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Friday, April 15, 2022

आरोग्यवर्धक जल

 

घर के ईशान कोण में ज्यादा – से – ज्यादा स्थान खुला रहे और उस स्थान पर एक गमले में तुलसी का पौधा लगाकर रखें | तुलसी के गमले के पास मिटटी के कलश में जल भरकर रखें | इस जल को पीने से शरीर में आरोग्य की वृद्धि होती है और मन में पवित्रता, सात्विकता का संचार होता है | 

यदि जल को निहारते हुए पूज्य बापूजी द्वारा बताये गये ॐ नमो नारायणाय | मंत्र का २१ बार जप करके फिर इस जल का पान किया जाय तो यह असाध्य रोगों को भी दूर करने में बहुत मदद करता है | 

(औषधि-सेवन से पूर्व भी इस मंत्र का २१ बार जप विशेष लाभदायी है |) जल में १ – २ तुलसी-पत्ते डालकर जल पीना स्मरणशक्ति और सम्पूर्ण स्वास्थ्य की अनोखी युक्ति है |


ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०२२ से

कैसे हो ग्रीष्मजन्य समस्याओं का समाधान ?

 

(ग्रीष्म ऋतू : २० अप्रैल से २० जून)

ग्रीष्म ऋतू का प्रारम्भ होते ही असहनीय गर्मी तथा उससे जुडी समस्याओं, जैसे-थकान, शरीर में तथा पेशाब में जलन, अपच, दस्त, आँख आना,  मूत्र-संक्रमण , चक्कर आना, लू लगना आदि का प्रादुर्भाव होता है |  गर्मी से राहत पाने के लिए लोग आइसक्रीम, फ्रिज का ठंडा पानी, दही, लस्सी, बर्फ, कोल्ड ड्रिंक्स आदि लेना शुरू कर देते है लेकिन क्या इनसे समस्याओं का हल होता है ? नहीं ... इससे तो वायु की वृद्धि होती है और पाचनशक्ति व गर्मी सहने की क्षमता कम हो जाती है |

इन दिनों में शरीर का स्नेह अंश कम होने से शारीरिक बल स्वाभाविक कम हो जाता है, जिससे थकान या कमजोरी महसूस होने लगती है | इसे दूर करने के लिए लोग सूखे मेवे, मिठाइयाँ  आदि पचने में भारी चीजों का सेवन करते हैं या दिन में बार-बार कुछ – न – कुछ खाते रहते हैं | इससे कमजोरी दूर नहीं होती बल्कि शरीर में अपचित आहार रस ( कच्चा रस) बनकर थकान, कमजोरी व रोग बढ़ जाते हैं | ऐसे में सुंदर उपाय है सत्तू | देशी गाय का घी, मिश्री व पानी मिलाकर बनाया जौ का सत्तू स्निग्ध, पौष्टिक व शीघ्र शक्तिदायी है | नींबू-पुदीने की शिंकजी, गन्ने का रस, आम का पना एवं बेल, गुलाब, पलाश व कोकम का शरबत, नारियल पानी, घर पर बनायी ठंडाई आदि पेय पदार्थ तथा खरबूजा, तरबूज, बिना रसायन के पकाये मीठे आम, मीठे अंगूर, अनार, सेब, संतरा, मोसम्बी, लीची, केला आदि फलों का सेवन लाभदायी है | मुलतानी मिट्टी या सप्तधान्य उबटन से स्नान करना, मटके का पानी पीना, रात को देशी गाय के दूध में मिश्री मिलाकर पीना स्वास्थ्यप्रद है |

कुछ लोग दही को ठंडी प्रकृति का समझकर इस ऋतू में उसका भरपूर सेवन करते है किंतु वास्तव में दही गर्म प्रकृति का होता है और साथ ही पचने में भारी भी होता है | अनुचित काल में एवं अनुचित ढंग से दही का सेवन शरीर के स्त्रोतों में अवरोध कर शरीर में सूजन उत्पन्न करता है इसलिए इस ऋतू में दही का सेवन करना वर्तमान व भविष्य में गम्भीर रोगों को निमन्त्रण देना है | छाछ पीनी हो तो दही में ८ गुना जल मिला के, मथ के,  मिश्री, धनिया, जीरा चूर्ण मिलाकर अल्प मात्रा में ले सकते हैं | स्वस्थ व्यक्ति कभी-कभी अल्प मात्रा में घर में बनाया गया ताजा श्रीखंड ले सकते है | ग्रीष्म में साठी के चावल का सेवन उत्तम है |

इस ऋतू में उत्तम स्वास्थ्य के लिए – रात में देर तक जागना, सुबह देर तक सोये रहना, पति-पत्नी का सहवास, धूप का सेवन, अति परिश्रम, अति व्यायाम व अधिक प्राणायाम से बचें |

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०२२ से

शंख व शंखजल के लाभ

 

शंख के कुछ स्वास्थ्य – प्रयोग

पूज्य बापूजी शंख के स्वास्थ्य-हितकारी प्रयोग बताते हुए कहते हैं : “कोई बच्चा तोतला अथवा गूँगा है तो शंख में पानी रख दो | सुबह का रखा हुआ पानी शाम को, शाम का रखा हुआ पानी सुबह को ५० – ५० मि.ली. उस बच्चे को पिलाओ और उसके गले में छोटा-सा शंख बाँध दो | १ – २ चुटकी ( ५० से १०० मि.ग्रा. ) शंख भस्म शहद के साथ सुबह-शाम चटाओ तो वह बच्चा बोलने लग जायेगा | शंख भस्म अन्य कई रोगों में भी एक प्रभावकारी औषधि है |

गर्भिणी स्त्री शंख का पानी पिये तो उसके कुटुम्ब में २-४ पीढ़ियों तक तोतला – गूँगा बच्चा नहीं पैदा होगा | यह हमारे भारत की खोज है, पाश्चत्य विज्ञानियों की खोज नहीं है |   गूँगे और तोतले व्यक्ति को शंख फायदा करता है और शंख -ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है इतना ही नहीं, दूसरे भी बहुत सारे फायदे बताये गये हैं | जहाँ लोगों का समूह इकट्ठा होता है वहाँ शंखनाद पवित्र, सात्विक माना जाता है |

शंखजल का छिड़काव व पान क्यों ?

