग्राम धनिया व सौंफ का चूर्ण – सबको मिला के रख दिया | रात को ५ – ७ ग्राम चूर्ण भिगा दिया, सुबह जरा हिला के पी लिया | आँखें जलती हों, नींद नहीं आती हो, मधुमेह हो तो ये तकलीफें ठीक हो जायेंगी | लड़का –लडकी ठिंगने हैं तो उन्हें रोज पिलाओ, कद्दावर हो जायेंगे | अथवा बच्चे प्रतिदिन ६ बेल-पत्र और १-२ काली मिर्च चबाकर खायें तो कद बढ़ेगा |

ध्यान दें : १] बेल के पके फल भारी तथा दोषकारक होते हैं, इनका अधिक मात्रा में तथा बवासीर में अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए |
२] पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है |
३] चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति और सोमवार को तथा दोपहर के बाद बिल्वपत्र न तोड़ें | बिल्वपत्र छ: मास तक बासी नहीं माने जाते |

लोककल्याणसेतु – अप्रैल २०१९ से

बद्धपद्मासन


इसमें पूरा शरीर हाथों व पाँवों द्वारा बँध जाने से यह ‘बद्धपद्मासन’ तथा गरिष्ठ भोजन जल्दी पचाने में सक्षम होने से ‘भस्मासन’ भी कहलाता है |

लाभ : पद्मासन से होनेवाले अनेक लाभ इस आसन से भी मिलते हैं | इसके नियमित अभ्यास से –
१] ह्रदय, फेफड़े, जठर, यकृत व मेरुदंड की दुर्बलता दूर होती है एवं हाथ, पैरों के तलवे, घुटने मजबूत होते हैं |
२] पेट की बीमारियों से सुरक्षा होती है | पेट के अधिकांश रोग जैसे अजीर्ण, अफरा, पेटदर्द तथा प्लीहा व यकृत के विकार दूर होते हैं |
३] हड्डियों का बुखार भी चला जाता है |
४] हर्निया में बहुत लाभ होता है |
५] स्रियों की गर्भाशय की बहुत-सी बीमारियाँ दूर होती है | संतानोत्पत्ति के बाद पेट पर जो निशान पड़ने लगते हैं वे दूर होते हैं |
६] जिन्हें शरीर के किसी अंग में पसीना न आता हो, जिसके कारण बीमारी का भय हो, उन्हें यह आसन जरुर करना चाहिए |

विधि : बायें पैर को उठाकर दायीं जंघा पर तथा दायें पैर को बायीं जंघा पर इस प्रकार लाये कि दोनों पैरों की एड़ियाँ नाभि के नीचे आपस में मिल जायें | फिर बायें हाथ को पीछे से ले जाकर बायें पैर के अँगूठे को पकड़ें तथा दायें हाथ को पीछे से ले जा के दायें पैर के अँगूठे को पकड़ें | मेरुदंडसहित सम्पूर्ण शरीर को सीधा रखते हुए स्थित रहें | श्वास दीर्घ, दृष्टी नासाग्र (नासिका के अग्र भाग पर ) व ध्यान भी वही हो (देखें चित्र – १ )| 

इस आसन को दूसरी विधि से भी किया जाता है, जिसमे उपरोक्त स्थिति के बाद सिर को जमीन से लगाकर यथासाध्य रोके रखना होता है  (देखें चित्र -२ ) |






इस आसन को पैर बदलकर भी करना चाहिए |

समय : सामान्यत: १ मिनट; कमश: बढ़ाकर १० मिनट तक कर सकते हैं |

लोककल्याणसेतु – एप्रिल २०१९ से   

Monday, April 8, 2019

पुण्यदायी तिथियाँ




२३ अप्रैल : मंगलवारी चतुर्थी (सूर्योदय से दोपहर ११-०४ तक )




२५ अप्रैल : पूज्य बापूजी का ८२ वाँ अवतरण दिवस




३० अप्रैल : वरूथिनी एकादशी (सौभाग्य, भोग, मोक्ष प्रदायक व्रत; १०,००० वर्षों की तपस्या के समान फल व माहात्म्य पढ़ने – सुनने से १०००० गोदान का फल )

७ मई : अक्षय तृतीया (पूरा दिन शुभ मुहूर्त )  ( स्नान, दान, जप, तप, हवन आदि का अनंत फल )

