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Monday, February 14, 2022

महाशिवरात्रि व्रत की महिमा

 


महाशिवरात्रि – १ मार्च २०२२

भगवान् शिवजी कहते हैं कि ‘जो सांगोपांग से ( विधि-विधानसहित), संयम से, ब्रह्मचर्य – व्रत पालकर, झूठ-कपट का त्याग करके महाशिवरात्रि का व्रत करता है उसको वर्षभर की शिव-पूजा का फल होगा |’ तो लोगों को फल होता है |

महाशिवरात्रि व्रत का फल

सूतजी शौनकजी से कहते हैं : ‘जिनको आत्मज्ञान का सत्संग श्रवण – मनन को नहीं मिलता है उनको विधिपूर्वक श्रद्धा-भक्ति से शिव-पूजा, शिव-व्रत करना चाहिए | श्रद्धा-भक्ति से किया हुआ शिवजी का पूजन-सुमिरन देर-सवेर उनको आत्मशिव कि विद्या देनेवाले सत्संग में पहुँचा देता है और सत्यस्वरूप व्यापक शिव का साक्षात्कार करा देता है |’

घर को ही बना लें शिवालय     

आप अपने घर में साधन-भजन, पूजा का एक ऐसा कमरा बनाइये जिसमें संसार कि खटपट न हो | फिर वहाँ शिवलिंग की स्थापना करते हैं तो ठीक है अथवा भगवान जिनके ह्रदय में नृत्य कर रहा है, वाणी उच्चार रहा है ऐसे किन्ही ब्रह्मवेत्ता महापुरुष का श्रीचित्र लगा दो जिनमें आपकी श्रद्धा है | रोज थोडा-बहुत ध्यान, जप करिये | कभी- कभार उधर फुल रख दें, दिया जला दें, धूप कर दें | धूप रसायन युक्त कृत्रिम सुगंधवाली अगरबत्तियों का नहीं, ये तो गडबड करती हैं, देशी गाय के गोबर के कंडे के ऊपर थोडा गूगल रख दें या कोयले के ऊपर थोड़ी हबन—सामग्री रख दें अथवा गौ-चंदन धूपबत्ती जला दें | वहाँ आप नियम से मंत्रजप, साधन-भजन करेंगे तो उस जगह को आप थोड़े ही दिनों में शिव मन्दिर पायेंगे |

 

फिर जब संसार कि विडंबना, मुसीबतें आयें तो आप हाथ-पैर धो के उस पूजा के कमरे में आकर थोड़ी प्रार्थना करें | ५ – ७ मिनट ॐकार का दीर्घ उच्चारण करके मानसिक जप व ध्यान करें | यदि रात्रि का समय है तो ध्यान करते-करते ध्यान का जो भाव बना है उसी भाव  शयन कर लें | रात्रि को स्वप्न में आपके प्रश्न का उत्तर आ जायेगा, नहीं तो प्रभात को जरुर आयेगा | एक दिन नहीं तो दूसरे दिन आयेगा, उत्तर आयेगा अथवा समस्या का ऐसे ही समाधान हो जायेगा, यह बिल्कुल सच्ची व पक्की बात है !

 

विशेष लाभदायी है इन दिनों का उपवास    

सूतजी कहते हैं : ‘सोमवार की अष्टमी और कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी को कोई उपवास करें तो उस पर शिवजी विशेष प्रसन्न रहते हैं | महाशिवरात्रि सबसे बलवान व्रत है, करोड़ों हत्याओं का पाप जिसके सिर पर है वह भी अगर विधिवत महाशिवरात्रि का पूजन –अर्चन करता है, भले मन्दिर में न जाय, अपने घर पर ही अर्चन या मानसिक पूजन करें तो उसके रोग-शोक, पाप-ताप भगवान शिव की कृपा से नष्ट हो जाते हैं और उसका ह्रदय प्रफुल्लित व पुण्यमय हो जाता है |’

अष्टमी व चतुर्दशी का उपवास ग्रह – नक्षत्र के हिसाब से हमारे आरोग्य और भक्तिभाव के लिए भी अच्छा है |

 

शिवजी से क्या माँगे ?

शिवजी से यही माँगे कि ‘हे भोलेनाथ ! ऐसी कृपा करो कि शिवस्वरूप का अनुभव करानेवाला सत्संग हमें मिलता रहें हमें शिव-तत्त्व में जगे हुए संतों का सान्निध्य मिले|’

 

महाशिवरात्रि के दिन संकल्प करना चाहिए :

 

देवदेव ! महादेव! नीलकंठ ! नमोऽस्तुते |

कर्तुमिच्छाम्यहं देव ! शिवरात्रिव्रतं तव ||

तव प्रभावाद्देवेश ! निर्विघ्नेन भवेदिति |

कामाध्या: शत्रवो मां वै पीड़ां कुर्वन्तु नैव हि ||

 

‘देवदेव ! महादेव ! नीलकंठ ! आपको नमस्कार है | हे देव ! मैं आपका शिवरात्रि-व्रत करना चाहता हूँ | हे देवेश ! आपके प्रभाव से मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो | इस बीच काम, क्रोध आदि शत्रु मुझे पीड़ित न करें ?’