शंख में जल भरकर उसे पूजा-स्थान में रखे जाने और पूजा – पाठ, अनुष्ठान होने के बाद श्रद्धालुओं पर उस जल को छिड़कने का कारण यह है कि इसमें कीटाणुनाशक शक्ति होती है और शंख में जो गंधक, फॉस्फोरस और कैल्शियम की मात्रा होती है उसके अंश भी जल में आ जाते हैं | इसलिए शंख के जल को छिड़कने और पीने से स्वास्थ्य सुधरता है |

भगवान कहते हैं : “जो शंख में जल लेकर ॐ नमो नारायणाय मंत्र का उच्चारण करते हुए मुझे नहलाता है वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है | जो जल शंख में रखा जाता है वह गंगाजल के समान हो जाता है | तीनों लोकों में जितने तीर्थ है वे सब मेरी आज्ञा से शंख में निवास करते है इसलिए शंख श्रेष्ठ माना गया है | जो शंख में फूल, जल और अक्षत रखकर मुझे अर्घ्य देता है  उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है | जो वैष्णव मेरे मस्तक पर शख का जल घुमाकर उसे अपने घर में छिडकता है उसके घर में  कुछ भी अशुभ नहीं होता | मृदंग और शंख की ध्वनि तथा प्रणव (ॐकार) के उच्चारण के साथ किया हुआ मेरा पूजन मनुष्यों को सदैव मोक्ष प्रदान करनेवाला है |” (स्कन्द पुराण, वैष्णव खंड)


ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०२२ से

Thursday, March 31, 2022

ग्रीष्म में पौष्टिक व लाभदायी प्रयोग

 

१] २ -३ खजूर तथा २० – २५ किशमिश या मनुक्का ३ – ४ बार अच्छी तरह धोकर रात को मिटटी के पात्र में ( मिटटी – पात्र न हो तो स्टील के पात्र में ) २५० मि.ली. पानी में भिगो दें | किशमिश व मनुक्का कभी-कभी गोमूत्र ( या गोमूत्र अर्क) की कुछ बुँदे पानी में डाल के उससे भी धो सकते हैं | सुबह मसलकर १ चम्मच आँवला या नींबू रस, यथावश्यक मिश्री व सैंधव नमक मिला के पियें | यह शरीर की थकान और कमजोरी दूर करके तुरंत शक्ति प्रदान करनेवाला पौष्टिक पेय है |

२] सौंफ व मिश्री समान मात्रा में कूटकर रखें | १ चम्मच मिश्रण शीतल जल या देशी गोदुग्ध में मिला के सुबह-शाम पियें |यह शीघ्र स्फूर्तिदायक है, साथ ही मस्तिष्क व नेत्रों की कमजोरी, ह्रदयरोग व रक्तविकारों में भी लाभकारी है | सौंफ वात-पित्तशामक, कफ – निस्सारक, जलन, प्यास, उलटी, बवासीर, नेत्ररोग आदि में लाभदायी है | कहा भी गया है :

शीतल जल में डालकर सौंफ गलाओ आप |

मिश्री के संग पान कर मिटे दाह-संताप ||


                                                                                                                 ऋषिप्रसाद – मार्च २०२२ से 

हानिकारक शक्कर का उत्तम विकल्प : देशी गुड़

 

देशी गुड़ स्निग्ध, बल-वीर्यवर्धक, वात-पित्तशामक, पचने में भारी, मूत्र की शुद्धि करनेवाला एवं नेत्र-हितकर है | यह हड्डियों और मासपेशियों को सशक्त बनाने में सहायक है |

पुराना गुड़ पचने में हलका, रुचिकारक, ह्रदय-हितकर, थकान दूर करनेवाला, भूखवर्धक व रक्त को साफ़ करनेवाला है | गुड़ को संग्रहित करके रखें व एक वर्ष पुराना होने पर खायें, यह विशेष हितकारी है | इससे गुड़ के हानिकारक प्रभाव से भी रक्षा होगी |

भैषज्यरत्नावली के अनुसार पुराना गुड़ नहीं मिलने पर नये गुड़ को १२ घंटे तीव्र धूप में रखकर उपयोग कर सकते हैं |’

मैल को निकाले बिना जो गुड़ बनाया जाता है उसके सेवन से पेट में कृमियों की उत्पत्ति होती है | यह मेद, मांस, मज्जा तथा कफ को बढाता है | रासयनिक द्रव्यों के उपयोग से बनाया गया गुड़ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है |

