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Monday, February 14, 2022

होली

 

होली : १७ मार्च, धुलेंडी : १८ मार्च

होली ऋतू-परिवर्तन का उत्सव है | होली के बाद २०-२५ दिन नीम के २५-२० कोमल पत्ते और १-२ काली मिर्च खानी चाहिए तथा १५-२० दिन बिना नमक का अथवा बहुत ही कम नमकवाला भोजन करना चाहिए, जिससे वर्षभर स्वास्थ्य की सुरक्षा रहे |


    ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

महाशिवरात्रि व्रत की महिमा

 


महाशिवरात्रि – १ मार्च २०२२

भगवान् शिवजी कहते हैं कि ‘जो सांगोपांग से ( विधि-विधानसहित), संयम से, ब्रह्मचर्य – व्रत पालकर, झूठ-कपट का त्याग करके महाशिवरात्रि का व्रत करता है उसको वर्षभर की शिव-पूजा का फल होगा |’ तो लोगों को फल होता है |

महाशिवरात्रि व्रत का फल

सूतजी शौनकजी से कहते हैं : ‘जिनको आत्मज्ञान का सत्संग श्रवण – मनन को नहीं मिलता है उनको विधिपूर्वक श्रद्धा-भक्ति से शिव-पूजा, शिव-व्रत करना चाहिए | श्रद्धा-भक्ति से किया हुआ शिवजी का पूजन-सुमिरन देर-सवेर उनको आत्मशिव कि विद्या देनेवाले सत्संग में पहुँचा देता है और सत्यस्वरूप व्यापक शिव का साक्षात्कार करा देता है |’

घर को ही बना लें शिवालय     

आप अपने घर में साधन-भजन, पूजा का एक ऐसा कमरा बनाइये जिसमें संसार कि खटपट न हो | फिर वहाँ शिवलिंग की स्थापना करते हैं तो ठीक है अथवा भगवान जिनके ह्रदय में नृत्य कर रहा है, वाणी उच्चार रहा है ऐसे किन्ही ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का श्रीचित्र लगा दो जिनमें आपकी श्रद्धा है | रोज थोडा-बहुत ध्यान, जप करिये | कभी- कभार उधर फुल रख दें, दिया जला दें, धूप कर दें | धूप रसायन युक्त कृत्रिम सुगंधवाली अगरबत्तियों का नहीं, ये तो गडबड करती हैं, देशी गाय के गोबर के कंडे के ऊपर थोडा गूगल रख दें या कोयले के ऊपर थोड़ी हबन—सामग्री रख दें अथवा गौ-चंदन धूपबत्ती जला दें | वहाँ आप नियम से मंत्रजप, साधन-भजन करेंगे तो उस जगह को आप थोड़े ही दिनों में शिव मन्दिर पायेंगे |

 

फिर जब संसार कि विडंबना, मुसीबतें आयें तो आप हाथ-पैर धो के उस पूजा के कमरे में आकर थोड़ी प्रार्थना करें | ५ – ७ मिनट ॐकार का दीर्घ उच्चारण करके मानसिक जप व ध्यान करें | यदि रात्रि का समय है तो ध्यान करते-करते ध्यान का जो भाव बना है उसी भाव  शयन कर लें | रात्रि को स्वप्न में आपके प्रश्न का उत्तर आ जायेगा, नहीं तो प्रभात को जरुर आयेगा | एक दिन नहीं तो दूसरे दिन आयेगा, उत्तर आयेगा अथवा समस्या का ऐसे ही समाधान हो जायेगा, यह बिल्कुल सच्ची व पक्की बात है !

 

विशेष लाभदायी है इन दिनों का उपवास    

सूतजी कहते हैं : ‘सोमवार की अष्टमी और कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी को कोई उपवास करें तो उस पर शिवजी विशेष प्रसन्न रहते हैं | महाशिवरात्रि सबसे बलवान व्रत है, करोड़ों हत्याओं का पाप जिसके सिर पर है वह भी अगर विधिवत महाशिवरात्रि का पूजन –अर्चन करता है, भले मन्दिर में न जाय, अपने घर पर ही अर्चन या मानसिक पूजन करें तो उसके रोग-शोक, पाप-ताप भगवान शिव की कृपा से नष्ट हो जाते हैं और उसका ह्रदय प्रफुल्लित व पुण्यमय हो जाता है |’

अष्टमी व चतुर्दशी का उपवास ग्रह – नक्षत्र के हिसाब से हमारे आरोग्य और भक्तिभाव के लिए भी अच्छा है |

 

शिवजी से क्या माँगे ?

शिवजी से यही माँगे कि ‘हे भोलेनाथ ! ऐसी कृपा करो कि शिवस्वरूप का अनुभव करानेवाला सत्संग हमें मिलता रहें हमें शिव-तत्त्व में जगे हुए संतों का सान्निध्य मिले|’

 

महाशिवरात्रि के दिन संकल्प करना चाहिए :

 

देवदेव ! महादेव! नीलकंठ ! नमोऽस्तुते |

कर्तुमिच्छाम्यहं देव ! शिवरात्रिव्रतं तव ||

तव प्रभावाद्देवेश ! निर्विघ्नेन भवेदिति |

कामाध्या: शत्रवो मां वै पीड़ां कुर्वन्तु नैव हि ||

 

‘देवदेव ! महादेव ! नीलकंठ ! आपको नमस्कार है | हे देव ! मैं आपका शिवरात्रि-व्रत करना चाहता हूँ | हे देवेश ! आपके प्रभाव से मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो | इस बीच काम, क्रोध आदि शत्रु मुझे पीड़ित न करें ?’

