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Thursday, July 16, 2020

रोगप्रतिरोधक शक्ति ( Immunity) बढ़ाने हेतु


वातावरण में उपस्थित रोगाणु हमेशा शरीर पर आक्रमण करते रहते हैं | जब शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होती है तब रोग-बीमारियाँ घेर लेते हैं | यदि आप पूज्य बापूजी द्वारा बताये गये निम्नलिखित सशक्त उपाय करें तो आपका शरीर, मन व प्राण बलवान होंगे और आपकी रोगप्रतिकारक शक्ति मजबूत रहेगी |

१] जो लोग सुबह की हवा में प्राणायाम करते हैं उनमें प्राणबल बढने से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है और इससे कई रोगकारी जीवाणु मर जाते हैं | जो प्राणायाम के समय एवं उसके अलावा भी गहरा श्वास लेते हैं उनके फेफड़ों के निष्क्रिय पड़े वायुकोशों को प्राणवायु मिलने लगती हैं और वे सक्रिय हो उठते हैं | फलत: शरीर कि कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा रक्त शुद्ध होता है | नाड़ियाँ भी शुद्ध रहती हैं, जिससे मन प्रसन्न रहता है |

अगर गौ-गोबर के कन्डो या अंगारों पर एक चम्मच अर्थात ८ – १० मि.ली. घी की बूँदे डालकर धूप करते हैं तो एक टन शक्तिशाली वायु बनती है | ऐसे वातावरण में अगर प्राणायाम करें तो कितना फायदा उठाया जा सकता है इसका वर्णन नहीं हो सकता | वायु जितनी बलवान होगी, उतना बुद्धि , मन, स्वास्थ्य बलवान होंगे |

२] सूर्यकिरणों में अद्भुत रोगप्रतिकारक शक्ति है | संसार का कोई वैद्य अथवा कोई मानवी उपचार उतना दिव्य स्वास्थ्य और बुद्धि की दृढ़ता नहीं दे सकता है जितना सुबह की कोमल सूर्य-रश्मियों में छुपे ओज-तेज से मिलता है | प्रात:काल सूर्य को अर्ध्य-दान, सूर्यस्नान (सिर को कपड़े से ढककर ८ मिनट सूर्य कि और मुख व १० मिनट पीठ करके बैठना ) और सूर्यनमस्कार करने से शरीर ह्रष्ट-पुष्ट व बलवान बनता है |

डॉ. सोले कहते हैं : “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की किसी अन्य चीज में नहीं हैं |”

३] तुलसी के १ – २ पौधे घर में जरुर होने चाहिए | दूसरी दवाएँ कीटाणु नष्ट करती हैं लेकिन तुलसी की हवा तो कीटाणु पैदा नहीं होने देती है | तुलसी के पौधे का चहुँऔर २०० मीटर तक प्रभाव रहता है | जो व्यक्ति तुलसी के ५-७ पत्ते सुबह चबाकर पानी पीता है उसकी स्मरणशक्ति बढ़ती है, ब्रह्मचर्य मजबूत होता है | सैकड़ों बीमारियाँ दूर करने की शक्ति तुलसी के पत्तों में है | तुलसी के एक चुटकी बीज रात को पानी में भिगोकर सुबह पीने से आप दीर्घजीवी रहेंगे और बहुत सारी बीमारियों को भगाने में आपकी जीवनीशक्ति सक्षम रहेगी |

४] श्वासोच्छवास की भगवन्नाम-जपसहित मानसिक गिनती ( बिना बीच में भूले ५४ या १०८ तक) या अजपाजप करें |

५] ख़ुशी जैसी खुराक नहीं, चिंता जैसा मर्ज नहीं | सभी रोगों पर हास्य का औषधि की नाई उत्तम प्रभाव पड़ता है | हास्य के साथ भगवन्नाम का उच्चारण एवं भगवदभाव होने से विकार क्षीण होते हैं, चित्त का प्रसाद बढ़ता है एवं आवश्यक योग्यताओं का विकास होता है | हरिनाम, रामनाम एवं ॐकार के उच्चारण से  बहुत सारी बीमारियाँ मिटती हैं और रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है | दिन कि शुरआत में भगवन्नाम-उच्चारण करके सात्त्विक हास्य से ( देव-मानव हास्य प्रयोग करने से ) आप दिनभर तरोताजा एवं ऊर्जा से भरपूर रहते हैं, प्रसन्नचित्त रहते हैं | हास्य आपका आत्मविश्वास भी बढ़ता है |

