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Sunday, November 21, 2021

यदि पुण्यात्मा व उत्तम संतान चाहते हैं तो .....

 


महान आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन उसके लिए संयमी पति- पत्नी की आवश्यकता होती हैं | अत: उत्तम संतान की इच्छावाले दम्पति गर्भाधान से पहले अधिक- से- अधिक ब्रह्मचर्य का पालन करें व गुरुमंत्र का जप करें | गर्भाधान के पहले और गर्भाधान के समय पति-पत्नी की मानसिक प्रसन्नता बहुत अच्छी होनी चाहिए | इसलिए अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु सदगुरु या इष्टदेव से प्रार्थना करें, फिर गर्भाधान करें | २२ जून २०२२ तक का समय तो गर्भाधान के लिए अतिशय उत्तम हैं |

गर्भाधन के लिए अनुचित काल

पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि ( जन्माष्टमी, श्रीराम नवमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि   आदि ), श्राद्ध के दिन, प्रदोषकाल ( १. सूर्यास्त का समय, २. सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे बाद तक का समय , ( क्षयतिथि दिखें आश्रम में सत्साहित्य सेवा केन्द्रों पर व समितियों में उपलब्ध कर्मयोग दैनंदिनी एवं मासिक धर्म के प्रथम ५ दिन , माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, संध्या के समय एवं दिन में समागम या गर्भधान करना भयंकर हानिकारक है | दिन के गर्भाधान से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है |

शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, नहीं तो आसुरी, कुसंस्कारी या विकलांग संतान पैदा होती है | संतान नही भी हुई तो भी दम्पति को कोई खतरनाक बीमारी हो जाती है |

गर्भधान के पूर्व विशेष सावधानी

अपने शरीर व घर में धनात्मक ऊर्जा आये इसका तथा पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए | महिलाओं को मासिक धर्म में भोजन नहीं बनाना चाहिए तथा उन दिनों में अपने हाथ भोजन परिवारवालों को देकर उनका ओज, बल और बुद्धि क्षीण करने की गलती कदापि नहीं करनी चाहिए |

गर्भाधान घर के शयनकक्ष में ही हो, होटलों आदि ऐसी-वैसी जगहों पर न हो |

ध्यान दें : उत्तम समय के अलावा के समय में भी यदि गर्भाधान हो गया हो तो गर्भपात न करायें बल्कि गर्भस्थ शिशु में आदरपूर्वक उत्तम संस्कारो का सिंचन करें | गर्भपात महापाप हैं, जिसका प्रायश्चित मुश्किल है |

विशेष : उत्तम संतानप्राप्ति हेतु महिला उत्थान मंडल के दिव्य शिशु संस्कार केन्द्रों का भी लाभ ले सकते हैं |

सम्पर्क :  ९१५७३८९७०६, ९१५७३०६३१३

उत्तम सन्तानप्राप्ति में सहायक विस्तृत जानकारी हेतु पढ़े आश्रम में सत्साहित्य सेवा केन्द्रों पर व समितियों में उपलब्ध पुस्तक दिव्य शिशु संस्कार |

सम्पर्क : (०७९) ९१२१०७३०

ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०२१ से

Tuesday, August 10, 2021

सीमन्तोन्नयन संस्कार क्यों ?

 

सोलह संस्कारों में तीसरा संस्कार होता है  सीमन्तोन्नयन | इसका उद्देश्य गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु व गर्भवती स्त्री की रक्षा करना तथा गर्भवती स्त्री को मानसिक बल प्रदान करते हुए उसके ह्रदय में प्रसन्नता, उल्लास और सांत्वना उत्पन्न है और गर्भस्थ शिशु के मस्तिष्क आदि को बलवान बनाना है |

यह संस्कार  गर्भावस्था के चौथे, छठे या आठवें  मास में किया जाता है क्योंकि ४ महीने के बाद गर्भस्थ शिशु के अंग – प्रत्यंग प्रकट हो जाते हैं और चेतना – संस्थान – ह्रदय के निर्माण हो जाने से गर्भ में चेतना का प्राकट्य हो जाता है, जिससे उसमें इच्छाओं का उदय होने लगता है | वे इच्छाएँ माता के ह्रदय में प्रतिबिब्मित होकर प्रगट होती है |