यह प्रार्थना करके व्रत का आरम्भ करना चाहिए और व्रत पूर्ण करने के बाद दूसरे  दिन सुबह शिव-तत्व को जाननेवाले महापुरुषों का अभिवादन करना चाहिए | अगर ऐसे महापुरुष नहीं मिलते हैं तो मन-ही-मन उनका अभिवादन और पूजन करने से हमारे अंतरात्मा शिव का प्रसाद शीघ्र प्रकट होगा |

इससे सभीको फायदा होगा

शिवजी कहते हैं कि “लिंग का पूजन ॐकार-जप करके और मूर्ति का पूजन ‘ॐ नम:शिवाय’ जप करके करें |”

महाशिवरात्रि का जागरण बड़ा प्रभाव रखता है | इससे चित्त में प्रसन्नता आती ऐ और उसका विकास होता है | मन-ही-मन शिवजी को बिल्वपत्र चढ़ा दो, शिवलिंग पर जल चढ़ा दो, चल जायेगा | १० मिनट होंठों से फिर १० मिनट कंठ से, फिर १० मिनट ह्रदय से जप करो | मन इधर-उधर जाता है तो जोर से ‘हरि ओऽ ऽ..... म ऽ ऽ.....’, शिव ओऽ ऽ..... म ऽ ऽ.....’ ऐसा उच्चारण करो | सुबह, शाम और रात को आधा-आधा घंटा ऐसी साधना करो | इससे सभी को फायदा होगा |

 

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

Sunday, September 5, 2021

स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने का स्वभाव पर विजय पाने का अवसर – शारदीय नवरात्रि

 शारदीय नवरात्रि : ७ से १४ अक्टूबर

एक होती है शारदीय नवरात्रि और दूसरी चैत्री नवरात्रि | एक नवरात्रि रावण के मरने के पहले शुरू होती है, दशहरे को रावण मरता है और नवरात्रि पूरी हो जाती है | दूसरी नवरात्रि चैत्र मास में रामजी के प्राकट्य के पहले, रामनवमी के पहले शुरू होती है और रामजी के प्राकट्य दिवस पर समाप्त होती है |

राम का आनंद पाना है और रावण की क्रूरता से बचना है तो आत्मराम का प्राकट्य करो | काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तथा शरीर को ‘मैं’ और संसार को ‘मेरा’ मानना – यह रावण का रास्ता है | आत्मा को ‘मै’ और सारे ब्रह्मांड को आत्मिक दृष्टी से ‘मेरा; मानना – यह रामजी का रास्ता है |

उपवास की महत्ता क्यों है ?

नवरात्रि में व्रत-उपवास, ध्यान, जप और संयम-ब्रह्मचर्य.... पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग रहें – यह बड़ा स्वास्थ्य-लाभ, पुण्य-लाभ देता है | परंतु इन दिनों में जो सम्भोग करते हैं उनको उसका दुष्फल भी हाथों-हाथ मिलता है | नवरात्रि संयम का संदेश देनेवाली है | यह हमारे ऋषियों की दूरदर्शिता का सुंदर आयोजन है, जिससे हम दीर्घ जीवन जी सकते हैं और दीर्घ सुझबुझ के धनी होकर ऐसे पद पर पहुँच सकते हैं जहाँ इन्द्र का पद भी नन्हा लगे |

नवरात्रि के उपवास स्वास्थ्य के लिए वरदान है | अन्न से शरीर में पृथ्वी-तत्त्व होता है और शरीर कई अनपचे और अनावश्यक तत्त्वों को लेकर बोझा ढो रहा होता है | मौका मिलने पर, ऋतू-परिवर्तन पर वे चीजें उभरती हैं और आपको रोग पकड़ता है | अत: इन दिनों में जो उपवास नहीं रखता और खा-खा-खा.... करता है वह थका-थका, बीमार-बीमार रहेगा, उसे बुखार-वुखार आदि बहुत होता है |

इस ढंग से उपवास देगा पूरा लाभ

शरीर में ६ महीने तक के जो विजातीय द्रव्य जमा हैं अथवा जो डबलरोटी, बिस्कुट या मावा आदि खाये और उनके छोटे-छोटे कण आँतों में फँसे हैं, जिनके कारण कभी डकारें, कभी पेट में गडबड , कभी पेट में गड़बड़, कभी कमर में गड़बड़, कभी ट्यूमर बनने का मसला तैयार होता है, वह सारा मसाला उपवास से चट हो जायेगा | तो नवरात्रियों में उपवास का फायदा उठायें |

नवरात्रि के उपवास करें तो पहले अन्न छोड़ दें और २ दिन तक सब्जियों पर रहें, जिससे जठर पृथ्वी-तत्त्व संबंधी रोग स्वाहा कर ले | फिर २ दिन फल पर रहें | सब्जियाँ जल-तत्त्व प्रधान होती हैं और फल अग्नि-तत्त्व प्रधान होता है | फिर फल पर भी थोडा कम रहकर वायु पर अथवा जल पर रहें तो अच्छा लेकिन यह मोटे लोगों के लिए है |

पतले – दुबले लोग किशमिश, द्राक्ष आदि थोडा खाया करें और इन दिनों में गुनगुना पानी हलका-फुलका (थोड़ी मात्रा में ) पियें | ठंडा पानी पियेंगे तो जठराग्नि मंद हो जायेगी |  

अगर मधुमेह, कमजोरी, बुढापा नहीं है, उपवास कर सकते हो तो कर लेना | ९ दिन के नवरात्रि के उपवास नहीं रख सकते तो कम-से-कम सप्तमी, अष्टमी और नवमी का उपवास तो रखना ही चाहिए |

विजय का डंका बजाओ !