(रोगप्रतिकारक प्रणाली पर प्रसन्न एवं खिन्न चित्तवृत्ति का प्रभाव देखने हेतु ‘स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयार्क एट स्टोनी ब्रूक में प्रतिष्ठित प्रोफेसर रह चुके ए .ए. स्टोन ने परिक्षण किया | उन्होंने पाया कि प्रसन्न चित्तवृत्ति के समय में व्यक्ति कि प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया ( antibody response) क्षमता अधिक होती है |  खिन्न मनोवृत्ति होने पर यह क्षमता कम पायी गयी |)

६] नीम के पत्ते, फल, फुल, डाली, जड़ – इन पाँचो चीजों को देशी घी के साथ मिश्रित करके घर में धूप किया जाय तो रोगी को तत्काल आराम मिलता है, रोगप्रतिकारक शक्तिवर्धक वातावरण सर्जित हो जाता है |

७] नीम और ग्वारपाठे (घृतकुमारी) की कडवाहट बहुत सारी बीमारियों को भगाती है | ग्वारपाठा जीवाणुरोधी (antibiotic) व विषनाशक भी है | यह रोगप्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत करने में अति उपयोगी है | [ नीम अर्क व घृतकुमारी रस (Aloe Vera Juice) का भी उपयोग कर सकते हैं | ]    

८] शुद्ध च्यवनप्राश मिले तो उसका एक चम्मच (१० ग्राम ) अथवा आँवला पाउडर एक चम्मच सेवन करने से पाचनशक्ति की मजबूती और बढ़ोत्तरी होगी | रोगप्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ेगी | [ मधुमेह वाले शुगर फ्री च्यवनप्राश लें | ]

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   

क्षमा माँगने का सही ढंग


लोग बोलते हैं : ‘जाने – अनजाने में मुझसे कुछ गलती या भूलचूक हो गयी हो तो माफ़ कर देना !’

यह माफ़ी लेने कि सच्चाई नहीं है, बेईमानी है | यह माफ़ी माँगता है कि मजाक उड़ाता है ? ‘भूलचूक हो गयी हो तो .... ‘ नहीं | कहना चाहिए : ‘भूल हो गयी है, क्षमा माँगने योग्य नहीं हूँ लेकिन आपकी उदारता पर भरोसा है, आप मुझे क्षमा कर दीजिये !’ यह सज्जनता है |


 ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   

ॐकार का महत्त्व क्या और क्यों ? भाग -२


की महिमा के संबंध में अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं और लिखे जाते रहेंगे, फिर भी की महिमा का पूरा वर्णन करना सम्भव नहीं है |

सभी मजहबों में ॐकार की महानता का लाभ उठाने का प्रयास किया गया है | बौद्ध धर्म ने इस ॐकार को अत्यंत आदर से स्वीकारा और लाभ लिया है : ‘ओं मणिपद्मे हूं |’ जो ह्रदयरपी गुहा में मणि कि नाई चमकता है उसे हमारा नमन है ! जैन ‘णमो अरिहंताणं | णमो सिद्धाणं |....’ आदि णमोकार मंत्र का उच्चारण करते हैं | मुसलमानों ने ॐकार को आमीन-आमीन... करके उसके दूसरे रूप को बनाकर फायदा लिया | ‘१ ओंकार...’ करके सिख भाइयों ने फायदा लिया, गुरुओं ने फायदा लिया तो ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |’ करके वैष्णवों ने , ‘ॐ नम: शिवाय |’ करके शैवों ने फायदा लिया | ॐकार कि महिमा सभी धर्मों ने , सभी सम्प्रदायों ने स्वीकार की है |

जो संसार का रक्षण करता है, जो संसार को गति देता है और सदा रहता है, प्रलय के बाद भी जो ज्यों-का- त्यों रहता है उस सच्चिदानंद को ‘अकालपुरुष वादी ‘अकाल कहते हैं, सांख्यवादी ‘पुरुष कहते हैं, भगवतवादी ‘भगवान कहते हैं, प्रीतिवादी ‘प्रेमास्पद कहते हैं | उस परमेश्वर की स्वाभाविक ध्वनि है ॐकार |