यह प्रार्थना करके व्रत का आरम्भ करना चाहिए और व्रत पूर्ण करने के बाद दूसरे  दिन सुबह शिव-तत्व को जाननेवाले महापुरुषों का अभिवादन करना चाहिए | अगर ऐसे महापुरुष नहीं मिलते हैं तो मन-ही-मन उनका अभिवादन और पूजन करने से हमारे अंतरात्मा शिव का प्रसाद शीघ्र प्रकट होगा |

इससे सभीको फायदा होगा

शिवजी कहते हैं कि “लिंग का पूजन ॐकार-जप करके और मूर्ति का पूजन ‘ॐ नम:शिवाय’ जप करके करें |”

महाशिवरात्रि का जागरण बड़ा प्रभाव रखता है | इससे चित्त में प्रसन्नता आती ऐ और उसका विकास होता है | मन-ही-मन शिवजी को बिल्वपत्र चढ़ा दो, शिवलिंग पर जल चढ़ा दो, चल जायेगा | १० मिनट होंठों से फिर १० मिनट कंठ से, फिर १० मिनट ह्रदय से जप करो | मन इधर-उधर जाता है तो जोर से ‘हरि ओऽ ऽ..... म ऽ ऽ.....’, शिव ओऽ ऽ..... म ऽ ऽ.....’ ऐसा उच्चारण करो | सुबह, शाम और रात को आधा-आधा घंटा ऐसी साधना करो | इससे सभी को फायदा होगा |

 

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

Saturday, December 11, 2021

आरती क्यों करते हैं ?

 

आरती को कैसे व कितनी बार घुमाये ?

पूज्य बापूजी के सत्संग – वचनामृत में आता है : जो भी देव हैं उनका एक बीजमन्त्र होता है | आरती करते हैं तो उनके बीजमन्त्र के अनुसार आकृति बनाते हैं ताकि उन देव कि ऊर्जा, स्वभाव हममें आयें और उनकी आभा में हमारी आभा का तालमेल हो और हमारी आभा देवत्व को उपलब्ध हो | इसलिए देवता, सद्गुरु, भगवान् कि आरती की जाती है |

जिस देवता का जो बीजमन्त्र होता है, आरती की थाली से उस प्रकार कि आकृति बना के आरती करते हैं तो ज्यादा लाभ होता है “ जैसे आप रामजी कि आरती करते हैं तो उनका ‘रां’ बीजमन्त्र है तो ‘रां’ शब्द आरती में बनाना ज्यादा लाभ करेगा | देवी की आरती करते हैं तो सरस्वतीजी का ‘ऐं’ अथवा लक्ष्मीजी का ‘श्रीं’ बना दें | गणपतिजी का बीजमंत्र है ‘गं’ तो थाली से उस प्रकार कि आकृति बना दें | अब कौन-से देव का कौन-सा बीजमन्त्र है यह पता नहीं है तो सब बीजमन्त्रो का एक मुख्य बीजमन्त्र है ‘ॐ’कार | आरती घुमाते – घुमाते आप ॐकार बना दें | सभी देवी-देबताओं के अंदर जो परब्रह्म-परमात्मा है उसकी स्वाभाविक ध्वनि ॐ है |

तो ‘ॐ’ बनाये अथवा देव के चरणों से घुटनों तक ( ४ बार) फिर नाभि के सामने (२ बार) फिर मुखारविंद के सामने (१ बार) फिर एक साथ सभी अंगो में (७ बार) आरती घुमाये| इमने देव के गुण व स्वभाव आरती घुमानेवाले के स्वभाव में थोड़े थोड़े आने लगते हैं |

आरती का वैज्ञानिक आधार

अभी तो बिज्ञानी भी दंग रह गये कि भारत की इस पूजा-पद्धति से कितना सारा लाभ होता है ! उनको भी आश्चर्यकारक परिणाम प्राप्त हुए | अब विज्ञानी बोलते हैं कि आरती करने से अगर विशेष व्यक्ति है तो उसकी विशेष ओरा और सामान्य व्यक्ति कि ओरा एकाकार होने लगती है | वैज्ञानिकों की दृष्टि में केवल आभा है तो भी धन्यवाद ! किन्तु आभा के साथ-साथ विचार भी समान होते हैं, साथ ही हमारे और सामनेवाले के शरीर से निकलनेवाली तरंगो का विपरीत स्वभाव मिटकर हमारे जीवन में प्रकाश का भाव पैदा होता है |

आयु-आरोग्य प्राप्ति व शत्रुवृद्धि शमन हेतु

आरती करने से इतने सारे लाभ होते हैं और आरती देखने से भी लाभ होता है : गुरुद्वार पर कि हुई आरती के दर्शन करने से आपके ऊपर शत्रुओं की डाली नही गलती | दीपज्योती आयु-आरोग्य प्रदायक और शत्रुओ कि वृद्धि का शमन करनेवाली है | पड़ोसी या प्रतिस्पर्धी एक-दूसरे के इतने शत्रु नहीं होते जितने मनुष्य जीवन में काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु हैं | तो आरती के दर्शन करने से शत्रुओ कि वृद्धि का शमन होता |

शास्त्रों के अनुसार जो धूप व आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती को लेता है वह अपनी अनेक पीढ़ियों का उद्धार करता है तथा भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है |

ऋषिप्रसाद – दिसम्बर २०२१ से

Sunday, September 5, 2021

आरती क्यों करते है ?