५ ज्ञानेन्द्रियों (जीभ, आँख, कान, नासिका व त्वचा) और ४ अंत:करण (मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार) – ये तुम्हें उलझाते हैं | इन नवों को जीतकर तुम यदि नवरात्रि मना लेते हो तो नवरात्रि का फल विजयादशमी होता है ..... जैसे रामजी ने रावण को जीता, महिषासुर को माँ दुर्गा ने जीता और विजय का डंका बजाया ऐसे ही तुम्हारे चित्त में छुपी हुई आसुरी सम्पदा को, धारणाओं को जीतकर जब तुम परमात्मा को पाओगे तो तुम्हारी भी विजय तुम्हारे सामने प्रकट हो जायेगी |

ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०२१ से


आरती क्यों करते है ?

 

हिन्दुओं के धार्मिक कार्यों में संध्योपासना तथा किसी भी मांगलिक पूजन में आरती का एक विशेष स्थान है | शास्त्रों में आरती को ‘आरात्रिक’ अथवा ‘नीराजन’ भी कहा गया है |

पूज्य बापूजी वर्षों से न केवल आरती की महिमा, विधि, उसके वैज्ञानिक महत्त्व आदि के बारे में बताते रहे हैं बल्कि अपने सत्संग – समारोहों में सामूहिक आरती द्वारा उसके लाभों का प्रत्यक्ष अनुभव भी करवाते रहे हैं |

पूज्य बापूजी के सत्संग -अमृत में आता है : “आरती एक प्रकार से वातावरण में शुद्धिकरण करने तथा अपने और दूसरे के आभामंडलों में सामंजस्य लाने की एक व्यवस्था है | हम आरती करते हैं तो उससे आभा, ऊर्जा मिलती है | हिन्दू धर्म के ऋषियों ने शुभ प्रसंगों पर एवं भगवान की, संतो की आरती करने की जो खोज की है वह हानिकारक जीवाणुओं को दूर रखती है, एक-दूसरे जे मनोभावों का समन्वय करती है और आध्यात्मिक उन्नति में बड़ा योगदान देती है |

शुभ कर्म करने के पहले आरती होती है तो शुभ कर्म शीघ्रता से फल देता है | शुभ कर्म करने के बाद अगर आरती करते हैं तो शुभ कर्म में कोई कमी रह गयी हो तो वह पूर्ण हो जाती है | स्कन्द पुराण में आरती की महिमा का वर्णन है | भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं :

मंत्रहीनं क्रियाहीनं यत्कृतं पूजनं मम |

सर्व सम्पूर्णतामेति कृते नीराजने सुत ||

‘जो मन्त्रहीन एवं क्रियाहीन (आवश्यक विधि-विधानरहित) मेरा पूजन किया गया है, वह मेरी आरती कर देने पर सर्वथा परिपूर्ण हो जाता है |’ (स्कन्द पुराण, वैष्णव खंड, मार्गशीर्ष माहात्म्य : ९:३७)

ज्योत की संख्या का रहस्य 



सामान्यत: ५ ज्योतवाले दीपक से आरती की जाती है, जिसे ‘पंचदीप’ कहा जाता है | आरती में या तो एक ज्योत हो या तो तीन हों या तो पाँच हों | ज्योत विषम संख्या (१,३,५,....) में जलाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है | यदि ज्योत की संख्या सम (२,४,६,...) हो तो ऊर्जा - संवहन की क्रिया निष्क्रिय हो जाती है |

अतिथि की आरती क्यों ?

हर व्यक्ति के शरीर से ऊर्जा, आभा निकलती रहती है | कोई अतिथि आता है तो हम उसकी आरती करते हैं क्योंकि सनातन संस्कृति में अतिथि को देवता माना गया है | हर मनुष्य की अपनी आभा है तो घर में रहनेवालों की आभा को उस अतिथि की नयी आभा विक्षिप्त न करे और वह अपने को पराया न पाये इसलिए आरती की जाती है | इससे उसको स्नेह-का-स्नेह मिल गया और घर की आभा में घुल-मिल गये | कैसी सुंदर व्यवस्था है सनातन धर्म की !”

ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०२१ से

Wednesday, August 4, 2021

पुण्यदायी तिथियाँ व योग

 


१७ अगस्त : विष्णुपदी संक्रांति ( पुण्यकाल : सूर्योदय से दोपहर १२:४६ तक) (ध्यान, जप व पुण्यकर्म का लाख गुना फल )

१८ अगस्त : पुत्रदा एकादशी ( पुत्र की इच्छा से इसका व्रत करनेवाला पुत्र पाकर स्वर्ग का अधिकारी भी हो जाता है |)

२२ अगस्त : रक्षाबंधन ( इस दिन धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है | इसे वर्ष में एक बार धारण करने से मनुष्य वर्षभर रक्षित हो जाता है | - भविष्य पुराण )

२९ अगस्त : रविवारी सप्तमी ( सूर्योदय से रात्रि ११:२६ तक)

३० अगस्त : अजा एकादशी ( समस्त पापनाशक व्रत, माहात्म्य पढने-सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल )

६ सितम्बर : सोमवती अमावस्या (सुबह ७:३९ से ७ सितम्बर सुबह ६:२२ तक ) ( तुलसी की १०८ परिक्रमा करने से दरिद्रता - नाश )

 


१० सितम्बर : गणेश चतुर्थी, चन्द्र – दर्शन निषिद्ध ( चंद्रास्त : रात्रि ९:२० ) ( इस दिन ‘ॐ गं गणपतये नम: |’ का जप करने और गुड़मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दुर्वा व सिंदूर की आहुति देने से विघ्न- निवारण होता है तथा मेधाशक्ति बढती है | इस दिन चन्द्र-दर्शन से कलंक लगता हिया | यदि भूल से भी चन्द्रमा दिख जाय तो उसके कुप्रभाव को मिटाने के लिए  shorturl.at/koKY3 इस लिंक पर दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी की कथा पढ़ें तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण के निम्नलिखित मंत का २१, ५४, या १०८ बार जप करके पवित्र किया हुआ जल पियें |