दूसरे सारे शब्द आहत से पैदा होते है परंतु ॐकार अनहद है, टकराव से नहीं, बेटकराव सहज स्फुरित होता है | ॐकार के बिना के जो मंत्र हैं वे प्राय: अपूर्ण और अधूरे माने जाते हैं | ॐकार पूर्णता देनावाला है | ॐकार मंत्र मंत्रों को मंत्र बनानेवाली स्वीकृति सत्ता है |

इससे ३ दिन में मनोरथ होने लगेंगे पुरे
गोपथ ब्राह्मण’ में आया है कि जो ब्राह्मण ( ब्रह्म-परमात्मा को पाने का प्रयास करनेवाले) केवल ३ रात्रि उपवास (अनाहार) करके पूर्वाभिमुख होकर कुशासन पर बैठ के ॐकार का जप करे, मौन रहे तो वह मनोवांछित पद, मनोवांछित वस्तु और मनोवांछित परिस्थिति को प्राप्त हो जाता है | अधिक जप न करे तो कोई हर्ज नहीं, केवल हजार बार जप हो जायेगा रोज तो भी चल जायेगा | माला गिनतीपूर्वक जपे और प्रेमपूर्वक अर्थसहित जपे तो उसके मनोरथ पूर्ण होने लगते हैं |

ॐकार कि उपासना कितनी महत्त्वपूर्ण !

गरुड़ पुराण के आचार कांड में लिखा है कि ‘ॐकार कि उपासना से राष्ट्र की अभिवृद्धि होती है और योग से राजा वृद्धि को प्राप्त करते हैं तथा उसे किसी भी प्रकार कि व्याधियाँ बाँध नहीं सकतीं |’

जो भी व्यक्ति ॐकार की उपासना करता है वह रोगरहित और समृद्ध होता है | ॐकार कि उपासना कितनी महत्त्वपूर्ण है ! थोड़ी ॐकार- उपासना की रीत जानकर अगर आप आधा घंटा शुरू करो फिर पौना घंटा, एक घंटा, दो घंटा करो तो कहना ही क्या है ! लेकिन जितना संसार के लिए आप परिश्रम करते हैं, माथापच्ची करते हैं, घुटने टेकते हैं उसका दसवाँ हिस्सा भी यह परिश्रम का मार्ग नहीं है और अनंत गुना फल हो जायेगा, भगवान की उपासना में इतना प्रभाव है |

स्नातं तेन सर्व तीर्थ...... उसने सारे तीर्थों में नहा लिया. दातं तेन सर्व दानं...... उसने सब कुछ दान कर लिया, कृतं तेन सर्व यज्ञं..... उसने सारे यज्ञ कर लिये, येन क्षणं मन: ब्रह्मविचारे स्थिरं कृतम | जिसने क्षणभर के लिए भी मन ब्रह्म-परमात्मा में स्थित किया हो |

ब्रह्म-परमात्मा का स्वाभाविक नाम है | एक होती है खोज और दूसरा होता है निर्माण | खोज उसीकी होती है जो पहले है | निर्माण उसीका होता है जो पहले से नहीं है | आदिनारायण के पहले यह ॐकार मंत्र था तभी शास्त्रों ने कहा कि भगवान नारायण ने इस मंत्र की महिमा खोजी |

ॐकार मंत्र बीजमन्त्र माना जाता है | जैसे पृथ्वी में जैसा बीज बोओं वैसा फल मिलता है, ऐसे ही इस बीजमंत्र से वैराग्य, भगवदभक्ति, परमात्मप्रीति, विद्या, शांति ..... चाहे जो माँगो, वह देर-सवेर फलता है | और केवल इससे इसीको माँगो – भगवान को माँगो तो वह संकल्प भी फलता है | इस मंत्र के तो इष्टदेव ही अन्तर्यामी परमात्मा हैं | सबके अंदर अनुस्यूत जो सत्तास्वरुप परमेश्वर हैं वे इसके इष्टदेव हैं, मंत्र के देवता हैं |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   


