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Tuesday, September 23, 2014

सगर्भावस्था में निषिद्ध आहार


- गर्भ रहने पर गर्भिणी किसी भी प्रकार के आसव-अरिष्ट (कुमारी आसव, दशमूलारिष्ट आदि), उष्ण-तीक्ष्ण औषधियों, दर्द-निवारक (पेन किलर) व नींद की गोलियों, मरे हुए जानवरों के रक्त से बनी रक्तवर्धक दवाइयों एव टॉनिक्स तथा हानिकारक अंग्रेजी दवाइयों आदि का सेवन न करें |

- इडली, डोसा, ढोकला जैसे खमिरयुक्त, पित्तवर्धक तथा चीज, पनीर जैसे पचने में भारी पदार्थ न खाये | ब्रेड, बिस्कुट, केक, नुडल्स (चाऊमीन), भेलपुरी, दहिवड़ा जैसी मैदे की वस्तुएँ न खाकर शुद्ध घी व आटे से बने तथा स्वास्थ्यप्रद पदार्थो का सेवन करे |

- कोल्डड्रिंक्स व डिब्बाबंद रसों की जगह ताजा नीबू या आँवले का शरबत ले | देशी गाय के दूध, गुलकंद का प्रयोग लाभकारी है |

- मांस, मछली, अंडे आदि का सेवन कदापि न करे |

- आयुर्वेदानुसार सगर्भावस्था में किसी भी प्रकार का आहार अधिक मात्र में न लें | षडरसयुक्त आहार लेना चाहिए परंतु केवल किसी एकाध प्रिय रस का अति सेवन दुष्परिणाम ला सकता हैं |

इस संदर्भ में चरकाचार्यजी ने बताया है :

१] मधुर : सतत सेवन करने से बच्चे को मधुमेह (डायबिटीज), गूँगापन, स्थूलता हो सकती हैं |

२] अम्ल : इमली. टमाटर, खट्टा दही , डोसा, खमीरवाले पदार्थ अतिप्रमाण में खाने से बच्चे का जन्म से ही नाक में से खून बहना, त्वचा व आँखों के रोग हो सकते हैं |

३] लवण (नमक) : ज्यादा नमक लेने से रक्त में खराबी आती है, त्वचा के रोग होते हैं | बच्चे के बाल असमय में सफेद हो जाते हैं, गिरते है, गंजापन आता है, त्वचा पर समय झुरियाँ पडती है तथा नेत्रज्योति कम होती है |

४] तीखा : बच्चा कमजोर प्रकुति का, क्षीण शुक्रधातुवाला व् भविष्य में संतानोत्पत्ति में असमर्थ हो सकता है |

५] कडवा : बच्चा शुष्क, कम वजन का व कमजोर हो सकता है |

६] कषाय : अति खाने पर श्यावता (नीलरोग) आती है, उर्ध्ववायु की तकलीफ रहती है |

सारांश यही है कि स्वादलोलुप न होकर आवश्यक संतुलित आहार लें |

- ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१४ से

स्वादिष्ट और बलदायक केला

केला एक ऐसा विलक्षण फल है जो शारीरिक व बौद्धिक विकास के साथ उत्साहवर्धक भी है | पूजन-अर्चन आदि कार्यो में भी केले का महत्त्वपूर्ण स्थान है | केले में शर्करा, कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, फोस्फोरस, प्रोटीन्स, विटामिन ए, बी, सी, डी एवं लौह, ताँबा, आयोडीन आदि तत्त्वों के साथ ऊर्जा का भरपूर खजाना है |

लाभ – १] पका केला स्वादिष्ट, भूख बढ़ानेवाला, शीतल, पुष्टिकारक, मांस एवं वीर्यवर्धक, भूख-प्यास को मिटानेवाला तथा नेत्ररोग एवं प्रमेह में हितकर है |

२] केला हड्डियों और दाँतों को मजबूती प्रदान करता है | छोटे बच्चों के शाररिक व बौद्धिक विकास के लिए केला अत्यंत गुणकारी है |

३] एक पका केला रोजाना खिलाने से बच्चों का सुखा रोग मिटता है |

४] यह शरीर व धातु की दुर्बलता दूर करता है, शरीर को स्फूर्तिवान तथा त्वचा को कांतिमय बनाता है और रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढाता है |

५] केला अन्न को पचाने में सहायक है | भोजन के साथ १-२ पके केले प्रतिदिन खाने से भूख बढती है |