 सिंह : प्रसेनमधीत् सिंहों जाम्बवता हत: |

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक: ||

 

१२ सितम्बर : रविवारी सप्तमी ( शाम ५:२२ से १३ सितम्बर सूर्योदय तक )

 

ऋषिप्रसाद – अगस्त २०२१ से    

 

Sunday, April 4, 2021

अक्षय फलदायी अक्षय तृतीया

 

(अक्षय तृतीया : १४ मई )

अक्षय तृतीया त्रेतायुग का प्रारम्भ दिवस, नर-नारायण का प्राकट्य दिवस, परशुरामजी का प्राकट्य दिवस, भगवान हयग्रीव का अवतार दिवस, किसानों के कृषि-कार्य का आरम्भ दिवस, नूतन वर्ष का प्रारम्भ दिवस है | किसान इस दिन को वर्ष के प्रारम्भ का शुभ दिन मानकर खेत-खलियान में प्रवेश करे तो उसे बरकत आने के शकुन मानते हैं |

अक्षय तृतीया भगवान बद्रीनाथ के पट खुलने का दिवस है तो आपके दिल के दिलबर के पट खुलने का दिवस भी है | हरि हमारे ह्रदय के पट खोलें | ‘हरि ॐ शांति...’ जितना प्रीतिपूर्वक होठों में जपते जाओगे, जप के अर्थ में शांत होए जाओंगे, उतना ही जो ह्रदय में छुपा बद्रीनाथ भगवान है उसके पट भी खुलने के दिन निकट आ जायेंगे |

इस दिन छाता, मटकी और भी चीज-वस्तुओं का दान करने का अक्षय फल तो होता है किंतु भगवान का ध्यान, जप करके अपना अहंकार दान करना तो महाराज ! उसका असीम फल होता है | अक्षय तृतीया को जो - जो करो उसका फल अनंत गुना होता है |

बच्चे-बच्चियाँ ! ध्यान देना बेटे ! अक्षय तृतीया के दिन किसी भी इच्छा से तुम जप करोगे तो वह अनंत गुना फल देगा | चाहे भगवान की प्रीति के लिए करो, चाहे भगवान के ज्ञान के लिए करो, चाहे भगवदरस के लिए करो, चाहे ब्रह्मचर्य पालने के लिए करो, चाहे कुटुम्ब में सुख-शांति के लिए करो.... जिसके लिए भी जप करोगे वह फलेगा |

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०२१ से

Sunday, January 31, 2021

आयु, आरोग्य, पुष्टिदायक व आत्मस्थिति में सहायक मास

 

माघ मास व्रत : २८ जनवरी से २७ फरवरी

माघ मास में सभी जल गंगाजल और सभी दिन पर्व के माने गये है | इस मास में सूर्योदय से पहले स्नान कर लें तो पित्त व ह्रदय संबंधी बीमारियों को विदाई मिल सकती है, आध्यात्मिक लाभ और लौकिक लाभ भी हो सकते है |

ब्रह्मर्षि भृगुजी ने कहा है :

कृते तप: परं ज्ञानं त्रेतायां यजनं तथा |

द्वापरे च कलौ दानं माघ: सर्वयुगेषु च ||

‘सतयुग में तपस्या को, त्रेता में ज्ञान को, द्वापर में भगवान के पूजन को और कलियुग में दान को उत्तम माना गया है परंतु माघ का स्नान सभी युगों में श्रेष्ठ समझा गया है |’ (पद्म पुराण, उत्तरखंड २२१.८०)

पद्म पुराण में महर्षि वसिष्ठजी ने कहा है : ‘वैशाख में जलदान, अन्नदान उत्तम है, कार्तिक मास में तपस्या, पूजा उत्तम है  लेकिन माघ में जप, होम, दान, स्नान अति उत्तम हैं |’

माघ मास के स्नान का फायदा लेना चाहिए | और हो सके तो दान आदि करें, नहीं तो उबटन लगा के प्रात:स्नान करें, तर्पण व हवन करें | भोजन में ऐसी चीजों का उपयोग करें जिनसे पुण्यलाभ हो | मांस-मदिरा अथवा लहसुन-प्याज का त्याग करें |पृथ्वी पर (चटाई, कम्बल आदि बिछाकर) शयन करें |

यत्नपूर्वक प्रात: (सूर्योदय से पूर्व) स्नान करने से विद्या, निर्मलता, कीर्ति, आयु, आरोग्य, पुष्टि, अक्षय धन की प्राप्ति होती है |कांति बढती है | किये हुए दोषों व समस्त पापों से मुक्ति मिलती है | माघ-स्नान से नरक का डर दूर हो जाता है,   दरिद्रता पास में फटक नहीं सकती है | पाप और दुर्भाग्य का सदा के लिए नाश हो जाता है और मनुष्य यशस्वी हो जाता है | जैसे उद्योगी, उपयोगी, सहयोगी व्यक्ति सबको हितकारी लगता है, ऐसे ही माघ मास सब प्रकार से हमारा हित करता है |

माघ मास में स्नान करते समय अगर सकाम भाव से स्नान करते हो तो वह मनोकामना पूरी होगी और निष्काम भाव से, ईश्वरप्रीति के लिए स्नान करते ही...’मै कौन हूँ?’ इस जिज्ञासा से अपने-आपको जानने के लिए प्रातः स्नान करते हो तो आपको अपने दृष्टा-स्वभाव का, साक्षी-स्वभाव का, ब्रह्म-स्वभाव का प्रसाद भी मिल सकता है |