 

हिन्दुओं के धार्मिक कार्यों में संध्योपासना तथा किसी भी मांगलिक पूजन में आरती का एक विशेष स्थान है | शास्त्रों में आरती को ‘आरात्रिक’ अथवा ‘नीराजन’ भी कहा गया है |

पूज्य बापूजी वर्षों से न केवल आरती की महिमा, विधि, उसके वैज्ञानिक महत्त्व आदि के बारे में बताते रहे हैं बल्कि अपने सत्संग – समारोहों में सामूहिक आरती द्वारा उसके लाभों का प्रत्यक्ष अनुभव भी करवाते रहे हैं |

पूज्य बापूजी के सत्संग -अमृत में आता है : “आरती एक प्रकार से वातावरण में शुद्धिकरण करने तथा अपने और दूसरे के आभामंडलों में सामंजस्य लाने की एक व्यवस्था है | हम आरती करते हैं तो उससे आभा, ऊर्जा मिलती है | हिन्दू धर्म के ऋषियों ने शुभ प्रसंगों पर एवं भगवान की, संतो की आरती करने की जो खोज की है वह हानिकारक जीवाणुओं को दूर रखती है, एक-दूसरे जे मनोभावों का समन्वय करती है और आध्यात्मिक उन्नति में बड़ा योगदान देती है |

शुभ कर्म करने के पहले आरती होती है तो शुभ कर्म शीघ्रता से फल देता है | शुभ कर्म करने के बाद अगर आरती करते हैं तो शुभ कर्म में कोई कमी रह गयी हो तो वह पूर्ण हो जाती है | स्कन्द पुराण में आरती की महिमा का वर्णन है | भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं :

मंत्रहीनं क्रियाहीनं यत्कृतं पूजनं मम |

सर्व सम्पूर्णतामेति कृते नीराजने सुत ||

‘जो मन्त्रहीन एवं क्रियाहीन (आवश्यक विधि-विधानरहित) मेरा पूजन किया गया है, वह मेरी आरती कर देने पर सर्वथा परिपूर्ण हो जाता है |’ (स्कन्द पुराण, वैष्णव खंड, मार्गशीर्ष माहात्म्य : ९:३७)

ज्योत की संख्या का रहस्य 



सामान्यत: ५ ज्योतवाले दीपक से आरती की जाती है, जिसे ‘पंचदीप’ कहा जाता है | आरती में या तो एक ज्योत हो या तो तीन हों या तो पाँच हों | ज्योत विषम संख्या (१,३,५,....) में जलाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है | यदि ज्योत की संख्या सम (२,४,६,...) हो तो ऊर्जा - संवहन की क्रिया निष्क्रिय हो जाती है |

अतिथि की आरती क्यों ?

हर व्यक्ति के शरीर से ऊर्जा, आभा निकलती रहती है | कोई अतिथि आता है तो हम उसकी आरती करते हैं क्योंकि सनातन संस्कृति में अतिथि को देवता माना गया है | हर मनुष्य की अपनी आभा है तो घर में रहनेवालों की आभा को उस अतिथि की नयी आभा विक्षिप्त न करे और वह अपने को पराया न पाये इसलिए आरती की जाती है | इससे उसको स्नेह-का-स्नेह मिल गया और घर की आभा में घुल-मिल गये | कैसी सुंदर व्यवस्था है सनातन धर्म की !”

ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०२१ से

कैसा भी बिखरा हुआ जीवन हो, सँवर जायेगा

 

अगर अशांति मिटानी है तो दोनों नथुनों से श्वास लें और ‘ॐ शान्ति:...... शान्ति:’ जप करें और फिर फूँक मार के अशांति को, बाहर फेंक दें | जब तारे नहीं दिखते हों, चन्द्रमा नहीं दिखता हो और सूरज अभी आनेवाले हों तो वह समय मंत्रसिद्धि योग का है, मनोकामना-सिद्धि योग का है | 

इस काल में किया हुआ यह प्रयोग अशांति को भगाने में बड़ी मदद देगा | अगर निरोगता प्राप्त करनी है तो आरोग्यता के भाव से श्वास भरें और आरोग्य का मंत्र ‘नासै रोग हरै सब पीरा | जपत निरंतर हनुमत बीरा ||’ जपकर ‘रोग गया’ ऐसा भाव करके फूँक मारें | ऐसा १० बार करें | कैसा भी रोगी, कैसा भी अशांत और कैसा भी बिखरा हुआ जीवन हो, सँवर जायेगा |


ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०२१ से

Wednesday, August 4, 2021

चिंता, चिडचिडापन व तनाव कम करने हेतु

 

जो व्यक्ति स्नान करते समय पानी में ( ५ मि.ली.) गुलाबजल मिलाकर ‘ॐ ह्रीं गंगायै ॐ ह्रीं स्वाहा |’ यह मंत्र बोलते हुए सर पर जल डालता है, उसे गंगा-स्नान का पुण्य होता है तथा साथ ही मानसिक चिंताओं में कमी आती है और तनाव धीरे-धीरे दूर होने लगता है, विचारों का शोधन होने लगता है, चिडचिडापन कम होता है तथा वह अपने – आपको तरोताजा अनुभव करता है |

ऋषिप्रसाद – अगस्त २०२१ से

सौ गुना फलदायी ‘शिवा चतुर्थी’

 

(१० सितम्बर )

भविष्य पुराण के अनुसार ‘भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का नाम ‘शिवा’ है | इस दिन किये गये स्नान , दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म सौ गुना हो जाते हैं | इस दिन जो स्त्री अपने सास – ससुरे को गुड के तथा नमकीन पूए खिलाती है वह सौभाग्यवती होती है | पति की कामना करनेवाली कन्या को विशेषरूप से यह व्रत करना चाहिए |’

ऋषिप्रसाद – अगस्त २०२१ से

Thursday, July 22, 2021

भाग्य के कुअंक मिटाने की युक्ति

 

आसन बिछाकर प्रणव (ॐकार) का ३ मिनट ह्रस्व (जल्दी-जल्दी) व दीर्घ और ५ मिनट प्लुत ( दीर्घ से अधिक लम्बा ) उच्चारण करना चाहिए | कभी कम-ज्यादा हो जाय तो डरना नहीं | ४० दिन का यह नियम ले लो तो बहुत सारी योग्यताएँ जो सुषुप्त है, वे विकसित हो जायेंगी |  मन की चंचलता मिटने लगेगी, बुद्धि के दोष दूर होने लगेंगे | सदा करते रहो तो बहुत अच्छा |

अपने भाग्य की रेखा बदलनी हो, अपनी ७२,००० नाड़ियों की शुद्धि करनी हो और अपने मन और बुद्धि को मधुमय करना हो तो संध्या के समय १०-१५ मिनट विद्युत-कुचालक आसन बिछाकर जप करें | भाग्य के कुअंक मिटा देगा यह प्रयोग |

Friday, July 16, 2021

भय लगे तो क्या करें ?