सफेद जहर से बचें

गन्ने के रस में जितने प्रकार के पोषक तत्व विद्यमान होते हैं वे लगभग सभी तत्त्व गुड़ में पाये जाते हैं | अत: मीठे व्यंजनों में शक्कर के स्थान पर गुड़ का उपयोग हितकारी है | शक्कर शरीर को कोई खनिज तत्व या विटामिन नहीं देती बल्कि वह कैल्शियम , विटामिन डी जैसे शरीर के महत्वपूर्ण तत्त्वों का ह्रास कर देती है | वर्तमान में अधिकतर लोगों में पायी जानेवाली अस्थियों की दुर्बलता व भंगुरता का एक मुख्य कारण शक्कर है | यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया सैन फ्रांसिस्को के पीडियाट्रिक न्यूरो-एंडोक्रायनोलॉजिस्ट रॉबर्ट लस्टिंग कहते हैं कि “शक्कर बीमारियाँ बनाती हैं, यह जहर है |

यह ह्रदयरोग, कैंसर, मधुमेह जैसे गम्भीर रोगों का खतरा बढ़ा देती हैं | हानिकारक रसायनों से रहित पुराना देशी गुड़ इसका उत्तम विकल्प है |

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ फार्मास्युटिकल रिसर्च एंड एप्लिकेशन में प्रकाशित एक शोध के अनुसार गुड़ में शरीर के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिज, जैसे – कैल्शियम, फोर्स्फोरस, मैग्नेशियम, पोटैशियम, लौह, जिंक, ताँबा, फोलिक एसिड तथा विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स आदि पाये जाते हैं |

सावधानियाँ :  रसायनरहित देशी गुड़ का ही सेवन करे | गुड़ की प्रकृति गर्म होने से गर्भवती महिलाएँ व पित्त प्रकृतिवाले लोग इसका सेवन अल्प मात्रा में करें | कृमि, मोटापन, बुखार, भूख कम लगना और मधुमेह आदि में गुड़ नहीं खाना चाहिए | गुड़ के साथ दूध व उड़द का सेवन न करें |                     

ऋषिप्रसाद – मार्च २०२२ से

Monday, February 14, 2022

ॐकार – जप से सर्वरोग दूर तथा अमरत्व का बोध

 

अग्नि पुराण में वैद्य – शिरोमणि भगवान धन्वन्तरिजी आचार्य सुश्रुतजी से कहते हैं : “सुश्रुत ! ‘ॐकार’ आदि मंत्र आयु देनेवाले तथा सब रोगों को दूर करके आरोग्य प्रदान करनेवाले हैं | इतना ही नहीं, देह छूटने के पश्यात वे स्वर्ग की भी प्राप्ति करानेवाले हैं | ‘ॐकार’ सबसे उत्कृष्ट मन्त्र है | उसका जप करके मनुष्य अमर हो जाता है – आत्मा के अमरत्व का बोध प्राप्त करता है अथवा देवतारूप हो जाता है |”

 

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

वसंत ऋतू में विशेष उपयोगी कफनाशक पेय

 

(वसंत ऋतू : १८ फरवरी से १९ अप्रैल २०२२ )

आधा लीटर पानी में ३ से ५ तेजपत्ते, २ इंच अदरक के १ या २ टुकड़े (काट के ) और  ३ – ४ लौंग डाल के १० – १५ मिनट उबालें | ठंडा होने पर छान के २ चम्मच शहद मिलाकर रख लें | इसे दिन में तीन – चार बार आधा कप गुनगुने पानी में थोडा-थोडा डाल के पिये | बिना शहद मिलाये मधुमेह में भी ले सकते हैं |

 

लाभ: यह प्रयोग रुचिवर्धक, पाचक, रक्तशोधक, व उत्तम कफशामक है | सर्दी, जुकाम और खाँसी में लाभदायी है | वसंत ऋतू में कफजन्य समस्याएँ ज्यादा होती हैं अत: इन दिनों में यह विशेष उपयोगी है | इसमें लौंग होने से यह प्रयोग श्वासनली में जमा कफ को आसानी से बाहर निकालता है | अदरक वायरस से लड़ने में सहायक है |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

 

पौष्टिक खजूर

 


खजूर रसायन का काम करते हैं | आप सभी इनके लाभों से लाभान्वित हो सकें इस उद्देश्य से इन्हें आश्रमों में सत्साहित्य सेवा केन्द्रों पर व समितियों में भी उपलब्ध कराया गया है |

 

लाभ : १] ये वात-पित्तशामक होते हैं | इनमें विटामिन ए, बी-१, बी-र, बी-३, बी-५ तथा कैल्शियम, लौह, मैग्नेशियम आदि अनेक पोषक तत्त्व पाये जाते हैं |

२] ये तुरंत शक्ति देनेवाले, स्फूर्तिदायक , रोगप्रतिरोधक क्षमता व पाचनशक्ति को बढ़ानेवाले होते हैं |

३] ये ह्दय व मस्तिष्क को शक्ति देते हैं | रक्त को बढाकर रक्ताल्पता को दूर करते हैं | महिलाओं के लिए, विशेषकर गर्भवती महिलाओं के लिए ये बहुत गुणकारी होते हैं |

४] ये शरीर के सभी अंगो को मजबूत करते हैं | इनमें अत्यधिक प्राकृतिक शर्करा पायी जाती है | दूध में चीनी मिलाने की अपेक्षा भिगोये हुए २ – ३ खजूर पीसकर मिलाना शरीर के लिए हितकारी है |

५] आँतों में जो हानिकारक जीवाणु होते हैं उन्हें ये नष्ट करते हैं | पेट व आँतों के संक्रमण, कब्ज आदि समस्याओं में ये लाभदायी है |

सेवन-मात्रा : बड़े ३ से ५ एवं बच्चे २ से ४ खजूर अच्छी तरह धोकर रात को भिगो के सुबह खायें |