१५ मई : मोहिनी एकादशी ( उपवास से अनेक जन्मों के मेरु पर्वत जैसे महापापों का नाश ), विष्णुपदी संक्रांति (पुण्यकाल : सूर्योदय से दोपहर ११-३० तक ) (ध्यान, जप व पुण्यकर्म का लाख गुना फल )

१७ -१८ मई : वैशाख शुक्ल त्रयोदशी से वैशाखी पूर्णिमा तक का प्रात: पुण्यस्नान सम्पूर्ण वैशाख मॉस – स्नान का फल व गीता पाठ अश्वमेध यज्ञ का फल देता है |

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१९ से

गर्मियों में स्वास्थ्य-सुरक्षा हेतु


क्या करें ?
१] गर्मी के कारण जिनको सिरदर्द व कमजोरी होती है वे लोग सूखा धनिया पानी में भिगा दें और घिस के माथे पर लगायें | इससे सिरदर्द और कमजोरी दूर होगी |

२] नाक से खून गिरता हो तो हरे धनिये अथवा ताजी कोमल दूब (दूर्वा) का २ – २ बूँद रस नाक में डालें | इससे नकसीर फूटना बंद हो जायेगा |

३] सत्तू में शीतल जल, मिश्री और थोडा घी मिलाकर घोल बना के पियें | यह बड़ा पुश्तिदायी प्रयोग है | भोजन थोडा कम करें |

४] भोजन के बीच में २५ – ३५ मि. ली. आँवले का रस पियें | ऐसा २१ दिन करें तो ह्रदय व मस्तिष्क की दुर्बलता दूर होगी | ( शुक्रवार व रविवार को आँवले का सेवन वर्जित है | )

५] २० मि. ली. आँवला रस, १० ग्राम शहद, ५ ग्राम घी – सबका मिश्रण करके पियें तो बल, बुद्धि, ओज व आयु बढ़ाने में मदद मिलती है |

६] मुँह में छाले पड गये हों तो त्रिफला चूर्ण  को पानी में डाल के कुल्ले करें तथा मिश्री चूसें | इससे छाले शांत हो जायेंगे |

क्या न करें ?
१] अति परिश्रम, अति कसरत, अति रात्रि-जागरण, अति भोजन व भारी भोजन नहीं करें | भोजन में लाल मिर्च व गर्म मसालों का प्रयोग न करें |

२] गर्मियों में दही भूल के भी नहीं खाना चाहिए | इससे आगे चल के नस-नाड़ियों में अवरोध उत्पन्न होता है और कई बीमारियाँ होती हैं | दही खाना हो तो सीधा नहीं खायें, पहले उसे मथ के मक्खन निकाल लें और बचे हुए भाग को लस्सी या छाछ बना के मिश्री मिला के या छौंक लगा के सेवन करें | ध्यान रहे, दही खट्टा न हो |

३] बाजारू शीतल पेयों से बचें | फ्रिज का पानी न पियें | धूप में से आकर तुरंत पानी न पियें |

४ ] अति मैथुन से बुढापा जल्दी आयेगा, कमजोरी जल्दी आयेगी | अत: इससे दूर रहें | ग्रीष्म ऋतू में विशेषरूप से संयम रखें |


ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१९ से

गर्मी के प्रकोप से बचने हेतु


गर्मियों के प्रकोप से बचने तथा हाथ-पैर व आँखों की जलन आदि समस्याओं से छुटकारा पाने में मददरूप कुछ लाभकारी प्रयोग :
१] पलाश शरबत का दिन में एक से दो बार सेवन करें |
२] १ से २ चम्मच गुलकंद सुबह-शाम दूध अथवा पानी से लें |
३] १ कप गुनगुने पानी में १५ मि.ली. आँवला रस, १० – १० ग्राम घी व मिश्री मिला के लें |
४] पलाश के फूलों का रंग पूरे शरीर पर मल के कुछ मिनट बाद ( १० मिनट बाद ) स्नान करें | महीने में ३ – ४ बार ऐसा करने से गर्मी-संबंधी शिकायते चली जायेंगी |
उपरोक्त में से कोई भी प्रयोग करें |
(गुलाब व ब्राह्मी शरबत एवं सेब, लीची, अनानास व संतरा पेय, मैगों ओज आदि का प्रयोग भी गर्मियों में ताजगी, स्फूर्ति व शीतलता प्रदायक है | ये सभी व उपरोक्त उत्पाद सत्साहित्य सेवाकेन्द्र व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |)