 

भय मन को लगता है , चिंता चित्त को लगती है, बीमारी शरीर को लगती है, दुःख मन को होता है.... हम है अपने-आप, हर परिस्थिति के बाप ! हम प्रभु के, प्रभु हमारे, ॐ .... ॐ ..... ॐ ..... ॐ.... आनंद, ॐ माधुर्य ॐ |’ जब भी भय लगे बस ऐसा ॐ ... ॐ..... ॐ.... हा हा हा ( हास्य-प्रयोग करना ).... फिर ढूँढना – ‘ कहाँ है भय ? कहाँ तू लगा है देखें बेटा ! कहाँ रहता है बबलू ! कहाँ है तू भय ?’ तो भय भाग जायेगा | भय को भगाने की चिंता मत कर, प्रभु के रस में रसवान हो जा |

 

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२१ से

क्रोध से हानियाँ और उससे बचने के उपाय

 

पद्म पुराण में आता है : ‘जो पुरुष उत्पन्न हुए क्रोध को अपने मन से रोक लेता है, वह उस क्षमा के द्वारा सबको जीत लेता है | जो क्रोध और भय को जीतकर शांत रहता है, पृथ्वी पर उसके समान वीर और कौन है ! क्षमा करनेवाले पर एक ही दोष लागू होता है, दूसरा नहीं, वह यह कि क्षमाशील पुरुष को लोग शक्तिहीन मान बैठते हैं | किंतु इसे दोष नहीं मानना चाहिए क्योंकि बुद्धिमानो का बल क्षमा ही है |  क्रोधी मनुष्य जो जप, होम और पूजन करता है वह सब फूटे हुए घड़े से जल की भाँति नष्ट हो जाता है |’

क्रोध से बचने के उपाय :

१)     एकांत में आर्तभाव से व सच्चे ह्रदय से भगवान से प्रार्थना कीजिये कि ‘हे प्रभो ! मुझे क्रोध से बचाइये |’

२)     जिस पर क्रोध आ जाय उससे बड़ी नम्रता से, सच्चाई के साथ क्षमा माँग लीजिये |

३)     सात्त्विक भोजन करे | लहसुन, लाल मिर्च एवं तली हुई चीजों से दूर रहें | भोजन चबा-चबाकर कम-से-कम २५ मिनट तक करें | क्रोध की अवस्था में या क्रोध के तुरंत बाद भोजन न करें | भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी ,महाराज भोजन से पूर्व हास्य-प्रयोग करने को कहते थे | अपने आश्रमों में भी भोजन से पूर्व हास्य-प्रयोग किया जाता है, साथ ही श्री आशारामायणजी की कुछ पंक्तियों का पाठ और जयघोष भी किया जाता है तो कभी ‘जोगी रे .....’ भजन की कुछ पंक्तियाँ गायी जाती हैं | इस प्रकार रसमय होकर फिर भोजन किया जाता है | इस प्रयोग को करने से क्रोध से सुरक्षा तो सहज में ही हो जाती है और साथ-ही-साथ चित्त भगवद आनंद, माधुर्य से भी भर जाता है |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२१ से

जीवन को प्रेमाभक्ति, ज्ञान व माधुर्य से भरने का अवसर

 चतुर्मास : २० जुलाई से १५ नवम्बर

चतुर्मास शुरू हो जाता है देवशयनी एकादशी से और कार्तिक की देवउठी एकादशी तक रहता है | इन ४ महीनों में भगवान नारायण योगनिद्रा में, ब्रह्मसुख में , एकांत में, सागर में शयन करते हैं तो जल का तेज, प्रभाव बढ़ जाता है | ऐसे ही साधक श्वासोच्छ्वास में अजपाजप करके ब्रह्मसुख के करीब जाता है  तो ऊसके मन-बुद्धि का प्रभाव बढ़ जाता है | इन ४ महीने में शादी – विवाह और सकाम कर्म करनेवाले को घाटा पड़ेगा किन्तु उपवास, मौन, जप, दान, ध्यान और प्रात: स्नान विशेष हितकारी, पुण्यदायी, साफल्यदायी हैं |

इन ३ महीनों में भोग-विलास, पति-पत्नी का संबंध, स्पर्श ज्यादा हानि करेगा और जीवन संयमी रहा तो जैसे भगवान नारायण ब्रह्म में विराजते हैं ऐसे ही आपको भी ब्रह्मचिंतन, ब्रह्मध्यान, ब्रह्मविश्रांति में बड़ी मदद मिलेगी |

चतुर्मास में विशेष लाभदायी

·      चतुर्मास में सूर्योदय के पहले नदी-स्नान, तालाब-स्नान, सागर-स्नान करें अथवा तो बाल्टी में ३ बिल्वपत्र डालकर घुमा दें या तिल, आँवला और जौ का चूर्ण बना के रखें | थोडा-सा मिश्रण बाल्टी में दाल दें या कटोरी में घोल बना के शरीर पर रगड़ दें फिर ‘ॐ नम:शिवाय, ॐ नम: शिवाय...’ अथवा ‘ब्रह्म ही जलरूप बन के आया हैं’, ऐसा चिंतन करके स्नान करें तो यह पुण्यदायी, पापनाशक, आत्मिक तेजवर्धक स्नान होगा | इसके सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होगा | सप्तधान्य उबटन १ में जौ और तिल है अत: वह उबटन भी स्नान के लिए सुखदायी, आनंददायी होता है | और भक्त को हाथ में जल लेकर ‘यह भगवान विष्णु का चरणोदक है’ ऐसा समझ के वह जल सिर  पर डालना चाहिए | किसी कारण वह नहीं नहा सकता हो तो फिर मानसिक, मांत्रिक अथवा भस्म का स्नान भी किया जा सकता है |