बच्चों के लिए है बहुत जरूरी

जो बच्चे सदाचरण के मार्ग से हट गये हैं उनको भी पुचकार के, ईनाम देकर भी प्रात:स्नान कराओ तो उन्हें समझाने से मारने-पीटाने से या और कुछ करने से वे उतना नहीं सुधर सकते हैं, घर से निकाल देने से भी इतना नहीं सुधरेंगे जितना माघ मास में सुबह का स्नान करने से वे सुधरेंगे |

पुरे माघ मास का फल

पूरा मास जल्दी स्नान कर सकें तो ठीक है, नहीं तो एक सप्ताह तो अवश्य करें | माघ मास की शुक्ल त्रयोदशी से माघी पूर्णिमा तक अंतिम ३ दिन प्रात:स्नान करने से भी महीनेभर के स्नान का प्रभाव, पुण्य प्राप्त होता है | जो वृद्ध या बीमार है, जिन्हें सर्दी-जुकाम आदि है वे सूर्यंनाड़ी अर्थात दायें नथुने से श्वास चलाकर स्नान करें तो सर्दी-जुकाम से रक्षा हो जायेगी |

ऋषिप्रसाद – जनवरी  २०२१से

Saturday, October 17, 2020

लक्ष्मीप्राप्ति हेतु साधना

दीपावली के दिन से तीन दिन तक अर्थात भाईदूज तक एक स्वच्छ कमरे में दीपक जलाकर एवं सम्भव हो तो गौ-गोबर और अन्य औषधियों से बनी धूपबत्ती जला के, पीले वस्त्र धारण करके पश्चिम की तरफ मुँह करके बैठे | ललाट पर तिलक ( हो सके तो केसर का ) कर स्फटिक मोतियों से बनी माला द्वारा नित्य प्रात:काल इस मन्त्र की दो मालाएँ जपें :

ॐ नमो भाग्यलक्ष्म्यै च विद्महे |

अष्टलक्ष्म्यै च धीमहि |

तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात |

तेल का दीपक व धूपबत्ती लक्ष्मीजी की बायीं ओर, घी का दीपक दायी ओर एवं नैवेद्य आगे रखा जाता है | लक्ष्मीजी को तुलसी तथा मदार (आक) या धतूरे का फूल नहीं चढाना चाहिए, नहीं तो हानि होती है | घर में लक्ष्मीजी के वास, दरिद्रता के विनाश और आजीविका के उचित निर्वाह हेतु यह साधना करनेवाले पर लक्ष्मीजी प्रसन्न होती है |

                                                                   

                                                                                                             ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०२० से 

पर्वों की सुंदर माला : दीपावली

 

दीपावली पर्व : १३ से १६ नवम्बर

धनत्रयोदशी से लेकर भाईदूज तक सुंदर पर्वों की शृंखला का नाम है दीपावली |

धनतेरस :

धन्वंतरिजी  के आरोग्य-सिद्धांतो और आत्मविश्वासरूपी अमृत को अपने चित्त में सिंचन करने का संकेत देता है धनत्रयोदशी का पर्व | धन्वंतरि महाराज खारे समुद्र से अमृत लेकर आये थे | उस अमृत को औषधिरूप में आपके जीवन में उँडेलने की स्मृति करानेवाली  है धनत्रयोदशी |

आपके जीवन में शारीरिक धन की रक्षा  करने की भी कला होनी चाहिए | धनतेरस के दिन लक्ष्मी-पूजन करते हैं | इस दिन सुबह उठकर संकल्प करो कि ‘मैं महालक्ष्मी का पूजन करूँगा |’ व्रत करो और संध्याकाल में लक्ष्मी-पूजन करो | लक्ष्मी का पूजन मतलब नारायण को आमंत्रित करो तो लक्ष्मी आपके कुल में टिकी रहेगी |

नरक चतुर्दशी :

इस दिन तेल में लक्ष्मीजी का और जल में गंगाजी का वास कहा गया है, जल में पवित्रता होती है | इस शुभ अवसर पर जो व्यक्ति प्रात:काल स्नान करता है वह रूपवान होता है, सुंदर होता है, उसकी परेशानियाँ दूर हो जाती है |

इस दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और १६ हजार कन्याओं को उसकी कैद से छुडाया था, अपनी शरण दी थी | आपके चित्त में भी नरकासुर यानी अहंकार है और अहंकार के पास वासनाओं का जत्था यानी १६ हजार कन्याओं को श्रीकृष्ण ने अपनी शरण दी और नरकासुर का वध किया | वैसे ही आप भी चित्त के नरकासुररूपी अहंकार को आत्मकृष्ण की शरण भेज दो ताकि उसका नाश हो जाय और हजारों की संख्या में जो वृत्तियाँ उसके अधीन हो जायें |

इस दिन उजाला करना होता है | हे मानव ! तेरे जीवन में चाहे कितना अँधेरा दिखता हो, नरकासुर का प्रभाव दिखता हो तब भी तू मेरे आत्मकृष्ण को पुकारना और श्रीकृष्ण – सत्यभामा को नेतृत्व दे के अंहकाररूपी नरकासुर को ठिकाने लगा देना |

दीपावली :

दिवाली की रात को सरस्वतीजी और लक्ष्मीजी का पूजन होता है | धन प्राप्त हो, बहुत धन मिले, उसे मई ‘लक्ष्मी ‘ नहीं मानता | महापुरुष उसे ‘वित्त मानते हैं | वित्त से बड़े बँगले मिलेंगे, लम्बी-लम्बी गाड़ियां मिलेंगी, लम्बी-लम्बी प्रशंसा होगी पर अंदर में रस नहीं आयेगा | दिवाली की रात को सरस्वतीजी का पूजन करते हैं, जिससे विद्या मिले पर वह विद्या सिर्फ पेट भरने की विद्या नहीं, ऐहिक विद्या के साथ आपके चित्त में विनय आयें, आपके जीवन में ब्रह्मविद्या आये इसलिए सरस्वतीजी की पूजा करनी होती है और आपका वित्त आपको बाँधनेवाला न हो, आपको विषय-विलास एवं विकारों में न घसीट ले इसलिए लक्ष्मी -पूजन करना होता है |