६] खून की कमी को दूर करने तथा वजन बढ़ाने के लिए केला विशेष लाभाकरी है |



आसान घरेलू प्रयोग


स्वप्नदोष : २ अच्छे पके केलों का गुदा खूब घोंटकर उसमें १०-१० ग्राम शुद्ध शहद व आँवले का रस मिला के सुबह-शाम कुछ दिनों तक नियमित लेने से लाभ होता है |

प्रदर रोग – (महिलाओं की सफेद पानी पड़ने की बीमारी) : सुबह-शाम एक-एक खूब पका केला १० ग्राम गाय के घी के साथ खाने से करीब एक सप्ताह में ही लाभ होता है |

शीघ्रपतन :
एक केले के साथ १० ग्राम शुद्ध शहद लगातार कम-से-कम १५ दिन तक सेवन करें | शीघ्रपतन के रोगियों के लिए यह रामबाण प्रयोग माना जाता है |

आमाशय व्रण (अल्सर) :
पके केले खाने और भोजन में दूध व भात लेने से अल्सर में लाभ होता है |

उपरोक्त सभी प्रयोगों में अच्छे-से पके चित्तीदार केले धीरे-धीरे, खूब चबाते हुए खाने चाहिए | इससे केले आसानी से पच जाते है, अन्यथा पचने में भारी भी पड सकते हैं | अधिक केले खाने से अजीर्ण हो सकता है | केले के साथ इलायची खाने से वह शीघ्र पच जाता है | अदरक भी केला पचाने में सहायता करता है |

सावधानियाँ – केला भोजन के समय या बाद में खाना उचित है | मंदाग्नि, गुर्दों से संबधित बीमारियों, कफजन्य व्याधियों से पीड़ित व मोटे व्यक्तियों को इसका सेवन नहीं करना चाहिए | केले को छिलका हटाने के बाद तुरुंत खा लेना चाहिए | केले, अन्य फल व सब्जियों को फ्रिज में रखने से उनके पौष्टिक तत्त्व नष्ट होते हैं |

- ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१४ से

Friday, August 22, 2014

तिथि अनुसार आहार-विहार

ब्रम्हवैवर्त पुराण, ब्रम्ह खंड (२७.२९-३४) में आता है :
-प्रतिप्रदा को कुष्मांड (कुम्हड़ा, पेठा) न खायें क्योंकि यह धन का नाश करनेवाला है |
- द्वितीया को बृहती (वनभांटा, छोटा बैंगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है |
- तृतीया को परवल खाना शत्रुवृद्धि करता है |
- चतुर्थी को मूली खाने से धन-नाश होता है |
- पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है |
- षष्ठी को नीम-भक्षण (पत्ती, फल खाने या दातुन मुँह में डालने) से नीच योनियों की प्राप्ति होती है |
- सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ते हैं तथा शरीर का नाश होता है |
- अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है |
- नवमी को लौकी खाना गोमांस के सामान त्याज्य है |
- एकादशी को शिम्बी (सेम), द्वादशी को पूतिका (पोई) तथा त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है |
- अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, चतुर्दशी व अष्टमी, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्री – श्वास एवं तिल का तेल खाना व लगाना निषिद्ध है | (ब्रम्हवैवर्त पुराण, ब्रम्ह खंड : २७.३७-३८)
इससे स्वभाव क्रोधी होता है और बीमारी जल्दी आती है |
- रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग की सब्जी नहीं खानी चाहिए | (ब्रम्हवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंड : ७५.६१)  ये खाने व लाल बल्ब आदि से घर में झगड़े होते है एवं स्वभाव में क्रोध व काम पैदा होता है |
-सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए (मनुस्मृति :४.७५) 
-सावन में साग और भादों में दही का सेवन वर्जित है | कहावत भी है : भादों की दही भूतों को, कार्तिक की दही पूतों को |

- ऋषिप्रसाद – अगस्त २०१४ से

ब्रम्हचर्यासन

साधारणतया योगासन भोजन के बाद नहीं किये जाते परंतु कुछ ऐसे आसन है जो भोजन के बाद भी किये जाते है | उन्ही आसनों में से एक है ब्रम्हचर्यासन | यह आसन रात्रि-भोजन के बाद सोने से पहले करने से विशेष लाभ होता है |

