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Monday, February 25, 2019

कालभैरवासन


सृष्टि – संहार के समय कालभैरव जैसा भयंकर रूप धारण करते हैं, वैसी ही शारीरिक स्थिति इस आसन में होती है अत: इसे सिद्धों ने ‘कालभैरवासन’ कहा है |

लाभ : इस आसन के नियमित अभ्यास से –
१]  शरीर में दृढ़ता व स्फूर्ति आती है और आंतरिक बल भी बढ़ता है | निर्भीकता आती है |
२] जिव्हा व गले के रोग और टॉन्सिल्स की तकलीफ में आराम मिलता है |
३] चेहरे पर होनेवाले फोड़े-फुँसियाँ ठीक हो जाते हैं व अद्भुत कांति आ जाती है |
४] सीना चौड़ा व सुंदर हो जाता है |
५] यह आँखों के लिए भी अत्यंत उपयोगी माना गया है |

विधि : दोनों पैरों के बीच एक फीट का अंतर रखकर इस प्रकार खड़े हों कि एक पैर के पीछे दूसरा पैर हो | फिर एक हाथ को आगे और दूसरे हाथ को पीछे करते हुए तथा मुख को पूरी तरह से खोल के जीभ बाहर निकालें | इस दौरान आँखों को पूर्णतया खोलकर दोनों भौंहों को देखें | अब बिना किसी हिलचाल के इस स्थिति में रहें | यह आसन पैर बदलकर भी करें |

लोककल्याणसेतु – फरवरी २०१९ से

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