सीमन्तोन्नयन संस्कार में गर्भस्थ बालक का पिता मंत्रोच्चारण करते हुए शास्त्रवर्णित वनस्पतियों द्वारा गर्भिणी पत्नी से सिर की माँग (सीमंत) निकालना आदि क्रियाएँ करते हुए यह वेद – मंत्र बोलता है :

ॐ येनादिते: सीमानं नयति  प्रजाप्तिर्महते सौभगाय |

तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि ||

जिस प्रकार प्रजापति ने देवमाता अदिति का सीमन्तोन्नयन किया था, उसी प्रकार इस गर्भिणी का सीमन्तोन्नयन करके इसकी संतान को मैं जरावस्था तक दीर्घजीवी करता हूँ |

तत्पश्यात गर्भिणी को यज्ञावशिष्ट पर्याप्त घीयुक्त खिचड़ी खिलाने का विधान है | अंत में इस संस्कार के समय उपस्थित वृद्ध महिलाएँ गर्भिणी को सौभाग्यवती होने और उत्तम, स्वस्थ व भगवदभक्त संतानप्राप्ति के आशीर्वाद देती हैं |

पाश्यात्य अन्धानुकरण में पडकर सीमन्तोन्नयन संस्कार के स्थान पर ‘बेबी शॉवर’ नामक पार्टी करके केवल बाह्य मौज-मजा में न कपं बल्कि सनातन संस्कृति के अनुसार शिशु को दिव्य संस्कारों से संस्कारित करें |

इस समय गर्भस्थ शिशु शिक्षण के योग्य हो जाता है | अत: आचरण – व्यवहार, चिंतन-मनन शास्त्रानुकूल हो इस बात का गर्भिणी को विशेष ध्यान रखना चाहिए | उसे सत्शात्रों, ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के जीवन-प्रसंगो व उपदेशों पर आधारित सत्साहित्य का अध्ययन करना चाहिए | सत्संग-श्रवण, ध्यान, जप आदि नियमित करना चाहिए | घर में ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के श्रीचित्र अवश्य हों, अश्लील व भयावह तस्वीरें बिल्कुल न लगायें |

  

लोककल्याणसेतु – अगस्त २०२१ से

Thursday, July 22, 2021

अनमोल युक्तियाँ – पूज्य बापूजी

 


उत्तम संतान के लिए : घर में देशी गाय की सेवा अच्छा उपाय है |

यम के भय से मुक्ति : शिव पुराण व स्कंद पुराण में कहा गया है कि गौ- सेवा करने और सत्पात्र को गौ- दान करने से यम का भय नहीं रहता |

पाप – ताप से मुक्ति : जब गायें जंगल से चरकर वापस घर को आती है, उस समय को गोधूलि-वेला कहा जाता है | गाय के खुरों से  उठनेवाली धूलराशि समस्त पाप – तापों को दूर करनेवाली है |

ग्रहबाधा – निवारण : गायों को नित्य गोग्रास देने तथा सत्पात्र को गौ-दान करने से ग्रहों के अनिष्ट – निवारण में मदद मिलती है | 


Friday, February 28, 2020

नामकरण क्यों और कैसे हो ?



नामकरण संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर भगवान सूर्यनारायण के दर्शन कराये जाते हैं और शुभ संकल्प किया जाता है कि ‘बालक सूर्य की प्रखरता, तेजस्विता धारण करें |’ इसके साथ ही भूमि को नमन करके देव-संस्कृति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण किया जाता है | बच्चे का नाम रखकर सब लोग उसके चिंरजीवी, धर्मवान, स्वस्थ एवं लौकिक, आध्यात्मिक – सर्व प्रकार से उन्नतिशील होने, समृद्ध होने का सदभाव करते हैं |

मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जिस तरह के नाम से व्यक्ति को पुकारा जाता है, उसे उसी प्रकार के गुणों की अनुभूति होती है | अत: नाम की सार्थकता समझते हुए ऐसा नाम रखना चाहिए जिससे आगे  चलकर बालक को लगे कि मुझे बड़े होकर मेरे नाम के गुणानुसार बनना है |