इसके नियमित अभ्यास से ब्रम्हचर्य – पालन में खूब सहायता मिलती है अर्थात इसके अभ्यास से अखंड ब्रम्हचर्य की सिद्धि होती है | इसलिए योगियों ने इसका नाम “ब्रम्हचर्यासन” रखा है |

लाभ : इस आसन के अभ्यास से वीर्यवाहिनी नाड़ी का प्रवाह शीघ्र ही ऊर्ध्वगामी हो जाता है और सिवनी नाड़ी की उष्णता कम हो जाती है, जिससे यह आसन स्वप्नदोषादि बीमारियों को दूर करने में परम लाभकारी सिद्ध हुआ है |

जिन व्यक्तियों को बार-बार स्वप्नदोष होता है, उन्हें सोने से पहले ५ से १० मिनट तक इस आसन का अभ्यास अवश्य करना चाहिए | इससे उपस्थ इन्द्रिय में काफी शक्ति आती है और एकाग्रता में भी वृद्धी होती है |

विधि : जमीन पर घुटनों के बाल अर्थात वज्रासन में बैठ जायें | फिर दोनों पैरों को बाहर की ओर इस तरह फैला दें कि नितम्ब और गुदा का भाग जमीन से लगा रहे | हाथों को घुटनों पर रख ले शांत चित्त से बैठे रहें |

- ऋषिप्रसाद – अगस्त २०१४ से

सगर्भावस्था के दौरान आचरण

-  दिन में नींद व देर रात तक जागरण न करें | दोपहर में विश्रांति ले, गहरी नींद वर्जित है |
- सीधे व घुटने मोडकर न सोये अपितु करवट बदल-बदलकर सोये |
- सख्त व् टेढ़े स्थान पर बैठना, पैर फैलाकर और झुककर ज्यादा समय बैठना वर्जित है |
-गर्भिणी अपानवायु, मल, मूत्र, डकार, छींक, प्यास, भूख, निद्रा, खाँसी, आयासजन्य श्वास, जम्हाई, अश्रु इन स्वाभाविक वेंगो को न रोके तथा यत्नपूर्वक वेंगों को उत्पन्न न करें |
- इस काल में समागम सर्वथा वर्जित है |
- सुबह की शुद्ध हवा में टहलना लाभप्रद है |
- आयुर्वेदानुसार ९ मास तक प्रवास वर्जित है |
- चुस्त व गहरे रंग के कपड़े न पहने |
- अप्रिय बात न सुने व वाद-विवाद में न पड़े | जोर से न बोले और गुस्सा न करे | मन में उद्वेग उत्पन्न करनेवाले वीभत्स दृश्य, टीवी सीरियल न देखे व ऐसे साहित्य, नॉवेल आदि भी पढ़े-सुने नहीं | तीव्र ध्वनि एवं रेडिओ भी न सुने |
- दुर्गन्धयुक्त स्थान पर न रहे तथा इमली के वृक्ष के नजदीक न जाय |
- शरीर के समस्त अंगों को सौम्य कसरत मिले इस प्रकार के घर के कामकाज करते रहना गर्भिणी के लिए अति उत्तम होता है |
- सगर्भावस्था में प्राणवायु की आवश्यकता अधिक होती है अत: दीर्घ श्वसन (दीर्घ श्वास) व हलके प्राणायम का अभ्यास केन | पवित्र, कल्याणकारी, आरोग्यदायक भगवन्नाम-जप करें |
- मन को शांत व शरीर को तनावरहित रखने के लिए प्रतिदिन थोडा समय शवासन (शव की नाई पड़े रहना) का अभ्यास अवश्य करें |
- शांति होम एवं मंगल कर्म करे | देवता, ब्राम्हण, वृद्ध एवं गुरुजनों को प्रणाम करें |
- भय, शोक, चिंता, क्रोध को त्यागकर नित्य आनंदित व प्रसन्न रहे |

ऊपर दी गयी सावधानियों का गर्भ व मन से गहरा संबंध होता है | अत: गर्भिणी दिये गये निर्देशों के अनुसार अपनी दिनचर्या निर्धारित करें |