·        दीपदान करनेवाले की बुद्धि, विचार व व्यवहार में ठीक ज्ञान-प्रकाश की वृद्धि होती है |

·    पलाश के पत्तो पर भोजन करनेवाले व्यक्ति की बुद्धि सात्त्विकता- प्रधान होती है और उसे भवान की प्रियता प्राप्त होती है |

·        चतुर्मास में सप्ताह में एक दिन उपवास नहीं कर सकें तो १५ दिन में १ दिन उपवास तो नितांत जरूरी है |

यह अवसर चूकना नहीं चाहिए

  • ४ मास तक भगवान अपने बेसामान, बेसाथी और बेमन भाव में रहते हैं | इन दिनों आप भी ऐसे रहेंगे तो यह आध्यात्मिक उन्नति में मददरूप होगा | अपने जीवन को भगवान की प्रेमाभक्ति से, भगवान के ज्ञान व माधुर्य से भरने का अवसर यह चतुर्मास हैं |
  • तपस्या, साधन-भजन करने का यह चातुर्मास का अवसर चूकना नहीं चाहिए | मैंने किया था ४० दिन का अनुष्ठान, शायद वह चातुर्मास ही होगा जहाँ तक मुझे याद है | और उन ४० दिनों में मुझे जो शक्तियाँ मिली, जो खजाना मिला उसे बाँटते – बाँटते ५० साल हो गये किंतु अब भी उसमें कोई कमी नहीं लग रही है |


ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२१ से


Wednesday, June 23, 2021

स्वास्थ्यरक्षक दैवी उपाय

 

औषधि से भी उफ्चार होता है , मंत्र व सूर्यकिरणों से भी होता है | कई चित्किसा-पद्धतियाँ हैं – प्राकृतिक चित्किसा (नेचुरोपैथी , एलोपैथी आदि | जीवों को सता के, किसीकी हत्या, हिंसा आदि करके जो भी उपचार होता है, वह दानवी उपाय है और अपना मनोबल, बुद्धिबल, मंत्रबल, दैवबल और सुझबुझ के बल से जो स्वास्थ्य-लाभ होता है, वह दैवी उपाय है |

तुम नित्य-शुद्ध-बुद्ध चैतन्य परमात्मा के अभिन्न स्वरूप हो | रोग, बीमारी और मुसीबत आ जायें तो डरो मत | रोग आये तो मन को कर लो एकाग्र कि ‘ रोग आया है |  जो आता है वह जाता है | कई बार रोग आये और गये |’ चित्त को कर दो  प्रसन्न कि ‘यह असावधानी मिटाने को, संयम सिखाने को, तपस्या कराने को आया है |’ और बुद्धि को कर दो निर्भीक कि ‘यह शरीर शाश्वत नहीं तो रोग भी शाश्वत नहीं हो सकता | मन की अवस्था एक जैसी नहीं रहती तो रोग की अवस्था भी एक जैसी नहीं रहेगी | लेकिन मैं सदा एकरस हूँ.... प्रेमस्वरूप,आनंदस्वरूप, शांतस्वरूप ! शरीर के रोगों को और मन के उद्वेगों व विकारों को जाननेवाले हम हैं अपने-आप, हर परिस्थिति के बाप !’ रोग, बीमारियों और कष्टों का प्रभाव दूर हो जायेगा यूँ चटाक-से !

रात को देर से भोजन नहीं करना चाहिए | जितनी देर से भोजन करोगे उतना अम्लपित्त अजीर्ण होता है | सुबह-शाम खाली पेट वज्रासन में बैठो, श्वास बाहर निकाल दो और पेट को २५ बार अंदर-बाहर करो | मन में अग्निदेव के बीजमंत्र ‘रं – रं....’ का जप करो, फिर श्वास ले लो | ऐसा ५ बार करो, कितनी भी मंदाग्नि हो, अम्लपित्त हो और कंधे आदि में ( कच्चे रस के कारण ) जकड़न या दर्द होता हो, सब अपने-आप दूर हो जाता है |

ये सब दैवी उपाय हैं | नहीं तो कैप्सूल खाओ, ऑपरेशन कराओ .... | यह सब कराने के बाद भी क्या होता है ? रोग के ऊपर चादर पड़ जाती है | तुम दैवी उपाय करो न, काहे हो दानवी उपाय करना ? काहे को मानवीय उपायों में भी दवाईयाँ खाना ?



कैसी भी बीमारी हो, सूर्यनारायण को अर्घ्य से गीली हुई मिटटी का तिलक करें और अर्घ्य-पात्र में बचा हुआ थोडा-सा जल हाथ में ले के चिंतन करें :

‘ॐ ह्रां ह्रीं स: सूर्याय नम: | ॐ आरोग्यप्रदायकाय सूर्याय नम: |

(यह बीजसंयुक्त मंत्र है |) मेरे आरोग्य की रक्षा करनेवाले सूर्य भगवान की मैं उपासना करता हूँ, यह जल पान करता हूँ |/ और उस पानी को पी लें | फिर नाभि में सूर्यनारायण का ध्यान करें, स्वास्थ्य-मंत्र जपें और बल का चिंतन करें |