 

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

शारीरिक – मानसिक आरोग्य हेतु संजीवनी बूटी : पैदल भ्रमण

 


प्रात: पैदल भ्रमण एक सुंदर व्यायाम है | यह संजीवनी बूटी के समान गुणकारी है | भ्रमण करते हुए वायु स्नान या सेवन से शरीर में तेज, ओज, बल, कांति, स्फूर्ति, उत्साह एवं आरोग्य का संचार होता है, चित्त प्रसन्न होता है |

 

एक कहावत है : सौ दवा, एक हवा | ऋग्वेद ( मंडल १०, सूक्त १८६, मंत्र १ ) में प्रार्थना की गयी है : हमारे ह्रदय के लिए शातिदायक, वैभवकारक, औषधिरूप वायु प्राप्त हो अर्थात हमें निरोग, पुष्टिकारक व आयुवर्धक उत्तम वायु मिलती रहे |

 

पैदल भ्रमण दिनचर्या कका एक अंग हो

भारत में प्राचीन काल से ही पैदल चलने का प्रचलन है | इसीका परिणाम है कि हमारे देश के लोग उतने मोटे व बीमार नहीं होते जितने पाश्चात्य देशों के होते हैं | बच्चे हों या बुजुर्ग, महिला हो या पुरुष सभी आयु-वर्ग के व्यकित्यों के लिए प्रात: पैदल भ्रमण नि:शुल्क औषधि है |

पूज्यश्री कहते है : “प्रात: ब्राह्ममुहूर्त में वातावरण में निसर्ग की शुद्ध एवं शक्तियुक्त वायु का बाहुल्य होता है, जो स्वास्थ्य के लिए हितकारी है |

 

भ्रमण शरीर के पृष्ट-भाग कि मांसपेशियों को मजबूत प्रदान करता है | यह रक्तवाहिकाओं को खोल देता है, जिससे मांसपेशियों में ऑक्सीजन और पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाती है | पैदल भ्रमण पीठ के निचले भाग की मांसपेशियों में जमा विषाक्त द्रव्यों को निकालकर लचीलापन प्रदान करता है | यह कैंसर, ह्रदयरोग, कमर-दर्द, श्वास आदि रोगों में लाभदायी है | शोधकर्ताओं के अनुसार पैदल चलने से शरीर में एंडोर्फिन नामक रसायन की मात्रा बढती है जो प्राकृतिक दर्द-निरोधक है | प्रचुर मात्रा में भ्रमण चिंता, उदासी, थकान, उत्साह का अभाव आदि तनाव के लक्षणों में काफी कमी ला देता है | इससे एकाग्रता, प्रश्न हल करने की शक्ति, स्मृति व संज्ञानात्मक क्रियाओं में वृद्धि होती है |

 

पैदल भ्रमण का उत्तम समय क्या और कितना करें भ्रमण ?

पैदल भ्रमण का उत्तम समय क्या और कितना करें भ्रमण ? सायंकाल कर सकते है | प्रात: भ्रमण से दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है |

२ -३ मील ( ३ से ५ कि.मी.) चल सकें तो अच्छा, नहीं तो प्रात:काल गुनगुना या सामान्य पानी पीकर खुली हवा में आरम्भ में आधा किलोमीटर से २ -३ किलोमीटर तो कोई भी स्वस्थ व्यक्ति आसानी से टहल सकता है |

 

हो सके तो कुछ समय पंजो के बल चलें | इससे पेट में संचित मलो का सरलता से निष्कासन होगा | जहाँ तक हो सके अकेले ही भ्रमण करें |

 

वसंत ऋतू (१८ फरवरी से १९ अप्रैल) आने पर शीत ऋतू में शरीर में संचित हुआ कफ प्रकुपित होने से जठराग्नि मंद हो जाती है | आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार वसंत ऋतू में पैदल चलना बहुत ही हितकारी है | वसन्ते भ्रमणं पथ्यम | पैदल भ्रमण से शरीर में मृदुता, हलकापन व स्फूर्ति आती है और भूख भी खुलकर लगती है |

 

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२  

 

होली

 

होली : १७ मार्च, धुलेंडी : १८ मार्च

होली ऋतू-परिवर्तन का उत्सव है | होली के बाद २०-२५ दिन नीम के २५-२० कोमल पत्ते और १-२ काली मिर्च खानी चाहिए तथा १५-२० दिन बिना नमक का अथवा बहुत ही कम नमकवाला भोजन करना चाहिए, जिससे वर्षभर स्वास्थ्य की सुरक्षा रहे |


    ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२२ से

Wednesday, January 26, 2022

औषधीय गुणों से भरपूर – हल्दी


 प्राचीन काल से ही भोजन, घरेलू उपचार व आयुर्वेदिक औषधि के रूप में तथा मांगलिक कार्यो में हल्दी का उपयोग होता आ रहा है | हल्दी रक्तशुद्धिकर होने से शरीर के सभी अंगों पर कार्य करती है | यह यकृत को बलवान बनाती है | रस, रक्त, मेद व शुक्र धातुओं की शुद्धि का कार्य कर असंख्य रोगों से रक्षा करती है एवं शरीर का बल बढाती है | हल्दी में कई प्रकार के जीवाणुओं को नष्ट करने तथा विष का नाश करने का सामर्थ्य पाया जाता है |

 