- ऋषिप्रसाद – अगस्त २०१४ से


पाचन की तकलीफों में परम हितकारी : अदरक

आजकल लोग बिमारियों के शिकार अधिक क्यों हैं ? अधिकांश लोग खाना न पचना, भूख न लगना, पेट में वायु बनना, कब्ज आदि पाचन संबंधी तकलीफों से ग्रस्त हैं और इसीसे अधिकांश अन्य रोग उत्पन्न होते हैं | पेट की अनेक तकलीफों में रामबाण एवं प्रकृति का वरदान है अदरक | स्वस्थ लोगों के लिए यह स्वास्थ्यरक्षक है | बारिश के दिनों में यह स्वास्थ्य का प्रहरी है |

सरल है आँतों की सफाई व पाचनतंत्र की मजबूती

शरीर में जब कच्चा रस (आम) बढ़ता है या लम्बे समय तक रहते हैं, तब अनेक रोग उत्पन्न होते हैं | अदरक का रस आमाशय के छिंद्रों में जमे कच्चे रस एवं कफ को तथा बड़ी आँतों में जमे आँव को पिघलाकर बाहर निकाल देता है तथा छिद्रों को स्वच्छ कर देता है | इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है और पाचन-तंत्र स्वस्थ बनता है | यह लार एवं आमाशय का रस दोनों की उत्पत्ति बढाता है, जिससे भोजन का पाचन बढ़िया होता है एवं अरुचि दूर होती है |

आसान घरेलू प्रयोग :

स्वास्थ्य व भूख वर्धक, वायुनाशक प्रयोग


रोज भोजन से पहले अदरक को बारीक़ टुकड़े-टुकड़े करके सेंधा नमक के साथ लेने से पाचक रस बढकर अरुचि मिटती है | भूख बढती है, वायु नहीं बनती व स्वास्थ्य अच्छा रहता है |

रुचिकर, भूखवर्धक, उदररोगनाशक प्रयोग

१०० ग्राम अदरक की चटनी बनायें एवं १०० ग्राम घी में उसे सेंक लें | लाल होने पर उसमे २०० ग्राम गुड़ डालें व हलवे की तरह गाढ़ा बना लें | (घी न हो तो २०० ग्राम अदरक को कद्दूकश करके २०० ग्राम चीनी मिलाकर पाक बना लें |) इसमें लौंग, इलायची, जायपत्री का चूर्ण मीलायें तो और भी लाभ होगा | वर्षा ऋतू में ५ से १० ग्राम एवं शीत ऋतू में १०-१० ग्राम मिश्रण सुबह-शाम खाने से अरुचि, मंदाग्नि, आमवृद्धि, गले व पेट के रोग, खाँसी, जुकाम, दमा आदि अनेक तकलीफों में लाभ होता है | भूख खुलकर लगती है | बारिश के कारण उत्पन्न बीमरियों में यह अति लाभदायी है |

अपच: १] भोजन से पहले ताजा अदरक रस, नींबू रस व सेंधा नमक मिलाकर लें एवं भोजन के बाद इसे गुनगुने पानी से लें | यह कब्ज व पेट की वायु में भी हितकारी हैं |

२] अदरक, सेंधा नमक व काली मिर्च को चटनी की तरह बनाकर भोजन से पहले लें |

खाँसी, जुकाम, दमा: अदरक रस व शहद १० – १० ग्राम दिन में ३ बार सेवन करें | नींबू का रस २ बूँद डालें तो और भी गुणकारी होगा |

बुखार : तेज बुखार में अदरक का ५ ग्राम रस एवं उतना ही शहद मिलाकर चाटने से लाभ होता है | इन्फ्लुएंजा, जुकाम, खाँसी के साथ बुखार आने पर तुलसी के १० – १५ पत्ते एवं काली मिर्च के ६ – ७ दाने २५० ग्राम पानी में डालें | इसमें २ ग्राम सौंठ मिलाकर उबालें | स्वादानुसार मिश्री मिला के सहने योग्य गर्म ही पियें |

वातदर्द : १० मि.ली. अदरक के रस में १ चम्मच घी मिलाकर पीने से पीठ, कमर, जाँघ आदि में उत्पन्न वातदर्द में राहत मिलती है |

जोड़ों का दर्द : २ चम्मच अदरक रस में १ – १ चुटकी सेंधा नमक व हींग मिला के मालिश करें |

गठिया : १० ग्राम अदरक छिल के १०० ग्राम पानी में उबाल लें | ठंडा होने पर शहद मिलाकर पियें | कुछ दिन लगातार दिने में एक बार लें | यह प्रयोग वर्षा या शीत ऋतू में करें |

गला बैठना : अदरक रस शहद में मिलाकर चाटने से बैठी आवाज खुलती है व सुरीली बनती है |