लक्ष्मी-पूजन यानी वित्त महालक्ष्मी बनकर आये | जो वासनाओं का वेग बढाये वह ‘वित्त और जो वासनाओं को श्रीहरि के चरणों में पहुँचाये वह ‘महालक्ष्मी | वित्त हो तो झगड़ा करायेगा, अनर्थ सर्जित करेगा | लक्ष्मी हो तो व्यवहार में काम आयेगी और महालक्ष्मी हो तो नारायण के साथ एक कर देगी | भारत के ऋषि कहते हैं कि लक्ष्मी-पूजन करो | हमने धन या लक्ष्मी को तिरस्कारा नहीं है किंतु जिसे पाकर असुरों जैसा जीवन जियें ऐसा वित्त, ऐसा धन,  ऐसी लक्ष्मी नहीं बल्कि नारायण से मिला दे ऐसा धन, ऐसी लक्ष्मी, महालक्ष्मी चाहिए |

वर्ष प्रतिपदा :

इस दिन से विक्रम संवत (गुजरात अनुसार ) शुरू होता है | दीपावली की रात्रि को पिछले  संवत में थे, सुबह नये संवत में आये | रात को सोकर सारा वर्ष रूपांतरित कर दिया | वैसे ही मृत्यु भी एक रात्रि है , पूरा जीवन रूपांतरित कर देती है | अपनी मौत को याद करके अमरता की ओर आगे बढने का संकेत इस पर्व में समाया हुआ है |

वर्ष प्रतिपदा का दिन वर्ष की दैनंदिनी  का पहला पन्ना है | जन्मग्रंथ का अध्याय यह शरीर है | मृत्यु की माला में से एक मनका यह जीवन है और यह माला १०८ दानों की नहीं है, यह माला अति विशाल है, अनंत है ( अर्थात इसके पूर्व हमने इतने जन्म लिए है कि जिनकी गिनती नहीं की जा सकती )|

वर्ष के पथम दिन तुम्हारे जीवन की दैनंदिनी के प्रथम पन्ने पर पहले लिखो – ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा |’

भगवान् वेदव्यासजी ने विश्व के सर्वप्रथम आर्षग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र में लिखा है : ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा |’ तुझे कुछ जानना है तो उस एक को जान जिससे सब जाना जाता है | कुछ पाना है तो उस एक को पा जिससे सब पाया जाता है | तुझे मिलना है तो उस एक से मिल जिससे तू सबसे एक ही साथ मिल पाये |

विवेक के विकास से ब्रह्म \जिज्ञासा उपलब्ध होती है और विवेक के नाश से ब्रह्मजिज्ञासा का नाश होता है | विवेक के विकास से जीवन का सर्वांगीण विकास होता है | हम कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? शरीर के नाम और इन दिखनेवाले वस्तु पदार्थों से हमारा क्या संबंध है ? अंत में हमें कहाँ जाना है ? जीवन में इस प्रकार की जिज्ञासा होनी चाहिए |

भाईदूज

भाईदूज मतलब भाई की बहन के लिए सद्भावना और बहन की भाई के लिए सद्भावना और बहन की भाई के लिए सद्भावना क्योंकि आपका मन कल्पतरु है | मन जहाँ से स्फुरता है वह चैतन्य, चिद्घन, सच्चिदानंद परमात्मा सत्यस्वरूप है तो अपने मन के संकल्प भी देर-सवेर सत्य होते हैं |

भाई बहन के घर जाता है, बहन के प्यारेभारे स्पंदनो, भावों से बना हुआ भोजन करता है,  बहन के संकल्प, आशीष लेता है, बहन के प्रति अपनी कृतज्ञता भी व्यक्त करता है |

बहन भाई को त्रिलोचन देखता चाहती है और भाई बहन का शील, मान-सन्मान बरकरार रहे यह देखना चाहता है | ४ रोटी की तो भाई को भी कमी नहीं और ४ पैसों की बहन को भी कमी नहीं लेकिन रोटी और और पैसे के निमित्त से दोनों के ह्रदय में दिव्य भाव प्रकटाने का पर्व है भाईदूज |

ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०२० से

Tuesday, August 11, 2020

महापातक- नाशक, महापुण्य-प्रदायक पुरुषोत्तम मास

 (अधिक मास : १८ सितम्बर से १६ अक्टूबर )

अधिक मास ३२ महीने १६ दिन और ४ घड़ियों (९६ मिनट) के बाद आता है | हमारा भारतीय गणित कितना ठोस है ! ग्रह-मंडल की व्यवस्था में इस कालखंड के बाद एक अधिक मास आने से ऋतुओं आदि की गणना ठीक चलती है |

एक सौर वर्ष ३६५ दिनों का और चान्द्र वर्ष ३५४ का होने से दोनों की वर्ष-अवधि में ११ दिनों का अंतर रह जाता है | पंचांग- गणना हेतु सौर और चान्द्र वर्षों में एकरूपता लाने के लिए हर तीसरे चान्द्र वर्ष में एक अति रिक्त चान्द्र मास जोडकर दोनों की अवधि समान कर ली जाती है | यही अतिरिक्त चान्द्र मास अधिक मास, पुरुषोत्तम या मल मास कहलाता है |

पुरुषोत्तम मास नाम कैसे पड़ा ?