हमारे लाडलों के नाम कैसे हों इस बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है : “बालक का नाम ऐसा पवित्र रखो कि पवित्र भगवान का सुमिरन हो | आजकल लोग बच्चों के नाम गजब के रखते हैं | लडकियों के नाम रखते हैं – लेष्मा, श्लेष्मा.... अब श्लेष्मा तो नाक से निकली हुई गंदगी को बोलते हैं | लडकों के नाम रखते हैं – टिन्नू, मिन्नू, बंकी, विक्की, पुम्बू.... ये कोई नाम हैं | अभिनेत्रियों के नाम लडकियों के रखेंगे, अभिनेताओं के नाम लडकों के रखेंगे – यह तो बहुत हो गया | वे बेचारे अंदर से खुद ही अशांत हैं तो अपने बच्चों को उनके नाम से क्या शांति मिलेगी, क्या ज्ञान मिलेगा ?

अरे हरिदास रखो, गोविन्द, अम्बादास, हरिप्रसाद, शिवप्रसाद ..... भगवान की स्मृति आये ऐसे नाम रखो | अभिनेता के नाम रखोगे तो लड़का अभिनेता जैसा होगा और भक्तों व भगवान के नाम रखोगे तो कुछ तो नाम का भी प्रभाव पड़ेगा उसके चित्त पर | ‘रावण’ नाम नहीं रखते, किसका नाम ‘रावण’ रखे तो कैसा मन हो जाय ? रावण, कुम्भकर्ण, हिटलर नाम नहीं रखते, अच्छे – अच्छे नाम रखते हैं |

सावित्री, गार्गी, अनसूया, मदालसा, अम्बा, अम्बिका नाम रख दें अपनी कन्या का.... शबरी नाम रख दें तो भक्त शबरी की याद या जायेगी, भगवान श्रीरामजी की याद आ जायेगी | स्वयंप्रभा, सुलभा, ज्योति, सीता, पार्वती रख दें ..... ऐसे-ऐसे और भी कई पावन-पवित्र नाम हैं | चिंता न करें कि नाम कम पड जायेंगे | भारत के ऋषियों ने श्रीविष्णुसहस्रनाम, श्रीशिवसहस्रनाम, श्रीदुर्गासहस्रनाम आदि की रचना करके आपके लिए भगवन्नामों का भंडार खोल रखा है  अपने सत्शास्त्रों में | तो ऐसे पवित्र-पावन नाम रखो ताकि भगवान की स्मृति आ जाय | और बच्चों में दैवी गुण आ जायें तथा माता-पिता में उच्च विचार आ जायें |


        लोककल्याणसेतु – फरवरी २०२० से  

Tuesday, January 28, 2020

पौष्टिक सिंघाड़ा


सिंघाड़े मधुर, शीतल, वीर्यवर्धक, पित्तशामक तथा रक्त-विकार, जलन और सूजन को दूर करनेवाले, पचने में भारी तथा वात एवं कफ कारक हैं | ये विटामिन बी-१, बी-२, बी -९, सी तथा कैल्शियम, ताँबा, लौह तत्त्व, पोटैशियम, मैंगनीज आदि पोषक तत्त्वों के अच्छे स्त्रोत हैं | एंटी ऑक्सीडेट्स का समृद्ध स्त्रोत होने से सिंघाड़े उच्च रक्तचाप में एवं ह्रदय के लिए भी लाभकारी हैं |

सिंघाड़े के आटे से कई प्रकार के पौष्टिक व आरोग्यप्रद व्यंजन बनाये जाते हैं | आटा बनाने हेतु इसकी गिरी को निकालकर धूप में सुखा लें, फिर पिसवा लें | इसे उपवास में भी खा सकते हैं | पाचनशक्ति के अनुसार २०-३० ग्राम सिंघाड़े के आटे से बने हलवे का सेवन करने से श्वेतप्रदर व रक्तप्रदर में लाभ होता है, साथ ही शरीर भी पुष्ट होता है |

सिंघाड़े का हलवा

१०० ग्राम सिंघाड़े के आटे को घी में धीमी आँच पर सुनहरा होने तक भून लें | कढ़ाई को उतार के आटे को ठंडा होने दें | फिर इसमें १ कप गुनगुना दूध व स्वादानुसार मिश्री मिलाकर धीमी आँच पर पकायें | सिंघाड़े का यह हलवा लौह तत्त्व से भरपूर है | रक्ताल्पता एवं मासिक संबंधी रोगों में उपयोगी होने के साथ यह पौष्टिक और बलप्रद भी है |