सावधानी : रक्तपित्त, उच्च रक्तचाप, अल्सर, रक्तस्राव व कोढ़ में अदरक न खायें | अदरक को फ्रिज में न रखें, रविवार को न खायें |

- ऋषिप्रसाद – अगस्त २०१४ से

Monday, July 21, 2014

आँखों की समस्याओं और नेत्रज्योति-वृद्धी के उपाय

लगातार कम्प्यूटर स्क्रीन तथा टीवी देखने, प्रदूषित वातावरण, आहार में पोषक तत्त्वों की कमी तथा अन्य कारणों से आँखों में जलन, पानी गिरना, कम दिखाई देना, आँखों में जले, कम उम्र में ही चश्मा लग जाना आदि समस्याएँ बढती जा रही है | ये समस्याएँ आगे जाकर आँखों को गम्भीर नुकसान पहुँचा सकती है |

आँखों की समस्याओं से बचने के नुस्खे

१] रोज दिन में दो-तीन बार मुँह में पानी भरकर आँखों पर स्वच्छ, शीतल पानी के छींटे मारें | इससे आँखों की सारी गर्मी पानी के द्वारा बाहर निकल जाती है |

२] आँखों में जलन हो या धूप से आये हों तो बर्फ के पानी की पट्टियाँ आँखों के ऊपर रखें |

३] पैर के तलवों पर घी की मालिश करके सोयें |

नेत्रज्योति बढ़ाने के सरल प्रयोग

१] हाथों को कन्धों की ऊँचाई तक शरीर के अगल-बगल उठाये | अँगूठों को ऊपर की ओर रखें | सिर एवं चेहरे को बिना घुमाये आँखों को बायें हाथ के अँगूठे पर फिर दायें हाथ के अँगूठे पर केन्द्रित करें | हर तरफ १५ – १५ सेकंड तक दृष्टि केन्द्रित करें | इसे १५ से २० बार करें | इसके बाद २ मिनट तक आँखों को हलकी बंद कर उन्हें विश्राम दें |

२] दोनों हाथों की हथेलियों को आपस में अच्छी तरह रगड़कर बंद आँखों पर रखें | इस क्रिया से अल्फ़ा तरंगे आँखों के अंदर प्रवेश कर आराम पहुँचाती है |

-ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१४ से

सरल प्रयोग

- भगवान धन्वंतरि सुश्रुतजी से कहते हैं : “मनुष्य को सदा ‘हिताशी’ (हितकारी पदार्थो को ही खानेवाला), ‘मिताशी’ (परिमित भोजन करनेवाला) तथा ‘जीर्णाशी’ होना चाहिए अर्थात पहले खाये हुए अन्न का परिपाक हो जाने पर ही पुन: भोजन करना चाहिए |’
- बेल के पत्ते, धनिया व सौंफ को समान मात्रा में लेकर कूट लें | १० से २० ग्राम यह चूर्ण शाम को १०० ग्राम पानी में भिगो दें और सुबह पानी को छानकर पी जायें | इसी प्रकार सुबह भिगोकर शाम को पियें | इससे स्वप्नदोष कुछ ही दिनों में ठीक हो जायेगा | यह प्रमेह एवं स्त्रियों के प्रदर में भी लाभदायक है |
- घी तथा दूध से शिवलिंग को स्नान कराने से मनुष्य रोगहीन हो जाता है |
- खांडयुक्त दूध पीनेवाला सौ वर्षो की आयु प्राप्त करता है |
- दीर्घजीवी होने की इच्छावाले को सुबह खाली पेट १० से १५ ग्राम त्रिफला घृत के साथ ५ से १० ग्राम शहद का सेवन करना चाहिए |

-ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१४ से

स्वास्थ्यवर्धक चोकरयुक्त आटा

प्राय: लोग खाना बनाते समय आटे को छानकर चोकर फेंक देते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि चोकर फेंककर उन्होंने आटे के सारे रेशे (फाईबर्स) फेंक दिये हैं | चोकर स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है | चोकर के संबंध में शोध कर रहे वैज्ञानिक ने पाया कि चोकर रक्त में इम्यूनो-ग्लोब्यूलीन्स की मात्रा बढाता हैं, जिससे शरीर की रोगप्रतिकारक क्षमता बढती है | इससे रोगप्रतिकारक शक्ति की कमी के कारण उत्पन्न होनेवाले कई कष्टदायक रोग जैसे क्षय (टी.बी.), दमा आदि भी दूर रहते हैं |