विशेष सुचना : जोधपुर राखियाँ न भेजें – पूज्य बापूजी


भगवान और संत भाव के भूखे हैं अत: मन – ही – मन राखी अर्पण करके मन से बाँध देना, पुण्यमय भाव लाना | यहाँ सारी राखियाँ मेरे तक नहीं पहुँच पाती हैं | यदि राखियाँ नहीं भेजेंगे तो आज्ञा मानने का पुण्य होगा उअर अगर भेजेंगे तो आज्ञा का उल्लंघन करके भजेंगे इसलिए अवज्ञा करने का भो दोष होगा |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   

बहुत सरल है ह्रास को रोक के विकास करना !



१)     व्यर्थ चिंतन : व्यर्थ का चिंतन त्याग दें | व्यर्थ चिंतन हटाने के लिए बीच – बीच में ॐकार का उच्चारण, सुमिरन करें | व्यर्थ के चिंतन में शक्ति का ह्रास होता है | व्यर्थ कि उधेड़बुन होती रहती है, उसमें बहुत सारी शक्ति खत्म होती हैं | भगवद-उच्चारण, भगवत्सुमिरन से व्यर्थ के चिंतन का अंत हो जाता है |

)     व्यर्थ बोलना : व्यर्थ का भाषण, व्यर्थ की बात.... १० शब्द बोलने हों तो ६ में निपटाओ तो आपका बोलना प्रभावशाली रहेगा | जो १० कि जगह पर ५० शब्द बोलते हैं उनकी कोई सुनता भी नहीं | १० कि जगह पर १०-१२ तो चल जाय, २० बोलेगा तो भी लोग ऊबेंगे | कट – टू – कट बोलना चाहिए | फोन पर भी कट-टू -कट बात करनी चाहिए | व्यर्थ के भाषण से बचना हो तो भगवत्सुमिरन, भगवत्शान्ति में गोता खाते रहो, व्यर्थ की बडबडाहट से बच जाओगे |

३)     व्यर्थ का दर्शन : यह देखो, वह देखो.... इससे तो भगवान को और सद्गुरु को ही देखने कि आदत डाल दो | व्यर्थ का देखना बंद हो जायेगा, कम हो जायेगा |

४)     व्यर्थ का सुनना : व्यर्थ का सुनने कि आदत होती है | टी.वी. में व्यर्थ का देखते हैं, व्यर्थ का सुनते हैं, जिससे गडबड संस्कार पड़ जाते हैं | इसकी अपेक्षा भगवान को देखो और भगवत्कथा सत्संग सुनो |   

५)     व्यर्थ का घूमना : इधर गये, उधर गयें.... इससे तो फिर सत्संग में जाओ और सेवा के लिए घूमो तो व्यर्थ का घूमना बंद हो जायेगा |

तो व्यर्थ का सोचना, बोलना, देखना, सुनना और घूमना – इनमें शक्ति का ह्रास होता है इसलिए उन्हें सार्थक में ले आओ |


ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   


चतुर्मास में विद्यार्थियों के लिए उपहार


चतुर्मास में विद्यार्थी जहाँ भी हैं, अनुष्ठान चालू करें | बाल संस्कारवाले भी लग जायें | रोज सारस्वत्य मंत्र का १७० माला जप करें, मौन रहें, ध्यान करें, अकेले में श्वासोच्छवास गिनें..... तो उन बच्चों को प्रमाणपत्र लेकर नौकरी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा, नौकरी तो उनके चरणों की दासी बन जायेगी और सफलता उनके चरण चूमने का इन्तजार करेगी | लेकिन मेरे बच्चे, नहीं रहते कच्चे ! वे सफलता के गुलाम नहीं रहते, वे तो भगवान और सद्गुरु के प्यारे रहते हैं |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   

जन्माष्टमी व्रत की महिमा


( श्रीकृष्ण जन्माष्टमी – ११ व १२ आगस्त )


१] भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिरजी को कहते हैं : “२० करोड़ एकादशी व्रतों के समान अकेला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत हैं |”

२] धर्मराज सावित्री से कहते हैं : “ भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है वह १०० जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है |”

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से   

संक्रामक बीमारियों से कैसे हो सुरक्षा ?