सिंघाड़े की पुष्टिदायी गोलियाँ

सिंघाड़े के आटे को घी में सेंक लें | आटे के समभाग खजूर को मिक्सी में पीसकर आटे में मिला लें | अब इसे हलका-सा सेंककर बेर के आकार की गोलियाँ बना लें | २ – ४ गोलियाँ सुबह चूसकर खायें, थोड़ी देर बाद दूध पियें |

इससे अतिशीघ्रता से रक्त की वृद्धि होती है | उत्साह, प्रसन्नता व वर्ण में निखार आता है | गर्भिणी माताएँ गर्भावस्था के छठे महीने से यह प्रयोग शुरू करें | इससे गर्भ का पोषण व प्रसव के बाद मातृदुग्ध में वृद्धि होगी | माताएँ बालकों को हानिकारक चॉकलेटस की जगह ये पुष्टिदायी गोलियाँ खिलायें |

पुष्टिकारक खीर

सिंघाड़े का २ छोटे चम्मच आटा, १ चम्मच घी, ३०० मि.ली. दूध, १०० मि.ली. पानी, स्वादानुसार
मिश्री व थोड़ी इलायची लें | सिंघाड़े के आटे को घी डालकर धीमी आँच पर सुनहरा लाल होने तक भूल लें | फिर इसमें दूध तथा पानी डाल के पकायें | पकने पर मिश्री व थोड़ी इलायची डालें | यह स्वादिष्ट तथा पौष्टिक खीर रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, शुक्रधातु की दुर्बलता, रक्तपित्त (शरीर के किसी भी भाग से खून आना ) आदि समस्याओं में तथा गर्भिणी व प्रसूता माताओं के लिए लाभकारी है | इसके सेवन से वजन व बल की वृद्धि होती है | 

गर्भस्थापक व गर्भपोषक पाक

सिंघाडा सगर्भावस्था में अत्यधिक लाभकारी होता है | यह गर्भस्थापक अर्थात गर्भपात से रक्षा
करनेवाला तथा गर्भपोषक है | इसका नियमित और उचित मात्रा में सेवन गर्भस्थ शिशु को कुपोषण से बचाकर स्वस्थ व सुंदर बनाता है | यदि गर्भाशय की दुर्बलता या पित्त की अधिकता के कारण गर्भ न ठहरता हो, बार-बार गर्भस्त्राव या गर्भपात हो जाता हो तो सिंघाड़े के आटे से बने पाक का सेवन करें |

सामग्री : २०० -२०० ग्राम सिंघाड़े व गेहूँ का आटा, ४०० ग्राम देशी घी, १०० ग्राम पिसा हुआ खजूर, १०० ग्राम बबूल का पिसा हुआ गोंद, ४०० ग्राम पीसी मिश्री |

विधि : गोंद को घी में भून लें | फिर उसमें सिंघाड़े व गेहूँ का आटा मिलाकर धीमी आँच पर सेंकें | जब मंद सुगंध आने लगे तब पिसा हुआ खजूर व मिश्री मिला दें | पाक बनने पर थाली में फैलाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट के रख लें |

सेवन-विधि : २ टुकड़े (लगभग २० ग्राम ) सुबह-शाम खायें | ऊपर से दूध पी सकते हैं |

सावधानियाँ : सिंघाड़ा या उसके आटे का सेवन पाचनशक्ति के अनुसार करें | कफ प्रकृति के लोग इसका सेवन अल्प मात्रा में करें | कब्ज हो तो इसका सेवन न करें |

लोककल्याण सेतु – जनवरी २०२० से
              


Monday, January 13, 2020

यदि पुण्यात्मा, उत्तम संतान चाहते हैं तो....


महान आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन उसके लिए संयमी पति-पत्नी की आवश्यकता होती है | अत: उत्तम संतान की इच्छावाले दम्पति गर्भाधान से पहले अधिक-से-अधिक ब्रह्मचर्य का पालन करें व गुरुमंत्र का जप करें | अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु सद्गुरु या इष्टदेव से प्रार्थना करें, फिर गर्भाधान करें | वर्तमान समय में २७ दिसम्बर २०१९ से १५ फरवरी २०२० तक का समय तो गर्भाधान के लिए अतिशय उत्तम है |