चोकरयुक्त आटा खाने के लाभ

१] गेंहूँ का चोकर कब्ज हटाने में रामबाण का काम करता है | इसके प्रयोग से आँतो में चिपका हुआ मल साफ़ होता है, गैस नहीं बनती, आँते सुरक्षित व पेट मुलायम रहता है |

२] चोकर आमाशय के घावों को ठीक करता हैं |

३] रक्तवसा (कोलेस्ट्रोल) को संतुलित करके ह्रदयरोग से भी रक्षा करता है |

४] आंत्रपुच्छशोध (अपेंडिसाइटिस), अर्श (बवासीर) तथा भंगदर से बचाता है | बड़ी आँत एवं मलाशय कैंसर से भी रक्षा होती है |

५] मोटापा घटाने तथा मधुमेह निवारण में भी अचूक कार्य करता है |

अत: अति लाभकारी चोकरयुक्त आटे का ही प्रयोग करें, भूलकर भी इसे न फेंके |

-ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१४ से

घर में सुख-सम्पति लाने के लिए

गाय के दूध के दही में थोडा जौ और तिल मिला दें | फिर उससे रगड़-रगड़कर

“ॐ लक्ष्मीनारायणाय नम: ॐ लक्ष्मीनारायणाय नम: |” जप करके स्नान करें |
- पूज्य बापूजी

-ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१४ से

For happiness and prosperity at home
Add little barley and sesame seeds in curd made off cow's milk. Then, rub it across your body and recite:

"AUM LAKSHMINARAYANAYA NAMAH", "AUM LAKSHMINARAYANAYA NAMAH"
Then, take bath after this recital.
- Pujya Bapuji
- Rishi Prasad - July 2014

मासानुसार गर्भिणी परिचर्या

हर महीने में गर्भ-शरीर के अवयव आकार लेते हैं, अत: विकासक्रम के अनुसार हर महीने गर्भिणी को कुछ विशेष आहार लेना चाहए |

पहला महिना : गर्भधारण का संदेह होते ही गर्भिणी सादा मिश्रीवाला सहज में ठंडा हुआ दूध पाचनशक्ति के अनुसार उचित मात्रा में तीन घंटे के अंतर से ले अथवा सुबह-शाम ले | साथ ही सुबह १ चम्मच ताजा मक्खन (खट्टा न हो) ३ - ४ बार पानी से धोकर रूचि अनुसार मिश्री व १- २ कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर ले तथा हरे नारियल की ४ चम्मच गिरी के साथ २ चम्मच सौंफ खूब देर तक चबाकर खाये | इससे बालक का शरीर पुष्ट, सुडौल व गौरवर्ण का होगा |

इस महीने के प्रारम्भ से ही माँ को बालक में इच्छित धर्मबल, नीतिबल, मनोबल व सुसंस्कारों का अनन्य श्रद्धापूर्वक सतत मनन-चिंतन करना चाहिए | ब्रम्हनिष्ठ महापुरुषों का सत्संग एवं उत्तम शास्त्रों का श्रवण, अध्ययन, मनन-चिंतन करना चाहिए |

दूसरा महीना :
इसमें शतावरी, विदारीकंद, जीवंती, अश्वगंधा, मुलहठी, बला आदि मधुर औषधियों के चूर्ण को समभाग मिलाकर रख लें | इनका १ से २ ग्राम चूर्ण २०० मि.ली. दूध में २०० मि.ली. पानी डाल के मध्यम आँच पर उबालें, पानी जल जाने पर सेवन करें |

तीसरा महीना : इस महीने में दूध को ठंडा कर १ चम्मच शुद्ध घी व आधा चम्मच शहद )अर्थात घी व शहद विषम मात्रा में ) मिलाकर सुबह-शाम लें |

उलटियाँ हो रही हों तो अनार का रस पीने तथा ‘ॐ नमो नारायणाय’ का जप करने से वे दूर होती हैं |

चौथा महीना : इसमें प्रतिदिन १० से २५ ग्राम मक्खन अच्छे-से धोकर, छाछ का अंश निकाल के मिश्री के साथ या गुनगुने दूध में डालकर अपनी पाचनशक्ति के अनुसार सेवन करें |