मल मास ने भगवान को प्रार्थना की तो भगवान ने कहा : “जो ! ‘मल मास’ नहीं तो ‘पुरुषोत्तम मास’ | इस मास में जो मेरे उद्देश्य से जप, सत्संग, ध्यान, पुण्य, स्नान आदि करें गे उनका वह सब अक्षय होगा | अन्तर्यामी आत्मा के लिए जो भी करेंगें वह विशेष फलदायी होगा |

तब से मल मास का नाम पड़ गया ‘पुरुषोत्तम मास’ | भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि “इसका फलदाता, भोक्ता और अधिष्ठाता – सब कुछ मैं हूँ |”

पुरुषोत्तम मास में क्या करें, क्या न करें ?

इस मास में :

१] भूमिपर (चटाई, कम्बल, चादर आदि बिछाकर) शयन, पलाश की पत्तल पर भोजन करने और ब्रह्मचर्य –व्रत पालनेवाले की पापनाशिनी ऊर्जा बढती है तथा व्यक्तित्त्व में निखार आता है |

२] आँवला व तिल के उबटन से स्नान करनेवाले को पुण्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है |

३] आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने से स्वास्थ्य-लाभ व प्रसन्नता मिलती है |

४] सत्कर्म करना, संयम से रहना आदि तप, व्रत, उपवास बहुत लाभदायी हैं |

५] मकान-दुकान नहीं बनाये जाते तथा पोखरे, बावड़ी, तालाब, कुएँ नहीं खुदवाये जाते हैं |

६] शादी-विवाह आदि सकाम कर्म वर्जित हैं और निष्काम कर्म कई गुना विशेष फल देते हैं |


घोर पातक से दिलाता मुक्ति

राजा नहुष को इंद्र पदवी की प्राप्ति हुई थी | अनधिकारी, अयोग्य को ऊँची चीज मिलती है तो अनर्थ पैदा हो जाता है | नहुष ने इन्द्रपद के अभिमान- अभिमान में महर्षि अगस्त्य का अपमान किया | अगस्त्यजी और अन्य ऋषियों को अपनी डोली उठाने में नियुक्त कर दिया | जीव का तब विनाश होता है जब श्रेष्ठ पुरुषों का अनादर-अपमान करके अपने को बड़ा मानने की कोशिश करता है |

नहुष अगस्त्य ऋषि को रुआब मारने लगा : “सर्प-सर्प !.... अर्थात शीघ्र चलो, शीघ्र चलो ! संस्कृत में शीघ्र चलो – शीघ्र चलो का ‘सर्प-सर्प’ बोलते हैं |

अगस्त्य ऋषि ने कहा : ‘सर्प-सर्प ..... बोलता है तो जा, तू ही सर्प बन !”

उस शाप की निवृत्ति के लिए नहुष को अधिक मास का व्रत रखने का महर्षि वेदव्यासजी से आदेश मिला और इतने घोर पातक से वह छुट गया |

इतना तो अवश्य करें

पूरा मास व्रत रखने का विधान भविष्योत्तर पुराण आदि शास्त्रों में आता है | पूरा मास यह व्रत न सकें तो कुछ दिन रखें और कुछ दिन भी नहीं तो एकाध दिन तो इस मास में व्रत करें | इनसे पापों की निवृत्ति और पुण्य की प्राप्ति बतायी गयी है | परंतु उपवास वही लोग करें जो बहुत कमजोर नहीं हैं |

सुबह उठकर भगवन्नाम-जप तथा भगवान के किसी भी स्वरूप का चिंतन-सुमिरन करें, फिर संकल्प करें : ‘आज के दिन मैं व्रत-उपवास रखूँगा | हे सच्चिदानंद ! मैं तुम्हारे नजदीक रहूँ, विकार व पाप-ताप के नजदीक न रहूँ | भोग के नजदीक नहीं, योगेश्वर के नजदीक रहूँ इसलिए मैं उपवास करता हूँ |’

फिर नहा –धोकर भगवान का पूजन करें | यथाशक्ति दान पुण्य करें और भगवन्नाम –जप करें | सादा-सूदा फलाहार आदि करें |

१० हजार वर्ष गंगा-स्नान करने से अथवा १२ वर्ष में आनेवाले सिंहस्थ कुम्भ में स्नान से जो पुण्य होता है वही पुण्य पुरुषोत्तम मास में प्रात:काल स्नान करने से हो जाता है |

जो पुरषोत्तम मास का फायदा नहीं लेता उसका दुःख-दारिद्र्य और शोक नहीं मिटता | यह मास शारीरिक-मानसिक आरोग्य और बौद्धिक विश्रांति देने में सहायता करेगा | भजन-ध्यान अधिक करके पुरुषोत्तमस्वरूप परमात्मा को पाने में यह मास मददरूप है |

ऋषिप्रसाद – अगस्त २०२० से

Thursday, July 16, 2020

जन्माष्टमी व्रत की महिमा


( श्रीकृष्ण जन्माष्टमी – ११ व १२ आगस्त )


१] भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिरजी को कहते हैं : “२० करोड़ एकादशी व्रतों के समान अकेला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत हैं |”

२] धर्मराज सावित्री से कहते हैं : “ भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है वह १०० जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है |”

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   

Sunday, March 22, 2020

एकादशी व्रत क्यों ?