गर्भाधान के लिए अनुचित काल
पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि (जन्माष्टमी, श्रीरामनवमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि), श्राद्ध के दिन, प्रदोषकाल ( १. सूर्यास्त का समय, २. सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे बाद तक का समय ), क्षयतिथि एवं मासिक धर्म के प्रथम ५ दिन, माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, संध्या के समय एवं दिन में समागम या गर्भाधान करना भयंकर हानिकारक है | दिन के गर्भाधान से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है |

शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, नहीं तो आसुरी, कुसंस्कारी या विकलांग संतान पैदा होती है | संतान नहीं भी हुई तो भी दम्पति को कोई खतरनाक बीमारी हो जाती है |

गर्भाधान के पूर्व विशेष सावधानी

अपने शरीर व घर में धनात्मक ऊर्जा आये इसका तथा पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए | महिलाओं को मासिक धर्म में भोजन नहीं बनाना चाहिए तथा अपने हाथ का भोजन परिवारवालों को देकर उनका ओज, बल और बुद्धि क्षीण करने की गलती कदापि नहीं करनी चाहिए |

गर्भाधान घर के शयनकक्ष में ही हो, होटलों आदि ऐसी-वैसी जगहों पर न हो |

ध्यान दें : उत्तम समय के अलावा के समय में भी यदि गर्भाधान हो गया हो तो गर्भपात न करायें बल्कि गर्भस्थ शिशु में आदरपूर्वक उत्तम संस्कारों का सिंचन करें | गर्भपात महापाप है |

विशेष : १] उत्तम संतानप्राप्ति हेतु महिला उत्थान मंडल के ‘दिव्य शिशु संस्कार केन्द्रों’ का भी लाभ ले सकते हैं |  सम्पर्क : ९१५७३०६३१३  
२] उत्तम संतानप्राप्ति में सहायक विस्तृत जानकारी हेतु पढ़े आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध पुस्तक ‘दिव्य शिशु संस्कार’ | सम्पर्क : (०७९) ६१२१०७३०

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

अद्भुत प्रभाव-सम्पन्न संतान की प्राप्ति करानेवाला व्रत : पयोव्रत


(पयोव्रत : २४ फरवरी से ६ मार्च )
अद्भुत प्रभाव-सम्पन्न संतान की प्राप्ति की इच्छा रखनेवाले स्त्री-पुरुषों के लिए शास्त्रों में पयोव्रत करने का विधान है | यह भगवान को संतुष्ट करनेवाला है इसलिए इसका नाम ‘सर्वयज्ञ’ और ‘सर्वव्रत’ भी है | यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में किया जाता है | इसमें केवल दूध पीकर रहना होता है |

व्रतधारी व्रत के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करें, धरती पर दरी या कम्बल बिछाकर शयन करे अथवा गद्दा-तकिया हटा के सादे पलंग पर शयन करे और तीनों समय स्नान करे | झूठ न बोले एवं भोगों का त्याग कर दे | किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाये | सत्संग-श्रवण, भजन-कीर्तन, स्तुति-पाठ तथा अधिक-से-अधिक गुरुमंत्र या भगवन्नाम का जप करे | भक्तिभाव से सद्गुरुदेव को सर्वव्यापक परमात्मस्वरूप जानकर उनकी पूजा करे और स्तुति करे : ‘प्रभो! आप सर्वशक्तिमान हैं | समस्त प्राणी आपमें और आप समस्त प्राणियों में निवास करते हैं | आप अव्यक्त और परम सूक्ष्म हैं | आप सबके साक्षी हैं | आपको मेरा नमस्कार है |’

व्रत के एक दिन पूर्व (२३ फरवरी) से समाप्ति (६ मार्च) तक करने योग्य :

१] द्वादशाक्षर मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |) से भगवान या सद्गुरु का पूजन करें तथा इस मंत्र की एक माला जपें |

२] यदि सामर्थ्य हो तो दूध में पकाये हुए तथा घी और गुड़ मिले हुए चावल का नैवेद्य अर्पण करें और उसीका देशी गौ-गोबर के कंडे जलाकर द्वादशाक्षर मंत्र से हवन करें | (नैवेद्य हेतु दूध के साथ गुड का अल्प मात्रा में उपयोग करें |) नैवेद्य को भक्तों में थोड़ा –थोड़ा बाँट दें |