आयुर्वेद में संक्रामक बीमारियों का वर्णन आगंतुक ज्वर (अर्थात शरीर से बाह्य कारणों से उत्पन्न बुखार या रोग ) के अंतर्गत आया है | यह किसीको होता है और किसीको नहीं, ऐसा क्यों ?

चरक संहिता (चिकित्सा स्थान :३.११-१२) में आचार्य पुनर्वसु कहते हैं : “एक ही ज्वररूपी अर्थ को ज्वर, विकार, रोग, व्याधि और आतंक – इन नामबोधक पर्याय शब्दों से कहा जाता है | शारीरक व मानसिक दोषों के प्रकोप के बिना शरीरधारियों को ज्वर (रोग) नहीं होता अत: शारीरिक वात, पित्त, कफ तथा मानसिक रजो –तमोगुणरूप दोष ज्वर के मूल कारण कहे गये हैं |”

तात्पर्य, यदि शारीरिक व मानसिक दोष विकृत नहीं होंगे तो कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश करने पर रोग को उत्पन्न नहीं कर पायेगा, कुछ हलके-फुलके लक्षण दिखा सकता हैं |

इसका अर्थ यह नहीं हैं कि असावधानी बरती जाय | रोगाणु शरीर में प्रवेश ही न करें इसकी सावधानी एवं नियम-पालन तो परम आवश्यक है किंतु साथ ही अनजाने में कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश कर ले तो उसे अपना प्रभाव जमाने का मौका न मिले ऐसी सुरक्षात्मक सावधानी रखने के प्रति सजग करने का यहाँ उद्देश्य है |

दोष-विकृति के कारण
१] जठराग्नि की विकृति : चरक संहिता (चि.स्था.:१५.४२-४४) के अनुसार ‘भूख लगने पर भोजन न करने से, पहले खाया हुआ भोजन नहीं पचने पर भी बिना भूख के भोजन करने से, कभी ज्यादा-कभी कम, कभी समय पर तो कभी असमय भोजन करने से, पचने में भारी, ठंडे, अति रूखे, दूषित व प्रकृति-विपरीत पदार्थो के सेवन से, मल-मूत्रादि के वेगों को रोकने से, देश-काल-ऋतू के विपरीत आहार होने से दूषित हुई जठराग्नि पचने में हलके अन्न को भी उचितरूप में नहीं पचा पाती | नहीं पचा अन्न विष के समान हानिकारक हो जाता है |’
चरक संहिता (विमान स्थान:२.९) में आता है कि ‘चिंता, शोक, भय, क्रोध, दुःख, शय्या (दिन में सोना ) और देर रात तक (११-१२ बजे के बाद) जागरण के कारण मात्रा से भी खाये हुए पथ्य अन्न का ठीक से पाचन नहीं होता है |’
अत: स्वस्थ रहने की इच्छावालों कप उपरोक्त असावधानियों से बचना चाहिए |

२] उचित आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य का अभाव: उचित आहार, उचित निद्रा एवं ब्रह्मचर्य-पालन-ये वात, पित्त और कफ को संतुलित रखते हुए शरीर को स्वस्थ व निरोग बनाये रखते हैं इसलिए इन तीनों को आयुर्वेद ने शरीर के ‘उपस्तम्भ’ माना है | अत: उत्तम स्वास्थ्य के लिए इन तीनों का ध्यान रखना अनिवार्य हैं |

३] हितकारक सेवन, आचार, कर्मों का अभाव : मनुस्मृति (१.१०८) में आता है कि ‘सभी धर्मों (कर्तव्य-कर्मों) में ‘सदाचार’ सर्वोत्तम है |’ इसका आचरण करने से जीवन सफल होता है व न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है |

चरक संहिता (सूत्र स्थान: ७.६०) में कहा गया है : ‘इस संसार में और मरने के बाद सुख की इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह आहार, आचार और सभी प्रकार की चेष्टाओं में हितकारक वस्तु के सेवन का परम प्रयत्न करे |’ यहाँ आहार से तात्पर्य केवल स्थूल भोजन से नहीं लें | पाँच इन्दिर्यों द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध – यह जो भी सेवन किया जाता है वह महापुरुषों व शास्त्रों द्वारा ‘आहार’ ही कहा गया है | इन सभीके सेवन में असावधानी रोग-बीमारियों को जन्म देती है |