चरक संहिता में इसे ‘बिषघ्नी’ व ‘कुष्ठघ्नी’ ( त्वचा-रोगनाशक) कहा गया है | यह उत्तम कांतिवर्धक है | उष्ण होने से कफ-वातनाशक और कडवी होने से पित्तशामक भी है | हल्दी का प्रयोग मुख्यत: रक्त व त्वचा विकार, मधुमेह आदि प्रमेह, कृमि, सूजन तथा कफजन्य रोग जैसे – जुकाम, खाँसी, दमा, गला बैठ जाना आदि में किया जाता है | यह रक्त की वृद्धि करती है तथा रक्तस्राव को शीघ्र रोकती है | आमदोष का पाचन करनेवाली होने से यह बुखार, दस्त, पेचिश व संग्रहणी में उपयोगी है | यह शीतपित्त में बहुत गुणकारी है | प्रसूति के पश्च्यात गर्भाशय की शुद्धि व उसे बल देने के लिए हल्दी का सेवन अवश्य करना चाहिए | इसमें माता का दूध भी शुद्ध हो जाता है |

सर्दियों में थोड़ी-सी कच्ची हल्दी नियमितरूप से लेना बहुत लाभदायक है | इससे कई बीमारियों से रक्षा होती है |

बाजारू मिलावटी हल्दी कि अपेक्षा घर कि पीसी हुई शुद्ध हल्दी का उपयोग करें | हल्दी के सूखे कंद पानी में उबालने से नर्म हो जाते है | फिर उन्हें सुखाकर ऊपर का छिलका उतार के पीस लिया जाता है |

प्रमेय कि उत्तम औषधिप्रमेह

प्रमेह ( २० प्रकार के मूत्र-संबंधी विकार, जैसे- मधुमेह, शुक्रमेह आदि) के लिए हल्दी श्रेष्ठ औषधि है |

शुक्रमेह अर्थात मूत्र के साथ शुक्र धातु के जाने कि समस्या में १ ग्राम हल्दी का चूर्ण २० मि.ली. आँवले के रस में अथवा ३ से ५  ग्राम आँवला चूर्ण व १ चम्मच शहद में मिलाकर सेवन करें | इससे थोड़े ही दिनों में लाभ होता है |

श्वेतप्रदर में हल्दी के काढ़े में १ चम्मच शहद मिलाकर पीने से राहत मिलती है तथा गर्भाशय की शुद्धि व पुष्टि भी होती है |

कुछ औषधीय प्रयोग

१] बवासीर : हल्दी को देशी गाय के घी में घिसकर बवासीर पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है |

२] आँख आना : एक भाग हल्दी को २० भाग पानी में उबाल के काढ़ा बना लें एवं छान के ठंडा कर लें | इसकी २ – २ बूँदे आँख में दिन में दो बार डालें | इस ठंडे काढ़े में भीगे हुए सूती कपड़े से आँखों को ढकें | इससे आँख कि वेदना कम होती है तथा कीचड़ आना भी कम होता है |

३] सुजाक रोग में : इसमें पेशाब गाढ़ा, वेदनायुक्त, बार-बार और थोडा-थोडा होता है | २०० मि.ली. पानी में २ ग्राम हल्दी और ६ ग्राम आँवला चूर्ण मिलाकर धीमी आँच पर उबालें | पानी आधा शेष रहने पर छानकर गुनगुना पियें | इससे पेशाब की जलन कम होती है, पेशाब व मल साफ़ आने लगते हैं |

४] चोट एवं मोच होने पर : गिरने अथवा किसी प्रकार से अंदरूनी चोट पहुँची हो तो १ – २ ग्राम हल्दी को गुड़ के साथ खाने से अथवा दूध में हल्दी डालकर उबाल के लेने से दर्द में राहत मिलती है | अंदरूनी चोट व मोच पर हल्दी का गर्म लेप करने से भी लाभ होता है | चोट लगकर रक्तस्त्राव हो रहा हो तो हल्दी का चूर्ण लगाने से बह तुरंत बंद हो जाता है, घाव जल्दी भर जाता है व विषाणुओं के संक्रमण से रक्षा भी होती है |



लोककल्याण सेतु – जनवरी २०२२ से     

Friday, January 7, 2022

थकान मिटाने हेतु

 

ध्यान-भजन करने बैठे और थकान लगे तो क्या करे ? पलथी मार के बैठो और शरीर को चक्की कि नाई गोल घुमाओ | अनाज पीसने कि हाथ्वाली चक्की घूमती है न गोल, ऐसे थोड़ी देर घुमाओ, फिर उसकी विपरीत दिशा में भी घुमाओ | 

फिर अपने-आप घूमेगा थोड़ी देर |इससे थकान मिटेगी, ताजगी आयेगी |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

कलह, धन-हानि व रोग-बाधा से परेशान हों तो ....

 

घर में कलहपूर्ण वातावरण, धन-हानि एवं रोग-बाधा से परेशानी होती हो तो आप अपने घर में मोरपंख कि झाड़ू या मोरपंख पूजा-स्थल में रखें | 

नित्य नियम के बाद मन-ही-मन भगवन्नाम या गुरुमंत्र का जप करते हुए इस पंख या झाड़ू को प्रत्येक कमरे में एवं रोग-पीड़ित के चारों तरफ गोल-गोल घुमाये |

कुछ देर ‘ॐकार ‘ का कीर्तन करें-करायें | ऐसा करने से समस्त प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है तथा ऊपरी एवं बुरी शक्तियों का प्रभाव भी दूर हो जाता है |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

स्वस्थ जीवन व ध्यान-भजन में उन्नति हेतु

 