इस मास में बालक सुनने-समझने लगता है | बालक की इच्छानुसार माता के मन में आहार-विहार संबंधी विविध इच्छाएँ उत्पन्न होने से उनकी पूर्ति युक्ति से (अर्थात अहितकर न हो इसका ध्यान रखते हुए) करनी चाहिए |

यदि गर्भाधान अचानक हो गया हो तो चौथे मास में गर्भ अपने संस्कारों को माँ के आहार-विहार की रूचि द्वारा व्यक्त करता है | आयुर्वेद के आचार्यों का कहना है कि यदि इस समय भी हम सावधान होकर आग्रहपूर्वक दृढ़ता से श्रेष्ठ विचार करने लगें और श्रेष्ठ सात्त्विक आहार ही लें तो आनेवाली आत्मा के खुद के संस्कारों का प्रभाव कम या ज्यादा हो जाता है अर्थात रजस, तमस प्रधान संस्कारों में बदला जा सकता हैं एवं यदि सात्त्विक संस्कारयुक्त है तो उस पर उत्कृष्ट सात्त्विक संस्कारों का प्रत्यारोपण किया जा सकता है |

पाँचवाँ महीना : इस महीने से गर्भ में मस्तिष्क का विकास विशेष रूप से होता हैं , अत: गर्भिणी पाचनशक्ति के अनुसार दूध में १५ से २० ग्राम घी ले या दिन में दाल-रोटी, चावल में १-२ चम्मच घी, जितना हजम हो जाय उतना ले | रात को १ से ५ बादाम (अपनी पाचनशक्ति के अनुसार) भिगो दे, सुबह छिलका निकाल के घोंटकर खाये व ऊपर से दूध पिये |

इस महीने के प्रारम्भ से ही माँ को बालक में इच्छित धर्मबल, नीतिबल, मनोबल व सुसंस्कारों का अनन्य श्रद्धापूर्वक सतत मनन-चिंतन करना चाहिए | ब्रम्हनिष्ठ महापुरुषों का सत्संग एवं उत्तम शास्त्रों का श्रवण, अध्ययन, मनन-चिंतन करना चाहिए | ‘हे प्रभु ! आनंददाता !!....’ प्रार्थना आत्मसात करे तो उत्तम है |

छठा व सातवाँ महीना : इन महीनों में दूसरे महीने की मधुर औषधियों (इसमें शतावरी, विदारीकंद, जीवंती, अश्वगंधा, मुलहठी, बला आदि मधुर औषधियों के चूर्ण को समभाग मिलाकर रख लें | इनका १ से २ ग्राम चूर्ण २०० मि.ली. दूध में २०० मि.ली. पानी डाल के मध्यम आँच पर उबालें) में गोखरू चूर्ण का समावेश करे व दूध-घी से ले | आश्रम-निर्मित तुलसी-मूल की माला कमर में धारण करें |

इस महीने से प्रात: सूर्योदय के पश्चात सूर्यदेव को जल चढ़ाकर उनकी किरणें पेट पर पड़ें, ऐसे स्वस्थता से बैठ के ऊंगलियों में नारियल तले लगाकर पेट की हलके हाथों से मालिश (बाहर से नाभि की ओर) करते हुए गर्भस्थ शिशु को सम्बोधित करते हुए कहे : ‘जैसे सूर्यनारायण ऊर्जा, उष्णता, वर्षा देकर जगत का कल्याण करते हैं, वैसे तू भी ओजस्वी, तेजस्वी व परोपकारी बनना |’

माँ के स्पर्श से बच्चा आनंदित होता है | बाद में २ मिनट तक निम्न मंत्रो का उच्चारण करते हुए मालिश चालू रखे |

ॐ भूर्भुवः स्व: | तत्सवितुर्वरेन्य भर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो न: प्रचोदयात् || (यजुर्वेद :३६.३)

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रामेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: |

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं रामे चित्तलय: सदा भवतु में भो राम मामुद्धर || (श्री रामरक्षास्तोत्रम्)

रामरक्षास्तोत्र के उपर्युक्त श्लोक में ‘र’ का पुनरावर्तन होने से बच्चा तोतला नहीं होता | पिता भी अपने प्रेमभरे स्पर्श के साथ गर्भस्थ शिशु को प्रशिक्षित करे |

सातवें महीने में स्तन, छाती व पेट पर त्वचा के खिंचने से खुजली शुरू होने पर ऊँगली से न खुजलाकर देशी गाय के घी की मालिश करनी चाहिए |