रोगाणुजन्य आगंतुक रोगों से बचने एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है कि दोष-विकृति करनेवाले कारणों से बचा जाय |

आगंतुक रोगों की उत्पत्ति रोकने का उपाय

रोगों की उत्पत्ति के बाद उनका उपचार करना, इससे भी अच्छा यह माना गया है कि रोग पैदा ही न हों इसकी पहले से ही सावधानी रखी जाय, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा की जाय- स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं.... (च.सं., सू. स्था.:३०.२६)

चरक संहिता (सू.स्था. :७.५३-५४)में आता है :’प्रज्ञापराधों (बुद्धि की नासमझी से उत्पन्न अपराधों ) का त्याग करना, इन्द्रियों का उपशम अर्थात इन्दिर्यों को अपने वश में रखना, स्मरणशक्ति उत्तम रखना, देशज्ञान, कालज्ञान (देश व काल के अनुरूप आहार-विहार का ज्ञान ) और आत्मज्ञान का चिंतन करके उनको स्वभाव में आत्मसात करना और सदवृत्त (शास्त्र व संत सम्मत सदाचार) का पालन करना – यह आगंतुक रोगों के उत्पन्न न होने देने का मार्ग है | बुद्धिमान व्यक्ति को रोगोत्पत्ति होने से पहले ही ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे अपना हित हो सके |’

आप्तोपदेश – पालन से लाभ
‘आप्तपुरुषों (ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों) के उपदेशों को विशेषरूप से प्राप्त करना और ठीक प्रकार से उनका पालन करना – ये दो कारण मनुष्यों की रोगों उत्पत्ति से रक्षा करते हैं और उत्पन्न रोगों को शीघ्र ही शांत करते हैं |’ (च.सं., सू.स्था.: ७.५५)

हमारे शास्त्रों-महापुरुषों व शास्त्रों द्वारा ‘आहार’ ही कहा गया है | इन सभीके सेवन में असावधानी रोग-बीमारियों को जन्म देती है |

रोगानुजन्य आगंतुक रोगों से बचने एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है कि दोष-विकृति करनेवाले कारणों से बचा जाय |

आगंतुक रोगों की उत्पत्ति रोकने का उपाय
रोगों की उत्पत्ति के बाद उनका उपचार करना, इससे भी अच्छा यह माना गया है कि रोग पैदा ही न हों इसकी पहले से ह सावधानी रखी जाय, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा की जाय - स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं.... (च.सं., सू. स्था.:३०.२६)

चरक संहिता (सू.स्था.:७.५३-५४) में आता है : ‘प्रज्ञापराधो (बुद्धि की नासमझी से उत्पन्न अपराधों ) का त्याग करना, इन्दिर्यों का उपशम अर्थात इन्द्रियों को अपने वश में रखना, स्मरणशक्ति उत्तम रखना, देशज्ञान, कालज्ञान (देश व काल के अनुरूप आहार-विहार का ज्ञान) और आत्मज्ञान का चिंतन करके उनको स्वभाव में आत्मसात करना और सदवृत्त (शास्त्र व संत सम्मत सदाचार) का पालन करना – यह आगंतुक रोगों के उत्पन्न न होने देने का मार्ग है | बुद्धिमान व्यक्ति को रोगोत्पत्ति होने से पहले ही ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे अपना हित हो सके |’

आप्तोपदेश-पालन से लाभ
‘आप्तपुरुषों ( ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों ) के उपदेशों को विशेषरूप से प्राप्त करना और ठीक प्रकार से उनका पालन करना – ये दो कारण मनुष्यों की रोगों की उत्पत्ति से रक्षा करते हैं और उत्पन्न रोगों को शीघ्र ही शांत करते हैं |’  (च. सं., सू.स्था. :७:५५ )

हमारे शास्त्रों-महापुरुषों द्वारा बताये गये ऐसे निर्देशों की जिस व्यक्ति, समाज, देश द्वारा जितनी उपेक्षा की जाती है, उसे उसका उतना ही अधिक दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है और इन निर्देशों का जितना आदरपूर्वक पालन किया जाता है उतना ही ऊँचा लाभ उसे होता है |