जिह्वा के गुलाम न बनकर सात्त्विक, ताजा आहार ही लेना, भूख से थोडा कम खाना तथा पेट साफ़ रखना – यह स्वस्थ जीवन के लिए तो जरूरी है ही, साथ ही ध्यान-भजन में मन लगने व शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी अत्यावश्यक है | कहा भी गया है :

 पेट सही तो सब सही, पेट खराब तो सब खराब |

कम खाओ, गम खाओ | पेट पर ध्यान दो |

लंघन अर्थात उपवास स्वास्थ्य का परम हितैषी एवं रोगी का परम मित्र है | वाग्भट्टजी ने इसे परम औषध कहा है : ‘लड़घनं परमौषधम |’

अष्टांगह्रदय (सूत्रस्थान : २.१९ ) में आता है: जीर्णे हितं मितं चाधान्न |’ पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात जो हितकर भोजन हो उसे भूख से थोड़ी कम मात्रा में खायें |’ यह स्वास्थ्य का मूल मन्त्र है |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

मखाने (कमल बीज) की बल, वीर्य व शक्ति वर्धक पौष्टिक खीर

 


लाभ : यह खीर रक्त, बल-वीर्य वर्धक व उत्तम पित्तशामक है | अनिद्रा, कमजोरी, धातु कि दुर्बलता, सगर्भावस्था, प्रदररोग, प्रसब के बाद की दुर्बलता और पित्त-प्रकोप से उत्पन्न जलन आदि में लाभदायी है |

मखाना (कमल बीज) हड्डियों को मजबूत करता है एवं कब्ज में फायदेमंद है | इसमें विटामिन बी-१ पाया जाता है, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं के कार्यों में मदद करता है | आँखों की कमजोरी, जोड़ों के दर्द, उच्च रक्तचाप व ह्रदयरोगों में यह हितकर हैं | बुढापे में भी यह लाभदायी है, त्वचा में झुर्रियाँ नहीं पड़ने देता |

 

विधि : एक बर्तन में १ छोटा चम्मच देशी घी हलका-सा गरम करके उसमें थोड़ी-सी खसखस डालकर उसका कच्चापन दूर होने तक थोड़ी देर सेंक लें | इसमें १ गिलास दूध, थोडा-सा पानी, ५-१० ग्राम मखाना (कमल बीज)  और स्वादानुसार मिश्री डालकर धीमी आँच पर ५ मिनट उबालें | खीर तैयार है |

सुबह गुनगुनी  खीर का सेवन करें | खीर खाने के कम-से-कम २ घंटे तक कुछ भी न खायें | इसे बिना मिश्री के मधुमेह में भी ले सकते हैं |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

खजूर की पाचक व पौष्टिक चटनी



बड़ी उम्र में भूख कम हो जाती है | भोजन पचता नही. हैं तो फिर गैस, अपच, कब्ज जैसी बीमारियाँ भी होती है | २ – ३ खजूर अच्छी तरह धोकर गुठली निकाल दो | ५ ग्राम अदरक, थोडा-सा सेंधा नमक और काली मिर्च ले लो | पुदीना, धनिया भी डालना तो तो डाल सकते हो | 

इन सबकी चटनी बना लो और वह खा लो | फिर देखो तुम कितनी रोटी हजम करते हो ! इससे पेट भारी नहीं रहता है | यह चटनी पौष्टिक और बलप्रद भी है |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

गुणकारी व लाभदायी खजूर- तिल पाक

 सामग्री : १ किलो खजूर, २५० ग्राम सफेद तिल, २५० ग्राम मिश्री, ५० ग्राम गोंद एवं १०० ग्राम देशी घी |

विधि : तिलों को कड़ाही में हलका – सा सेंक लें | गोंद एवं खजूर को अलग-अलग पीस लें | अब देशी घी में गोंद डालकर धीमी आँच पर भूने फिर इसमें खजूर तथा तिल मिला के भून लें | अंत में मिश्री मिला दें |

सेवन – मात्रा : सुबह खाली पेट २० से २५ ग्राम |

गुण और उपयोग : खजूर एक उत्कृष्ट रक्तवर्धक है | तिलों में कैल्शियम एवं लौह तत्त्व दोनों प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं | तिल दाँत, हड्डी, त्वचा और बालों के लिए भी बहुत गुणकारी हैं | खजूर एवं तिलों से बने इस पाक के सेवन से रक्ताल्पता, शारीरिक दुर्बलता और थकावट दूर हो जाती है | कमर-दर्द, गृध्रसी और मस्तिष्क-दौर्बल्य को दूर करने के लिए यह प्रयोग बहुत लाभदायी है |

सावधानी : इस पाक में तिल होने से इसका सेवन दूध के साथ नहीं करना चाहिए |

 

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

शरीर को स्वच्छ व पुष्ट करनेवाला गेहूँ का चोकर

कई लोग गेहूँ के आटे को छानकर उसके चोकर (भूसी) को व्यर्थ समझ के फेंक देते है पर वह चोकर हमारे लिए बहुत ही लाभकारी है | गेहूँ के चोकर में निहित पोषक तत्त्वों व रेशों के कारण यह स्वास्थ्य-प्रदायक व रोग-निवारक है | यह पाचन-संस्थान को मजबूती देता है | आँतों एवं रक्त कि शुद्धि कर बल, स्फूर्ति व वीर्य कि वृद्धि करता है | कफ व मल को निष्कासित करता है | इस कारण यह शारीरिक दुर्बलता, खाँसी, दमा, कब्ज, मधुमेह, ह्रदयरोग, मोटापा आदि में लाभदायक है | चोकर प्रोटीन का उत्तम स्त्रोत है | इसमें भरपूर मात्रा में रेशे पाये जाते हैं | सामान्यत: दैनिक २५-३० ग्राम रेशों की आवश्यकता पूरी हो जाती है  जो कि ६०-७० ग्राम चोकर से पूरी हो जाती है |