३] सम्भव हो तो दो निर्व्यसनी, सात्त्विक ब्राह्मणों को खीर का भोजन करायें |

४] अमावस्या के दिन (२३ फरवरी को ) खीर का भोजन करें |

५] २४ फरवरी को निम्नलिखित संकल्प करें तथा ६ मार्च तक केवल दूध पीकर रहें |

संकल्प :
मम सकलगुणगणवरिष्ठमहत्त्व-सम्पन्नायुष्मत्पुत्रप्राप्तिकामनया
विष्णुप्रीतये पयोव्रतमहं करिष्ये |  

व्रत-समाप्ति के अगले दिन (७ मार्च को ) सात्त्विक ब्राह्मण को तथा अतिथियों को अपने सामर्थ्य-अनुसार शुद्ध, सात्त्विक भोजन करना चाहिए | दीन, अंधे और असमर्थ लोगों को भी अन्न आदि से संतुष्ट करना चाहिए | जब सब लोग खा चुके हों तब उन सबके सत्कार को भगवान की प्रसन्नता का साधन समझते हुए अपने भाई-बंधुओं के साथ स्वयं भोजन करें |

इस प्रकार विधिपूर्वक यह व्रत करने से भगवान प्रसन्न होकर व्रत करनेवाले की अभिलाषा पूर्ण करते हैं |

टिप – ब्राह्मण-भोजन के लिए बिना गुड़-मिश्रित खीर बनायें एवं एकादशी (६ मार्च) के दिन खीर चावल की न बनायें अपितु मोरधन, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा आदि उपवास में खायी जानेवाली चीजें डालकर बनायें |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

Monday, December 30, 2019

उत्तम संतान चाहते हैं तो ....


महान आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन उसके लिए संयमी पति-पत्नी की आवश्यकता होती है | अत: उत्तम संतान की इच्छावाले दम्पति गर्भाधान से पहले अधिक-से-अधिक ब्रह्मचर्य का पालन करें व गुरुमंत्र का जप करें | अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु सद्गुरु या इष्टदेव से प्रार्थना करें, फिर गर्भाधान करें |

वर्तमान समय में २७ दिसम्बर २०१९ से १५ फरवरी २०२० तक का समय तो गर्भाधान के लिए अतिशय उत्तम है |

गर्भाधान के लिए अनुचित काल
पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि ( जन्माष्टमी, श्रीराम नवमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि ), श्राद्ध के दिन, प्रदोषकाल ( सूर्यास्त का समय, सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे बाद तक का समय ), क्षयतिथि, एवं मासिक धर्म के प्रथम ५ दिन, माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, संध्या के समय एवं दिन में समागम या गर्भाधान करना भयंकर हानिकारक है | दिन के गर्भाधान से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है |

शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, नहीं तो आसुरी, कुसंस्कारी या विकलांग संतान पैदा होती है | संतान नहीं भी हुई तो भी दम्पति को कोई खतरनाक बिमारी हो जाती है |

गर्भाधान के पूर्व विशेष सावधानी
अपने शरीर व घर में धनात्मक ऊर्जा आये इसका तथा पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए | महिलाओं को मासिक धर्म में भोजन नहीं बनाना चाहिए तथा अपने हाथ का भोजन परिवारवालों को देकर उनका ओज, बल और बुद्धि क्षीण करने की गलती कदापि नही करनी चाहिए |

गर्भाधान घर के शयनकक्ष में ही हो, होटलों आदि ऐसी-वैसी जगहों पर न हो |

ध्यान दें :त्तम समय के अलावा के समय में भी यदि गर्भाधान हो गया हो तो गर्भपात न करायें बल्कि गर्भस्थ शिशु में आदरपूर्वक उत्तम संस्कारों का सिंचन करें | गर्भपात महापाप है |

विशेष : उत्तम संतानप्राप्ति हेतु महिला उत्थान मंडल के ‘दिव्य शिशु संस्कार केन्द्रों’ का भी लाभ ले सकते हैं | सम्पर्क : ९१५७३०६३१३ / (०७९) ६१२१०७३०.