ॐ सूर्याय नम: | ॐ भानवे नम: | ॐ खगाय नम: | ॐ रवये नम: | ॐ अर्काय नम: | .... आदि मंत्रों से सूर्यनमस्कार करने से व्यक्ति ओजस्वी-तेजस्वी व बलवान बनता है, बुद्धि की बढ़ोत्तरी होती है |


हनुमानजी
, भीष्मजी अथवा मेरे गुरूजी के श्रीचित्र को एकटक देखें | नहीं तो अपने सदगुरुदेव को ही देख लेना | काहे को डरना !  ‘मैं निरोग हो रहा हूँ बापू ! मैं निरोग हो रहा हूँ न ?’ बापू बोलेंगे : ‘क्यों नहीं, हो रहा है, हो रहा है |’ – ऐसा करते – करते दैवी उपचार से, अंतरात्मबल से आप निरोग हो सकते हो, बिल्कुल पक्की बात है ! यह ऐसा जादू है कि मन-बुद्धि में अगर आप ठान लो तो बिना दवाई के अथवा सामान्य दवाई से आपके संकल्प के अनुसार हो जायेगा |


ऋषिप्रसाद – जून २०२१ से

समस्त रोगनाशक उपाय

 

स्वास्थ्यप्राप्ति हेतु सिर पर हाथ रख के या संकल्प कर इस मंत्र का १०८ बार उच्चारण करें :

अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् |

नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ||      

‘हे अच्च्युत ! हे अनंत ! हे गोविंद ! – इस नामोच्चारणरूप औषध से समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ .... सत्य कहता हूँ |’


ऋषिप्रसाद – जून २०२१ से

Wednesday, May 5, 2021

हजार एकादशी व्रतों का फल देनेवाला व्रत

 


त्रिस्पृशा एकादशी : २३ मई

एक त्रिस्पृशा एकादशी के उपवास से १००० एकादशी व्रतों का फल प्राप्त होता है तथा इसी प्रकार द्वादशी में पारण करने पर हजार गुना फल माना गया है  | इस एकादशी को रात्रि-जागरण करनेवाला भगवान विष्णु के स्वरूप में लीन हो जाता है |

पद्म पुराण में देवर्षि नारदजी के पूछने पर भगवान शिवजी इस व्रत की महिमा बताते हैं कि  “विद्वन ! देवाधिदेव भगवान ने मोक्षप्राप्ति के लिए इस व्रत की सृष्टि की है इसलिए इसे “वैष्णवी तिथि” कहते हैं |

पूर्वकाल में जब गंगाजी ने भगवान माधव से अपनी पापमुक्ति का उपाय पूछा कि “हृषिकेश ! करोड़ों पापराशियों से युक्त मनुष्य मेरे जल में स्नान करते हैं, उनके पापों और दोषों से मेरा शरीर कलुषित हो गया है | देव ! मेरा वह पातक कैसे दूर होगा ?”

तब भगवान बोले  : “शुभे ! तुम त्रिस्पृशा का व्रत करो | इससे तुम पापमुक्त हो जाओगी | जब एक ही दिन एकादशी, द्वादशी तथा रात्रि के अंतिम प्रहर में त्रयोदशी भी हो तो उसे ‘त्रिस्पृशा’ समझना चाहिए | यह धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली तथा १०० करोड़ तीर्थों से भी अधिक महत्वपूर्ण है | इस दिन भगवान के साथ सदगुरु कि पूजा करनी चाहिए |”

यह व्रत सम्पूर्ण पाप-राशियों का शमन करनेवाला, महा दु:खों  का विनाशक और सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है | इस त्रिस्पृशा के उपवास से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा १००० अश्वमेध और १०० वाजपेय यज्ञों का फल मिलता है | 

यह व्रत करनेवाला पुरुष पितृ कुल, मातृ कुल तथा पत्नी कुल के सहित विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है | 

इस दिन द्वादशाक्षर मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करना चाहिए | 

जिसने इसका व्रत कर लिया उसने सम्पूर्ण व्रतों का अनुष्ठान कर लिया | करोड़ों तीर्थों में जो पुण्य तथा करोड़ों क्षेत्रों (पुण्यस्थानों ) में जो फल मिलता है, वह त्रिस्पृशा के उपवास से मनुष्य प्राप्त कर सकता है | पूर्वकाल में स्वयं ब्रम्हाजी ने इस व्रत को किया था, तदनन्तर अनेक ऋषियों ने भी इसका अनुष्ठान किया फिर दूसरों की तो बात ही क्या हैं !”

ऋषिप्रसाद – मई  २०२१ से

समस्याओं के समाधान का बढिया उपाय

 


कोई भी समस्या आये तो बड़ी ऊँगली (मध्यमा) और अँगूठा मिलाकर भ्रूमध्य के नीचे और तर्जनी ( अँगूठे के पासवाली पहली ऊँगली) ललाट पर लगा के शांत हो जायें | श्वास अंदर जाय तो ‘ॐ’ , बाहर आये तो ‘शांति’ – ऐसा कुछ समय तक करें | आपको समस्याओं का समाधान बढिया मिलेगा |

ऋषिप्रसाद – मई २०२१ से

Sunday, April 4, 2021

सुखमय जीवन की अनमोल कुंजियाँ

 


अक्षय तृतीया को पीपल-परिक्रमा का फल

जो व्यक्ति अक्षय तृतीया ( १४ मई २०२१ ) के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर पीपल को जल अर्पित करके उसकी १०८ परिक्रमाएँ करता है  वह एक वर्ष तक अनेक अनिष्टों से रक्षित रहता है , उसकी संतानें सुखी होती है, उसके कार्य निर्बाध गति से होते है तथा उसे धन एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है |


ऋषिप्रसाद- अप्रैल २०२१ से

Saturday, December 5, 2020

आचमन तीन बार क्यों ?