चोकर में जिंक, मैग्नेशियम, ताँबा, मैगनीज, फॉस्फोरस एवं विटामिन बी -१, बी-२, बी-३, बी-५ तथा विटामिन ई आदि पोषक तत्त्व पाये जाते हैं | वैज्ञानिक अनुसंधानो के अनुसार चोकर रक्त में इम्यूनो-ग्लोब्युलिंस की  मात्रा बढाता है, जिससे शरीर की रोगप्रतिकारक क्षमता बढती है |

चोकर प्री-बायोटिक्स का उत्तम स्त्रोत है, जो हमारी आँतों में रहनेवाले हितकारी जीवाणुओं का आहार है | इससे उन जीवाणुओ की वृद्धि होकर आँते स्वस्थ होती है | यह मल की मात्रा व आँतों की क्रियाशीलता व मजबूती को बढाकर आँतों में चिपके हुए मल को साफ़ करता है |

चोकर के प्रयोग से बड़ी आँत एवं मलाशय के कैंसर से रक्षा होती है | यह उच्च रक्तचाप, बवासीर तथा भंगदर से रक्षा करता है | आमाशय के घावों को ठीक करता है तथा कोलेस्ट्रॉल को संतुलित करके मोटापा एवं ह्रदयरोग से भी रक्षा करता है | अत: अति लाभकारी चोकर को फेंकें नहीं, चोकरयुक्त ताजे आटे का ही प्रयोग करें | भूलकर भी बाजार में उपलब्ध चोकरसहित महीन आटे का उपयोग न करें, यह अनेक स्वास्थ्य-समस्याओं को उत्पन्न करता है |

चोकर के कुछ पुष्टिकर प्रयोग    

चोकर के लड्डू : ५०० ग्राम चोकर के कड़ाही में ३-४ चम्मच देशी घी में सेंक लें | इसमें २५० ग्राम गुड़, १०० ग्राम खजूर, ५० ग्राम किशमिश या मनुक्का व थोड़ी इलायची मिलाकर खरल में कूट के इसके लड्डू बना लें | ये लड्डू पुष्टिकारक तथा रक्त व वल-वीर्य वर्धक है |

चोकर का हलवा : ५० ग्राम चोकर को सेंक लें | एक गिलास खौलाते हुए पानी में ५० ग्राम गुड़ घोल दें | इसमें सेंका हुआ चोकर डालकर धीमी आँच पर अच्छे- से पकायें | फिर २ चम्मच घी डाल के नीचे उतार लें | चाहें तो इलायची, काजू, बादाम अथवा किशमिश आदि भी डाल सकते हैं | यह हलवा स्वादिष्ट, सुपाच्य तथा कब्ज में लाभदायी है |

पौष्टिकता से भरपूर चोकर की खीर :चोकर थोड़ी देर भिगोकर रखें | इसे कम पानी में धीमी आँच पर उबालें | पकने पर इसमें दूध और स्वादानुसार मिश्री व खजूर डाल के थोड़ी देर उबालें | यह पौष्टिक खीर ऊर्जा देनेवाली, रक्त बढानेवाली व कब्ज निवारक है |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२२ से

Thursday, December 30, 2021

भूखवर्धक एवं वात-कफशामक उत्तम औषधि – अदरक

 


रोगों से रक्षा के लिए जठराग्नि को प्रदीप्त रखना अत्यंत आवश्यक है | इसके लिए अदरक का सेवन विशेष हितकारी है | आयुर्वेद के ग्रंथ भावप्रकाश निघंटु में आता है :

भोजनाग्रे  सदा पथ्यं लवणार्दकभक्षणम् |

अग्निसन्दीपनं रुच्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम् ||  

‘भोजन से (आधा घंटा) पहले (सेंधा) नमक व अदरक का सेवन करना सदा पथ्यकर है | यह जठराग्नि  को प्रदीप्त करनेवाला, रुचिकारक तथा जिह्वा व कंठ की शुद्धि करनेवाला हैं |’

 

अदरक उष्ण , तीक्ष्ण, वात-कफनाशक, भूख व भोजन में रूचि बढानेवाला एवं भोजन पचाने में सहायक है | अदरक को सुखाकर बनायी गयी सोंठ सप्तधातुओं का निर्माण कर वीर्यवर्धन का कार्य करती है | अदरक तथा सोंठ वात एवं आमदोश को मिटाकर दर्दनाशक का कार्य करते हैं | अदरक ह्रदय एवं रक्तवहन संस्थान को बल प्रदान करता है | यह सर्दी, जुकाम व दमें में लाभकारी है |

यह गठिया, लकवा, कम्पवात (सिर व हाथ का कम्पन), ग्रुधसी, कमरदर्द आदि वायु-संबंधी बीमारियों में उत्तम व सर्वसुलभ औषधि है | इसका सेवन हिचकी, उलटी, अजीर्ण, अफरा (गैस), पेटदर्द, कृमि, कब्ज, खाँसी, हाथीपाँव आदि रोगों में भी लाभदायी है |

 