लोककल्याण सेतु – दिसम्बर २०१९ से

Thursday, October 31, 2019

नॉर्मल डिलीवरी हेतु रामबाण प्रयोग


ब्रह्मज्ञानी संत श्री आशारामजी बापू अपने सत्संगो में सामान्य प्रसूति के लिए रामबाण प्रयोग बताते हैं : “सामान्य प्रसूति में यदि कहीं बाधा जैसी लगे तो देशी गाय के गोबर का १०-१२ ग्राम ताजा रस निकालें,  गुरुमंत्र का जप करके अथवा ‘नारायण.... नारायण.....’ जप करके गर्भवती महिला को पिला दें | 

एक घंटे में प्रसूति नहीं हो तो वापस पिला दें | सहजता से प्रसूति होगी | अगर प्रसव-पीड़ा समय पर शुरू नहीं हो रही हो तो गर्भिणी ‘जम्भला... जम्भला....’ मंत्र का जप करे और पीड़ा शुरू होने पर उसे गोबर का रस पिलायें तो सुखपूर्वक प्रसव होगा |’

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

Wednesday, October 30, 2019

गौर वर्ण व ओजस्वी-तेजस्वी संतान हेतु


काश्यप ऋषि ने कहा है :
श्वेताया: श्वेत पुं वत्साया गो: क्षीरणे | (का.शा. : १९)

यदि गर्भवती माताएँ श्वेत रंग के बछड़ेवाली श्वेत गाय के दूध का चाँदी के पात्र में सेवन करें तो उनको दीर्घायु, गोरे तथा ओजस्वी, तेजस्वी व स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है |

राजस्थान की एक गोपालक संस्था द्वारा यह प्रयोग २५०० महिलाओं पर किया गया | सभीकी सही समय पर प्रसूति हुई | किसी भी महिला को सिजेरियन डिलीवरी (शल्यक्रिया द्वारा प्रसूति) नहीं करवानी पड़ी | सभीके शिशु ओजस्वी, तेजस्वी व स्वस्थ पैदा हुए |

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

मेधावी व निरोगी संतान हेतु अनुभूत प्रयोग


गर्भवती महिला रोज श्रद्धापूर्वक गाय का पूजन कर उसकी कम-से-कम एक परिक्रमा करे, उसे अपने हाथ से रोटी तथा गुड़ खिलाये और सुबह-शाम गोदुग्ध का पान करे तो निश्चित ही आनेवाली संतान फुर्तीली, सशक्त, मेधावी एवं निरोगी होगी और प्रसव भी सहज ढंग से होगा | 

प्रसव-पीड़ा कम होगी | उपरोक्त लाभों के लिए यह प्रयोग प्रतिदिन करना अनिवार्य है | प्रतिदिन सम्भव न हो तो जितने दिन सम्भव हो करे, तब भी लाभ होगा |

लोककल्याण सेतु –अक्टूबर २०१९ से

Thursday, February 7, 2019

प्रायश्चित जप


पूर्वजन्म या इस जन्म का जो भी कुछ पाप-ताप है, उसे निवृत्त करने के लिए अथवा संचित नित्य दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए प्रायश्चितरूप जो जप किया जाता है उसे प्रायश्चित जप कहते हैं |

कोई पाप हो गया, कुछ गलतियाँ हो गयीं, इससे कुल-खानदान में कुछ समस्याएँ हैं अथवा अपने से गलती हो गयी और आत्म-अशांति है अथवा भविष्य में उस पाप का दंड न मिले इसलिए प्रायश्चित – संबंधी जप किया जाता है |

ॐ ऋतं च सत्यं चाभिद्धात्तपसोऽध्यजायत |
ततो रात्र्यजायत तत: समुद्रो अर्णव: ||
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत |
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ||
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् |
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व: || 
                                         (ऋग्वेद :मंडल १०, सूक्त १९०, मंत्र १ - ३ )

इन वेदमंत्रों को पढ़कर त्रिकाल संध्या करे तो किया हुआ पाप माफ हो जाता है, उसके बदले में दूसरी नीच योनियाँ नहीं मिलतीं | इस प्रकार की विधि है |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०१९ से

Tuesday, October 9, 2018

सुख-शांति, संतति व स्वास्थ्य प्रदायक गौ-परिक्रमा


पूज्य बापूजी कहते है: “संतान को बढ़िया, तेजस्वी बनाना है तो गर्भिणी अलग-अलग रंग की ७ गायों की प्रदक्षिणा करके गाय को जरा सहला दे, आटे-गुड़ आदि का लड्डू खिला दे या केला खिला दे, बच्चा श्रीकृष्ण के कुछ-न-कुछ दिव्य गुण ले के पैदा होगा | कइयों को ऐसे बच्चे हुए हैं |”