आठवाँ व नौवाँ महीना : इन महीनों में चावल को ६ गुना दूध व ६ गुना पानी में पकाकर घी दाल के पाचनशक्ति के अनुसार सुबह-शाम खाये अथवा शाम के भोजन में दूध-दलियें में घी डालकर खाये | शाम का भोजन तरल रूप में लेना जरूरी है |

गर्भ का आकार बढ़ने पर पेट का आकार व भार बढ़ जाने से कब्ज व गैस की शिकायत हो सकती है | निवारणार्थ निम्न प्रयोग अपनी प्रकृति के अनुसार करे :

आठवें महीने के १५ दिन बीत जाने पर २ चम्मच एरंड तेल दूध से सुबह १ बार ले, फिर नौवें महीने की शुरआत में पुन: एक बार ऐसा करे अथवा त्रिफला चूर्ण या इसबगोल में से जो भी चूर्ण प्रकृति के अनुकूल हो उसका सेवन वैद्यकीय सलाह के अनुसार करे | पुराने मल की शुद्धि के लिए अनुभवी वैद्य द्वारा निरुह बस्ति व अनुवासन बस्ति ले |

चंदनबला लाक्षादि तेल से अथवा तिल के तेल से पीठ, कटि से जंघाओं तक मालिश करे और इसी तेल में कपडे का फाहा भिगोकर रोजाना रात को सोते समय योनि के अंदर गहराई में रख लिया करे | इससे योनिमार्ग मृदु बनता है और प्रसूति सुलभ हो जाती है |

पंचामृत : ९ महीने नियमित रूप से प्रकृति व पाचनशक्ति के अनुसार पंचामृत ले |

पंचामृत बनाने की विधि : १ चम्मच ताजा दही, ७ चम्मच दूध, २ चम्मच शहद, १ चम्मच घी व १ चम्मच मिश्री को मिला लें | इसमें १ चुटकी केसर भी मिलाना हितावह है |

गुण : यह शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति, स्मरणशक्ति व कांति को बढ़ाता है तथा ह्रदय, मस्तिष्क आदि अवयवों को पोषण देता है | यह तीनों दोषों को संतुलित करता है व गर्भिणी अवस्था में होनेवाली उलटी को कम करता है |

उपवास में सिंघाड़े व राजगिरे की खीर का सेवन करें | इस प्रकार प्रत्येक गर्भवती स्त्री को नियमित रूप से उचित आहार-विहार का सेवन करते हुए नवमास चिकित्सा विधिवत् लेनी चाहिए ताकि प्रसव के बाद भी इसका शरीर सशक्त, सुडौल व स्वस्थ बना रहे, साथ ही वह स्वस्थ, सुडौल व सुंदर और ह्रष्ट-पुष्ट शिशु को जन्म दे सके | इस चिकित्सा के साथ महापुरुषों के सत्संग-कीर्तन व शास्त्र के श्रवण-पठन का लाभ अवश्य लें |

-ऋषिप्रसाद – जून-जुलाई २०१४ से

Monday, July 14, 2014

कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में ?

· बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |

· नीम, अशोक या आम की पत्तियोंसहित छोटी-छोटी टहनियाँ मुख्य दरवाजे पर लटकायें |

· सप्ताह में एक दिन घर की साफ़-सफाई करने के बाद एक लोटा पानी में थोड़ी शक्कर और दूध डालकर कुश से उसका छिडकाव पुरे घर में करें | अंत में बचे हुए पानी को दरवाजे की दोनों तरफ थोडा-थोडा डाल दें |

ये प्रयोग आम आदमी के लिए हैं | गुरुभक्त तो गुरु के ज्ञान और मंत्र से ही मौज और मस्ती में रहता है |

-लोककल्याण सेतु – जून २०१४ से

How to convert ill fortune to great fortune?
- Apply turmeric on a leaf of Banyan tree and keep it in your home on the eve of GuruPushya or RaviPushya yog.
- Hang leaves of Neem, Ashok or Mango along with their twigs at the front door of your home.
- Once a week, after cleaning your home, take a bowl of water and add sugar and milk to it. Take some green grass and sprinkle some of it around the home. At the end, run down the leftover water slowly on both sides of your front doorstep.
These are techniques for common man. A Guru's disciple lives in joy and peace simply by virtue of Guru-mantra and self knowledge.

- Lok Kalyan Setu - June 2014