रोगप्रतिरोधक क्षमता बढायें
चिकित्सा विज्ञान कहता है कि जीवाणु या विषाणु रोगप्रतिकारक शक्ति कम होने पर संक्रमित करते हैं | देशवासी सजग एवं विशेष तत्पर होकर ब्रह्मनिष्ठ संतों एवं सत्शास्त्रों द्वारा बताये गये जीवन को निरोगी, स्वस्थ, रोगप्रतिकारक शक्ति से सम्पन्न बनानेवाले निर्देशों का पालन करें तो बीमारियों एवं महामारियों से रक्षित होने में मदद मिलेगी |  

कैसा हो आहार-विहार ?
महामारियाँ मानव-समाज को बहुत कुछ सीख देती जा रही हैं, जैसे –
१] व्यक्तिगत व सामजिक स्वच्छता |
२] कार्य के समय दुरी बनाये रखते हुए अपने स्वास्थ्य एवं आभा की रक्षा करना |
३] दूसरों से हाथ न मिलाना एवं प्राणियों के स्पर्श व श्वासोच्छवास से बचना |
४] अंडा, मांसाहार एवं व्यसनों से दूर रहकर शुद्ध, सात्त्विक, शाकाहारी आहार लेना |
५] बिगड़ी हुई दिनचर्या को सुधारना |

स्वास्थ्य-रक्षा हेतु इनका भी ध्यान रखें :
१]  पीने के लिए उबालकर ठंडे किये पानी का उपयोग करें |
२] यदि उपलब्ध एवं अनुकूल हो तो सुबह तुलसी व नीम के पत्ते लें | ( अथवा तुलसी अर्क व नीम अर्क पानी मिला के ले सकते हैं |)
३] फ्रिज में रखी चीजों का सेवन जठराग्नि मंद करने के साथ अन्य हानियाँ भी करता हैं |
४] बाजारू खान-पान से बचें |
५] प्राणायाम,योगासन, सूर्यनमस्कार आदि यथाशक्ति करें |
६] गुनगुने पानी में थोड़ी हल्दी व सेंधा नमक डाल के रोज १ – २ बार गरारे कर सकते हैं |

करें रोगाणुरहित वातावरण का निर्माण
·       घर में नित्य कपूर जलाने से वातावरण के रोगाणु नष्ट होते हैं तथा शरीर पर बीमारियों का आक्रमण आसानी से नहीं होता |
·       अथर्ववेद ( कांड १९, सूक्त ३८, मंत्र १ ) में आता है कि ‘जिस मनुष्य के आसपास औषधिरूप गूगल कि श्रेष्ठ सुगंध व्याप्त रहती है, उसे कोई रोग पीड़ित नहीं करता |’ पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है कि “जैसे बिल्ली को देखकर चूहे और शेर को देख के जंगली पशु भाग जाते हैं, ऐसे ही गूगल का धूप जहाँ होता हैं वहाँ से रोग के कीटाणु भाग जाते हैं | गोबर के कन्डो (या गौ-चंदन धूपबत्ती के टुकडो ) पर घी कि बूँदे, चावल, कपूर, गूगल आदि धूप-सामग्री डालकर धुआं करें या नीम के पत्तों का भी धुआँ कर सकते हैं |
·       थोडा गोमूत्र पानी में डालकर घर में पोंछा आदि लगाया जाय | केमिकलवाला फिनायल तो रोगाणुओं को मारता है, पवित्रता नहीं लाता परंतु गोमूत्र तो रोगाणुरहित करते हुए पवित्रता भी लाता है |


डर नहीं, सावधानी है जरूरी
डर से तनाव बढ़ता है और तनाव से रोगप्रतिरोधक शक्ति का ह्रास होता है | अत: महामारी से भयभीत होने के बजाय इससे संबंधित सावधानियों और उपचार में सजग रहें | विश्व के लिए विषम काल में जनता तक सही, शास्त्रीय जानकारी पहुंचानेवालों को साधुवाद है और भ्रामक बातें फैलानेवाले से सावधान रहना जरूरी है |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०२० से