सर्दी, खाँसी व दमे में लाभकारी प्रयोग

१ इंच अदरक के छोटे –छोटे टुकड़े कर लें | थोडा-सा गुड़ लेकर उसे गर्म करें | गुड़ पिघल जाने पर अदरक को उसमें अच्छी तरह मिलायें और उतार लें | गुनगुना रहने पर इसका सेवन करें | यह प्रयोग रात को सोते समय करें, फिर पानी से कुल्ला करें किन्तु पानी न पियें | इससे सर्दी, जुकाम, खाँसी व दमे में विशेष फायदा होता है |

 



अदरक पाक

५०० ग्राम कद्दूकश किया हुआ अदरक, ५०० ग्राम पुराना गुड़ और देशी गाय का १२५ ग्राम शुद्ध घी लें | अदरक को घी में लाल होने तक भून लें | गुड़ कि चाशनी बनाकर उसमें भूना हुआ अदरक तथा इलायची, जायफल, जावित्री, लौंग, दालचीनी, काली मिर्च व नागकेशर का ६ – ६ ग्राम (आधा छोटा चम्मच) पूर्ण मिला के पाक को सुरक्षित रख लें |

१० से २० ग्राम पाक सुबह-शाम चबाकर खायें | यह उत्तम वात-कफशामक, भूखवर्धक, पाचक, मल-निस्सारक, रुचिप्रद व कंठ के लिए हितकर है | दमा, खाँसी, जुकाम, आवाज बैठ जाना, अरूचि आदि कफ-वातजन्य विकारों में व मंदाग्नि, कब्ज, भोजन के बाद पेट में भारीपन, अफरा अथवा शरीर के किसी भी अंग में होनेवाले दर्द में इस पाक के सेवन से बहुत लाभ होता है | शरीर में चुस्ती व स्फूर्ति भी आती है |

 


अदरक की चटनी

अदरक, हरा धनिया, थोड़ी-सी हरी मिर्च, नमक, नींबू आदि मिलाकर बनायी गयी चटनी रुचिकर एवं स्वास्थ्य के लिए उत्तम है |

 

सावधानी : उष्ण और तीक्ष्ण होने के कारण अदरक का प्रयोग बुखार, पेशाब में रुकावट, शरीर के किसी भी अंग से खून बहना, घाव, जलन आदि में तथा ग्रीष्म व शरद ऋतुओं में वर्जित है | पित्तजन्य व्याधिवाले व्यक्ति इसका उपयोग वैद्यकीय सलाहानुसार करें |

 

लोककल्याण सेतु – दिसम्बर २०२१ से

Saturday, December 11, 2021

चॉकलेट के घातक दुष्परिणामों से बचकर अपनायें स्वास्थ्य-हितकर तुलसी गोली !

 


पूज्य बापूजी के सत्संग वचनामृत में आता है : “चॉकलेट से बहुत हानि होती है | इसमें कई रसायन पड़ते हैं | इससे चॉकलेट खानेवाले बच्चों में मानसिक व्यग्रता, उत्तेजना, अवसाद, क्रोध, सिरदर्द, पेटदर्द, जोड़ों का दर्द और दाँतों के रोग बढ़ जाते हैं तथा स्वभाव चिडचिडा हो जाता है |

चॉकलेट बनानेवाले आपकी जेब के और आपके बच्चों के स्वास्थ्य के दुश्मन हैं | इसलिए चॉकलेट बच्चों को भूलकर भी नहीं खिलाना चाहिए | हमने एक टॉफ़ी ( तुलसी गोली) बनवायी, जिसमें त्रिकुट ( सोंठ, काली मिर्च व पीपर ) है | इसके सेवन से बच्चे के पेट के कृमि मिट जायेंगे, उसको कफ व खाँसी हो तो वे भी दूर हो जायेंगे, भूख भी अच्छी लगेगी और टॉफी खाने का स्वाद भी आयेगा |”

कई शोधों के बाद वैज्ञानिक भी अब यह बात बोलने लगे हैं कि चॉकलेट का सेवन कई घातक बीमारियों का कारण है |

चॉकलेट में पायें जानेवाले हानिकारक तत्त्व व उनके घातक दुष्परिणाम

चॉकलेट में कैफीन, सीसा, कैडनियम, थियोब्रोमाइन, वैसोएक्टिव एमाईस, सैच्युरेटेड फैट्स व अतिरिक्त शर्करा, थियोफिलिन, ट्रिप्तोफान जैसे हानिकारक तत्त्व पाये जाने से इसका सेवन कई प्रकार की विकृतियाँ पैदा करता है, जैसे –

१] बौद्धिक विकास में रुकावट होती है |

२] रक्तचाप बढ़ता है | यकृत, गुर्दों और हड्डियों को हानि पहुँचती हैं |

३] अपच, पेटदर्द, सिरदर्द, अरुचि, जी मिचलाना, उलटी, दस्त, अनिद्रा, चिडचिडापन, चक्कर आना, बेचैनी, ह्रदयरोग, मोटापा, दंतक्षय, त्वचा का लाल होना, पेशाब में कठिनाई, त्वचा पर चकत्ते, साँस लेने में तकलीफ, थकान आदि समस्याएँ होती है |

अत: हानिकारक द्रव्यों से युक्त चॉकलेट का सेवन करने की अपेक्षा स्वास्थ्य, स्मृति व बल वर्धक तुलसी गोलियों का सेवन करें | ये तुलसी के बीज, सोंठ, काली मिर्च, पीपर आदि बहुगुणी औषधियों से युक्त होने से सभीके लिए लाभदायी है |

       ऋषिप्रसाद – दिसम्बर २०२१ से