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१९ से

इससे आपके घर में सुख-शांति की वृद्धि होगी


संध्या के समय घर में किसीको सोना नहीं चाहिए | उस समय घर के प्रत्येक कक्ष में कुछ देर के लिए रोशनी अवश्य कर दें | यदि सम्भव हो तो बीमार व्यक्ति भी भले बिस्तर पर ही सही, निद्रा त्यागकर बैठ जाय | सभी लोग मन-ही-मन भगवन्नाम का सुमिरन करें | इससे घर में सुख-शांति की वृद्धि होती है |

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१९ से

प्राकृतिक नियमों का करें पालन, बना रहेगा स्वस्थ जीवन ( भाग २)


५] बैठने – चलने का सही ढंग : गलत ढंग से बैठने, खड़े होने या चलने से हमारी कार्यक्षमता व जीवनीशक्ति की हानि होती है | अत: इस संदर्भ में कुछ बातों का ध्यान रखें :
ü दोनों नितम्ब बैठनेवाले स्थान पर समानरूप से रखने चाहिए |
ü रीढ़ की हड्डी अपने प्राकृतिक झुकावोंसहित सीधी रहनी चाहिए | इससे शरीर की सभी नस-नाड़ियाँ, जो शरीर के सभी भागों को शक्ति देती हैं, वे अच्छी तरह से कार्य करती है | मेरुदंड सीधा नहीं रखने से इन नाड़ियों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है | इसका बुरा प्रभाव शरीर के अन्य अंगो पर पड़ता है और वे सामान्यरूप से कार्य नहीं करते हैं | जब शरीर सीधा रखा जाता है तो छाती उभरी रहती है | इसके गोलाकार और फैले रहने से ह्रदय और फेफड़ों के के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है, जिससे वे अपनी पूरी कार्यक्षमता से कार्य कर पाते हैं |
ü सिर को ऐसी सीधी स्थिति में रखना चाहिए कि गर्दन के आगे और पीछे के भाग की मांसपेशियाँ दबाव या तनाव रहित रहें |

६] आवेगों को न रोकें : कक्षा में पढ़ते समय कई विद्यार्थी मल-मूत्र के आवेगों को रोके रखते हैं | अधिक समय तक मल को रोकने से वह सड़ने लगता है तथा आगे चलकर उसका निष्कासन करनेवाले अंग दुर्बल हो जाते हैं और निष्कासन-समय होने पर भी हमें संकेत नहीं दे पाते, जिससे कब्ज, पेट के रोग, कृमि, जोड़ों का दर्द, सिरदर्द, यकृत व गुर्दों के रोग जैसी अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं | शौच आदि से निवृत्त होकर ही विद्यालय या कार्यालय जायें तथा मल-मूत्र को न रोकें |

७] ब्रह्मचर्य – पालन : जिन्हें बल, बुद्धि, स्वास्थ्य, एकाग्रता व प्रसन्नता चाहिए हो, उन्नत जीवन जीना हो तथा जीवन के महानतम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति करना हो, उन्हें वीर्यक्षय न हो इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए | जो फ़िल्में, सीरियल, अश्लील वेबसाइट्स देखते हैं, कामोत्तेजक साहित्य पढ़ते हैं, लडकियाँ लडकों से व मजाक या स्पर्श करते हैं वे उपरोक्त बातों में सफल नहीं हो पाते और पतन, तबाही के शिकार हो जाते हैं | उनका जीवन ओज-तेजहीन, उत्साह व शक्ति हीन होने लगता है तथा नपुंसकता की तरफ घसीटा जाता है | अत: ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ पुस्तक का नित्य पठन कर ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करें |

८] जैविक घड़ी पर आधारित दिनचर्या : अच्छे स्वास्थ्य की उत्तम कुंजी है जैविक घड़ी पर आधारित दिनचर्या | इसके अंतर्गत प्रात: ३ से ५ बजे के बीच प्राणायम, ५ से ७ के बीच मलत्याग, ७ से ९ के बीच सम्भव हो तो दूध ( भोजन से २ घंटे पूर्व) या फलों के रस का सेवन, ९ से ११ के बीच भोजन, शाम ५ से ७ के बीच भोजन, रात्रि ७ से ९ के बीच अध्ययन तथा ९ से ३ बजे तक नींद लेना विशेष लाभकारी है | पूज्य बापूजी द्वारा बतायी गयी यह दिनचर्या सर्वांगीण विकास में बहुत सहायक है |

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१९ से