Tuesday, June 16, 2020

इन तिथियों का लाभ अवश्य लें




१ जुलाई : देवशयनी एकादशी (महान पुण्यमय, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदाता तथा पापनाशक व्रत), चतुर्मास व्रतारम्भ

५ जुलाई : गुरुपूर्णिमा, ऋषि प्रसाद जयंती, विद्यालाभ योग ( ५ व ६ जुलाई को केवल गुजरात व महाराष्ट्र में )

१५ जुलाई : कलिका एकादशी (इसका व्रत व रात्रि – जागरण करनेवाला मनुष्य न तो कभी भयंकर यमराज का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है |)

१८ जुलाई : चतुर्दशी-आर्दा नक्षत्र योग (ॐकार का महत्त्व क्या और क्यों ? टिप देखें )



२० जुलाई : सोमवती अमावस्या (सूर्योदय से रात्रि ११:०३ तक ) (तुलसी की १०८ परिक्रमा करने से दरिद्रता-नाश )


ऋषिप्रसाद – जून २०२० से  

स्वास्थ्यप्रद दोहे


सौंफ, इलायची गर्मी में,
                       लौंग सर्दी में खायें |
त्रिफला सदाबहार है,
                   रोग सदैव हर जाय ||
वात – पित्त जब – जब बढ़ें, पहुँचावे अति कष्ट |
सोंठ आँवला द्राक्ष संग, खावै पीड़ा नष्ट ||

यह मौसम है वायु और पित्त का | तो सोंठ, आँवला और द्राक्ष का मिश्रण बनाकर काढ़ा बना लें अथवा ऐसे ही खा लें तो वायु और पित्त के प्रकोप से होनेवाली बीमारियों का शमन होता है |

खाँसी जब-जब भी करे, तुमको अति बेचैन |
सिकी हींग अरु लौंग से, मिले सहज ही चैन ||
दिन के अंत में दूध लो, रात के अंत में पानी |
भोजन के अंत में छाछ लो,
                           क्षण-क्षण सुमिरो स्वामी ||


ऋषिप्रसाद – जून २०२० से

शराब की लत छोड़ने या छुड़ाने हेतु


(अंतर्राष्ट्रीय नशामुक्ति दिवस : २६ जून)
स्वयं को लत लगी हो तो.....

जिनको शराब की लत गयी हो और शराब नहीं छूटती हो वे अपनी जेब में ३ – ४ बार धोयी हुई थोड़ी किशमिश रखा करें | शराब पीने की इच्छा हो तब १०-१२ ग्राम किशमिश के दाने लें और एक-एक दाना मूँह में डालकर चबाते हुए उसका रस चूसते जायें | यदि आप घर में हों तो किशमिश का शरबत बना के भी पी सकते हैं | इससे दिमाग को ताकत मिलेगी और धीरे-धीरे शराब छोड़ने की क्षमता आ जायेगी | शराब पीने से जो ज्ञानतंतु कमजोर हो गये हैं, नसें कमजोर हो गयी हैं वे किशमिश के सेवन से बलवान हो जायेंगी और आप उत्साह, शक्ति और प्रसन्नता का अनुभव करेंगे | इस प्रयोग के साथ इस मंत्र का जप करना भी लाभदायक है, जो शराब से विरक्ति दिलाता है : ॐ ह्रीं यं यश्वरायै नम: |
(इसके साथ आश्रम से प्रकाशित ‘नशे से सावधान’ सत्साहित्य का पठन करना विशेष लाभदायी है )

दूसरे किसीको लत लगी हो तो ....

जब शराबी निद्रा में हो तब उसके कुटुम्बी उपरोक्त मंत्र को मन में जपें और उसके श्वासोच्छवास के आगे खड़े होकर भावना करें : ‘आप शराब छोड़ दो, आप शराब छोड़ दो....’ इससे भी शराबी की शराब छूटेगी |

ऋषिप्रसाद – जून २०२० से


भोजन की पवित्रता के लिए


लिंग पुराण के ८५ वें अध्याय में आता है : अन्न और अन्य खाद्य-पेय पदार्थों को देखते हुए ११ बार ‘ॐ नम: शिवाय|’ का पावन जप करके फिर ग्रहण करना चाहिए, इससे वे सारे पवित्र हो जाते हैं |

ऋषिप्रसाद – जून २०२० से