 


प्राय: प्रत्येक धर्मानुष्ठान के आरम्भ में और विशेषरूप से संध्योपासना में ३ आचमन करने का शास्त्रीय विधान है | धर्मग्रंथों में कहा गया है कि ३ बार जल का आचमन करने से तीनों वेद अर्थात ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं | मनु महाराज ने भी कहा है : त्रिराचमेद्प: पूर्वम | (मनुस्मृति :२.६०)

अर्थात सबसे पहले ३ बार जल से आचमन करना चाहिए | इससे जहाँ कायिक, मानसिक एवं वाचिक – त्रिविध पापों की निवृत्ति होती है वहीँ कंठशोष ( कंठ की शुष्कता) दूर होने और कफ-निवृत्ति  होने से श्वास-प्रश्वास क्रिया में मंत्रादि के शुद्ध उच्चारण में भी मदद मिलती है | प्राणायाम करते समय प्राणनिरोध से स्वभावतः शरीर में ऊष्मा बढ़ जाती है , कभी-कभी तो ऋतू के तारतम्य से तालू सूख जाने से हिचकी तक आने लग जाती है | आचमन करते ही यह सब ठीक हो जाता है |

बोधायन सूत्र के अनुसार आचमन-विधि :

(दायें ) हाथ की हथेली को गाय के कान की तरह आकृति प्रदान कर उससे ३ बार जल पीना चाहिए |

शास्त्र-रीति के अनुसार आचमन में चुल्लू जितना जल नहीं पिया जाता बल्कि उतने ही प्रमाण में जल ग्रहण करने की विधि है जितना कि कंठ व तालू को स्पर्श करता हुआ ह्रदयचक्र की सीमा तक ही समाप्त हो जाय |

पूज्य बापूजी के सत्संग -अमृत में आता है : “संध्या में आचमन किया जाता है | इस आचमन से कफ-संबंधी दोषों का शमन होता है, नाड़ियों के शोधन में व ध्यान-भजन में कुछ मदद मिलती है |

ध्यान-भजन में बैठे तो पहले तीन आचमन कर लेने चाहिए, नहीं तो सिर में वायु चढ़ जाती है, ध्यान नहीं लगता, आलस्य आता है, मनोराज चलता है, कल्पना चलती है | आचमन से प्राणवायु का संतुलन हो जाता है |

आचमन से मिले शान्ति व पुण्याई

‘ॐ केशवाय नम: | ॐ नारायणाय नम: | ॐ माधवाय नम: |” कहकर जल के ३ आचमन लेते हैं तो जल में जो यह भगवदभाव, आदरभाव है इससे शांति, पुण्याई होती है |”

इससे भी हो जाती है शुद्धि

जप करने के लिए आसन पर बैठकर सबसे पहले शुद्धि की भावना के साथ हाथ धो के पानी के ३ आचमन ले लो | जप करते हुए छींक, जम्हाई या खाँसी आ जाय, अपानवायु छूटे तो यह अशुद्धि है | वह माला नियत संख्या में नहीं गिन्नी चाहिए | आचमन करके शुद्ध होने के बाद वह माला फिर से करनी चाहिए | आचमन के बदले ‘ॐ’ सम्पुट के साथ गुरुमंत्र ७ बार दुहरा दिया जाय तो भी शुद्धि हो जायेगी | जैसे, मन्त्र है ‘नम: शिवाय’ तो ७ बार ‘ॐ नम:शिवाय ॐ’ दुहरा देने सेपडा हुआ विघ्न निवृत्त हो जायेगा |

ऋषिप्रसाद – दिसम्बर २०२० से    

  

Tuesday, November 10, 2020

यात्रा की कुशलता व दु:स्वप्न-नाश का वैदिक उपाय

 

जातवेद्से सुनवाम सोममरातीयतो नि दहाति वेद : |

स न: पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्नि: ||

‘जिस उत्पन्न हुए चराचर जगत को जाननेवाले और उत्पन्न हुए सर्व पदार्थों में विद्यमान जगदीश्वर के लिए हम लोग समस्त ऐश्वर्ययुक्त सांसारिक पदार्थो का निचोड़ करते हैं अर्थात यथायोग्य सबको बरतते हैं और जो अधर्मियों के समान बर्ताव रखनेवाले दुष्ट जन के धन को निरंतर नष्ट करता है वह अनुभवस्वरूप जगदीश्वर जैसे मल्लाह नौका से नदी या समुद्र के पार पहुँचाता हैं,  वैसे हम लोगों को अत्यंत दुर्गति और अतीव दुःख देनेवाले समस्त पापाचरणों के पार करता है | वाही इस जगत में खोजने के योग्य है |’ (ऋग्वेद : मंडल १, सूक्त ९९, मंत्र १ )

यात्री उपरोक्त मंगलमयी ऋचा का मार्ग में जप करें तो वह समस्त भयों से छुट जाता है और कुशलपूर्वक घर लौट आता है | प्रभातकाल में इसका जप करने से दु:स्वप्न का नाश होता है |

(वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने में कठिनाई होती हो तो लौकिक भाषा में केवल इनके अर्थ का चिंतन या उच्चारण करके लाभ उठा सकते है | )


ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०२० से

ध्यान का अभ्यास कब करें ?

 

तं पूर्वापररात्रेषु युत्र्जान: सततं बुध: |

लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ||

‘जो विद्वान परिमित आहार करके रात के पहले और अंतिम प्रहर में सदा ध्यानयोग का अब्यास करता है, वह अंत:करण शुद्ध होने प्रे अपने ह्रदय में ही आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है |’ (महाभारत शांति पर्व : १८७.२९)


ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०२० से

जपमाला में १०८ दाने क्यों ?