प्राय: डॉक्टर दो सप्ताह में एक दिन उपवास रखने के लिए कहते हैं | इसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं | हमारे शरीर के प्राकृतिक चक्र से ‘मंडल’ नाम की एक चीज होती है | मंडल का मतलब है कि हर ४० से ४८ दिनों में शरीर एक विशेष चक्र से गुजरता है | हर चक्र में ३ दिन ( हर ११ से १४ दिन के बीच में एक दिन ) ऐसे होते हैं जिनमें शरीर को भोजन की आवश्यकता नहीं होती है | भूख का एहसास कम होता है | उस दिन बिना कुछ खायें भी रहा जा सकता है | मनुष्यों के साथ कुछ जानवर भी उपवास करते हैं | उस दिन को शरीर की सफाई का दिन भी कहते हैं |

हमारे ऋषि-मुनि तो हजारों वर्ष पहले से कहते आ रहे हैं और शास्त्रों में भी एकादशी के दिन उपवास करने का विधान दिया गया है | हिन्दी महीनों के अनुसार हर १४-१५ दिन में एक बार एकादशी आती है |

ब्रह्मवेत्ता संत पूज्य बापूजी ने अपने सत्संगों में एकादशी की महत्ता बहुत सुंदर ढंग से बतायी है | पूज्यश्री कहते हैं : “ एकादशी व्रत की बड़ी भारी महिमा है | ५ कर्मेन्द्रियों, ५ ज्ञानेन्द्रियों और ११ वें मन को संयत करनेवाला व्रत एकादशी का व्रत है | यह शरीर के रोगों को तो मिटाता है, मन के दोषों को भी निवृत्त करता है, बुद्धि को ओजस्वी-तेजस्वी बनाता है, भगवद् भक्ति में पुष्टि, योग में सफलता एवं मनोवांछित फल देता है |

वात-पित्त-कफजनित दोष अथवा समय-असमय खाये हुए अन्न आदि के जो दोष १४ दिन में इकट्ठे होते हैं, १५वें दिन एकादशी का व्रत रखा तो वे दोष निवृत्त होते हैं | जो विपरीत रस या कच्चा रस नाड़ियों में पड़ा है,  जो बुढापे में मुसीबत देगा,  व्रत उसको नष्ट कर देता है | इससे शरीर जल्दी रोगी नहीं होगा | एकादशी को चावल खाने से स्वास्थ्य-हानि, पापराशि की वृद्धि कही गयी है |

इस दिन हो सके तो निर्जल रहें, नहीं तो थोडा जल पियें | ठंडा जल पीने से मंदाग्नि होती है, गुनगुना जल पियें, जिससे जठर की भूख नहीं बनी रहें और नाड़ियों में जो वात-पित्त-कफ के दोष जमा हैं, उन्हें खींचकर जठर उनको पचा दे, आरोग्य की रक्षा हो | जल से गुजारा न हो तो थोड़े-से फल खा लें और थोड़े-से फल से भी गुजारा न हो तो मोरधन आदि की खिचड़ी खा ली थोड़ी |

जो तीसों दिन खाना खाते हैं वे जल्दी बूढ़े होते हैं और बीमारियों के घर हो जाते हैं | हफ्ते में एक दिन व्रत रखें, नहीं तो १५ दिन में के बार एकादशी का व्रत अवश्य रखना ही चाहिए | लेकिन बूढ़े, बालक, गर्भिणी, प्रसुतिवाली महिला तथा जिनको मधुमेह है, जो अति कमजोर हैं वे व्रत न रखें तो चल जायेगा | अथवा कोई कमजोर है और व्रत रखता है तो फिर वह किशमिश खाये | यदि उपवास नहीं करना है तो चने और किशमिश या काली द्राक्ष खायें |

एकादशी के दिन कुछ बातों का ध्यान रखें :
१] बार-बार पानी नहीं पियें | 
२] वाणी या शरीर से हिंसा न करें | 
३] अपवित्रता का त्याग करें | 
४] असत्य भाषण न करें |  
५] पान न चबायें | 
६] दिन को नींद न करें | 
७] संसारी व्यवहार-मैथुन भूलकर भी न करें | 
८ ] जुआ और जुआरियों की बातों में न आयें | 
९] रात को शयन कम करें, थोडा जागरण करें ( रात्रि १२ बजे तक ) | 
१०] पतित, हलकी वार्ता करें – सुनें नहीं | 
११] दातुन न चबायें, मंजन कर लें |

सुबह संकल्प करें
एकादशी के दिन सुबह संकल्प करें कि ‘आज का दिन सारे पापों को जलाकर भस्म करनेवाला, आरोग्य के कण बढानेवाला, रोगों के परमाणुओं को नष्ट करनेवाला, नाड़ियों व मन की शुद्धि करनेवाला, बुद्धि में भगवदभक्ति भरनेवाला तथा ओज, बल और प्रसन्नता देनेवाला हो | देवी ! तेरे नाम का मैं व्रत करता हूँ |’ फिर नहा-धोकर भगवद पूजा, ध्यान, सुमिरन, जप करें |”

ऋषिप्रसाद – मार्च २०२० से

Sunday, February 9, 2020

पुण्यदायी तिथियाँ



६ मार्च : आमलकी एकादशी (व्रत करके आँवले के वृक्ष के पास रात्रि – जागरण, उसकी १०८ या 
२८ परिक्रमा करनेवाला सब पापों से छूट जाता है और १००० गोदान का फल प्राप्त करता है |)

९ मार्च : होलिका दहन (रात्रि – जागरण, जप, मौन और ध्यान बहुत ही फलदायी होता है |)

१४ मार्च : षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल: दोपहर ११:५५ से शाम ६:१९ तक) (ध्यान, जप व पुण्यकर्म का फल ८६,००० गुना होता है | - पद्म पुराण )

१५ मार्च : रविवारी सप्तमी ( सूर्योदय से १६ मार्च प्रात: ३:२० तक )


१६ मार्च : भगवत्पाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज का प्राकट्य दिवस

२० मार्च : पापमोचनी एकादशी (व्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जाता है |)


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से