विशेष लाभ हेतु
सप्तरंगो की गायों की १०८ परिक्रमा कर अधिक लाभ उठा सकते हैं | गर्भवती महिला द्वारा सामान्य गति से प्रदक्षिणा करने पर शरीर पर कोई तनाव न पड़ते हुए श्वास द्वारा रक्त एवं ह्रदय का शुद्धिकरण होता है | इससे गर्भस्थ शिशु को भी लाभ होता है | इससे गर्भस्थ शिशु को भी लाभ होता है | गर्भिणी सदगुरुप्रदत्त गुरुमंत्र या भगवन्नाम का जप करते हुए परिक्रमा करे, यह अधिक लाभदायी होगा |

ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०१८ से

Thursday, July 12, 2018

पुण्यात्मा, उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए


बृहस्पति, बुध, शुक्र, चन्द्र – ये शुभ ग्रह हैं | इनमें बृहस्पति तो अत्यंत शुभ ग्रह है | बृहस्पति जब बलवान होता है तब पुण्यात्मा पृथ्वी पर अवतरित होते हैं | बलवान बृहस्पति जिसकी जन्म-कुंडली में होता है, उसमें आध्यात्मिकता, ईमानदारी, अच्छाई, सच्चरित्रता, आदि गुण तथा विद्या व अन्य उत्तम विशेषताएँ होती हैं | इसलिए गर्भाधान ऐसे समय में होना चाहिए जिससे बच्चे का जन्म बलवान व उत्तम ग्रहों की स्थिति में हो |  

वर्तमान समय में दिनांक ३ अगस्त २०१८ से २५ जनवरी २०१९ तक का समय गर्भाधान के लिए उत्तम है | इसके अलावा २७ दिसम्बर २०१९ से १५ फरवरी २०२० तक का समय तो गर्भाधान के लिए अतिशय उत्तम है |

हान आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन उसके लिए संयमी पति-पत्नी की आवश्यकता होती है | अत: उत्तम सन्तान की इच्छावाले दम्पति गर्भाधान से पहले कम-से-कम २-३ माह का ब्रह्मचर्य –व्रत अवश्य रखें, साथ ही अधिकाधिक गुरुमंत्र का जप करें | हो सके तप पुरुष ४० दिन के और महिलाएँ २१ दिन के २ या ३ अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु सदगुरु या इष्टदेव से प्रार्थना करें, फिर गर्भाधान करें |

गर्भाधान के लिए अनुचित काल

पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि (जन्माष्टमी, श्रीराम नवमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि ), श्राद्ध के दिन, प्रदोषकाल (१. सूर्यास्त का समय, २. सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे बाद तक का समय ), क्षयतिथि एवं मासिक धर्म के प्रथम ५ दिन, माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, संध्या के समय एवं दिन में समागम या गर्भाधान करना सर्वथा निषिद्ध है | दिन के गर्भाधान से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है |

शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, नहीं तो आसुरी, कुसंस्कारी या विकलांग संतान पैदा होती है | संतान नही भी हुई तो भी दम्पति को कोई खतरनाक बीमारी हो जाती है |

गर्भाधान के पूर्व विशेष सावधानी
अपने शरीर व घर में धनात्मक ऊर्जा आये इसका तथा पावित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए | बहनों को मासिक धर्म में भोजन नहीं बनाना चाहिए | गर्भाधान घर के शयनकक्ष में ही हो, होटलों आदि ऐसी-वैसी जगहों पर न हो |

टिप्पणी : उत्तम समय के अलावा के समय में भी यदि गर्भाधान हो गया हो तो गर्भपात न करायें बल्कि गर्भस्थ शिशु में आदरपूर्वक उत्तम संस्कारों का सिंचन करें | गर्भपात महापाप है |

विशेष : उत्तम संतानप्राप्ति हेतु महिला उत्थान मंडल के ‘दिव्य शिशु संस्कार केन्द्रों’ का भी लाभ ले सकते हैं | ‘दिव्य शिशु संस्कार’ पुस्तक पढ़ें |
सम्पर्क : ९१५७३०६३१३ और (०७९) ३९८७७७३०

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से