 


पूज्य बापूजी के सत्संग – वचनामृत में आता है : “शास्त्र में मिल जाता है कि माला में १०८ दाने क्यों ? १०९ नहीं, ११२ नहीं... १०८ ही क्यों ? कुछ लोग २७ दाने की माला घुमाते है, कोई ५४ दाने की माला घुमाते हैं और कोई १०८ दाने की घुमाते हैं | इसका अपना-अपना हिसाब है |

शास्त्रकारों ने जो कुछ विधि-विधान बनाया है वह योग विज्ञान से, मानवीय विज्ञान से, नक्षत्र विज्ञान से, आत्म-उद्धार विज्ञान से – सब ढंग से सोच -विचार के, सूक्ष्म अध्ययन करके बनाया है |

कई आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत है | कोई कहते हैं कि ‘१०० दाने अपने लिए और ८ दाने गुरु या जिन्होंने मार्ग दिखाया उनके लिए, इस प्रकार १०८ दाने जपे जाते हैं |’

योगचूडामणि उपनिषद (मन्त्र ३२) में कहा गया है :

षटशतानि दिवारात्रौ सहस्त्रन्येकविंशति: |

एतत्सङ्ख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ||

‘जीव २१,६०० की संख्या में (श्वासोच्छ्वास में ) दिन-रात निरंतर मंत्रजप करता है |’

हम २४ घंटो में २१,६०० श्वास लेते हैं | तो २१,६०० बार परमेश्वर का नाम जपना चाहिए | माला में १०८ दाने रखने से २०० माला जपे तो २१,६०० मंत्रजप हो जाता है इसलिए माला में १०८ दाने होते हैं | परंतु १२ घंटे दिनचर्या में चले जाते हैं,  १२ घंटे साधना के लिए बचते है तो २१,६०० का आधा कर दो तो १०,८०० हुए | तो श्वासोच्छवास जप में १०,८०० श्वास लगाने चाहिए | अधिक न कर सकें तो कम-से-कम श्वासोच्छवास में १०८ जप करें | मनुस्मृति में और उपासना के ग्रंथो में लिखा है की श्वासोच्छवास का उपांशु जप करो तो एक जप का १०० गुना फल होता है | १०८ को १०० से गुना कर दो तो १०,८०० हो जायेगा | परंतु माला द्वारा साधक को प्रतिदिन कम-से-कम १० माला गुरुमंत्र जपने का नियम रखना ही चाहिए | इससे उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होगा | शिव पुराण, वायवीय संहिता, उत्तर खंड : १४.१६-१७ में आता है कि गुरु से मंत्र और आज्ञा पाकर शिष्य एकाग्रचित्त हो संकल्प करके पुरश्चरणपूर्वक ( अनुष्ठानपूर्वक ) प्रतिदिन जीवनपर्यन्त अनन्यभाव से तत्परतापूर्वक १००८ मन्त्रो का जप करे तो परम गति को प्राप्त होता है |

दुसरे ढंग से देखा जाय तो आपके जो शरीर व मन हैं वे ग्रह और नक्षत्रों से जुड़े हैं | आपका शरीर सूर्य से जुदा हैं, मन नक्षत्रों से जुड़ा है | ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्र २७ माने गये हैं | ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्र २७ माने गये हैं | तो २७ नक्षत्रों की माला सुमेरु के सहारे घुमती है | प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण हैं, जैसे – अश्विनी के ‘चू , चे, चो, ला’, ऐसे ही अन्य नक्षत्रों के भी ४-४ चरण होते हैं | अब २७ को ४ से गुणा करो तो १०८ होते हैं |

तो हमारे प्राणों के हिसाब से , नक्षत्रों के हिसाब से, हमारी उन्नति के हिसाब से १०८ दाने की माला ही उपयुक्त है |”

कुछ अन्य तथ्य

कुछ अन्य तथ्य ऐसी भी मान्यता है कि एक वर्ष में सूर्य २,१६,००० कन्याएँ बदलता है | सूर्य हर ६ – ६ महीने उत्तरायण और दक्षिणायन में रहता है | इस प्रकार ६ महीने में सूर्य की कुल कलाएँ १,०८,००० होती हैं | अंतिम ३ शून्य  हटाने पर १०८ संख्या मिलती है | अत: जपमाला में १०८ दाने सूर्य की कलाओं के प्रतिक हैं | ज्योतिष शास्त्रानुसार १२ राशियों और ९ ग्रहों का गुणनफल १०८ अंक सम्पूर्ण जगत की गति का प्रतिनिधित्व करता है |

शिव पुराण ( वायवीय संहिता, उत्तर खंड : १४.४० ) में आता है :

अष्टोत्तरशतं माला तत्र स्यादुत्तमोत्तमा |

‘१०८ दानों की माला सर्वोत्तम होती है |’


ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०२० से

जप के अर्थ में शांत होने का प्रयोग

 

(पुण्यदायी तिथियों में विशेषरूप से करने योग्य )

ॐ.... ‘ॐ’ माने अखिल ब्रह्मांडनायक परमात्मा | श्वास अंदर गया ‘ॐ’ बाहर आये तो गिनती, श्वास अंदर गया ‘आनंद’ , बाहर आये तो गिनती | ॐ आनंद.... ॐ शांति .... ॐ माधुर्य.... ॐ स्वरूप  ईश्वर में तदाकार होते जाना, बहुत लाभ होगा | स्नान करते समय भी जप करना |

नीच कर्मों का त्याग करके जप करना , मौन रहना और ईश्वरप्राप्ति का विनियोग करके जप करना | आप जप करते हैं तो किस निमित्त करते हैं ,  वह संकल्प पहले दोहराओ तो वह शक्ति उसीमें काम आयेगी |

ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०२० से