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Sunday, June 23, 2019

पुण्यदायी तिथियाँ



२१ जून : दक्षिणायन आरम्भ (पुण्यकाल : सूर्योदय से सूर्यास्त तक ) (ध्यान, जप व पुण्यकर्म कोटि-कोटि गुना अधिक व अक्षय फलदायी )

२९ जून : योगिनी एकादशी (महापापों को शांत कर महान पुण्य देनेवाला तथा ८८००० ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल देनेवाला व्रत )

४ जुलाई : गुरुपुष्यामृत योग (सूर्योदय से रात्रि २-३० तक )

१२ जुलाई : देवशयनी एकादशी (महान पुण्यमय, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदाता तथा पापनाशक व्रत ), चातुर्मास व्रतारम्भ

१६ / १७ जुलाई : खंडग्रास चन्द्रग्रहण (भूभाग में ग्रहण-समय : गुरुपूर्णिमा की रात्रि में १-३१ से ४-३० तक )


ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से


स्वच्छ और मजबूत दाँतों व स्वस्थ मसूड़ों के लिए असरकारक औषधियाँ


इन औषधियों से पायें अनेक लाभ:

  • दाँतों और मसूड़ों के दर्द को दूर कर उन्हें बनायें मजबूत |
  • दाँतों का हिलना, उनमें कीड़ें लगना, छिद्र होना, मैल जमना, सड़न होना, खून निकलना आदि में      लाभदायी |
  • मसूड़ों में सूजन, पीब निकलना, मुँह से दुर्गंध आना, मुँह के छाले तथा जिह्वा, तालू और होंठों के सभी रोगों में लाभ होता है |



-           ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

हर प्रकार के सुलगते सवालों व ढेरों समस्याओं का हल आश्रम का इष्टग्रंथ श्री योगवासिष्ठ महारामायण (भाग १ से ४ )



सहज में दुःख दूर करके परमात्मा के दिव्य आनंद से जीवन को सराबोर करनेवाला अदभुत सदग्रंथ | इससे जानिये – क्या है सृष्टि का मूल और कैसे हुई जगत की उत्पत्ति ? आत्मसाक्षात्कार करने का सबसे सरल उपाय |

चारों भागों का मूल्य : रु ७२५ ( डाक खर्च बिल्कुल मुफ्त !)

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

शांति के साथ आर्थिक सम्पन्नता लाने हेतु


सोते समय किसी सफेद कागज में थोडा-सा कपूर रखें और प्रात: उसे घर से बाहर जला दें | इससे घर में शांति के साथ आर्थिक सम्पन्नता आती है | 

(कपूर संत श्री आशारामजी आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध है |)

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

लक्ष्मी के नाराज होने के कारण


१] कमल-पुष्प, बिल्वपत्र को लाँघने अथवा पैरों से कुचलने पर लक्ष्मी रुष्ट होकर चली जाती हैं |

२] जो निर्वस्त्र होकर स्नान करता है, नदियों, तालाबों के जल में मल-मूत्र त्यागता है उसको लक्ष्मी अपने शत्रु कर्ज के हवाले कर देती हैं |

३] जो भूमि या भवन की दीवारों पर अनावश्यक लिखता है, कुत्सित अन्न खाता है उस पर भी लक्ष्मी कृपा नहीं करती हैं |

४] जो पैर से पैर रगडकर धोता है, अतिथियों का सम्मान नहीं करता, याचकों को दुत्कारता है, पशु-पक्षियों को चारा, दाना आदि नहीं डालता है, गाय पर प्रहार करता है ऐसे व्यक्ति को लक्ष्मी तुरंत छोड़ देती हैं |

५] जो संध्या के समय घर-प्रतिष्ठान में झाड़ू लगाता है, जो प्रात:  एवं संध्याकाल में ईश्वर की आराधना नहीं करता, तुलसी के पौधे की उपेक्षा, अनादर करता है उसको लक्ष्मी उसके दुर्भाग्य के हाथों में सौंप देती हैं |

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

विविध रोगों में लाभकारी त्रिदोषशामक हरड (हर्रे)


हरड मनुष्यों के लिए माता के समान हितकारी है | इसमें षडरसों में से लवण (खारा) रस छोडकर शेष सभी रस होते हैं | अत: यह वायु, कफ व पित्त – तीनों का शमन करती है | इसे चबाकर खाने जठराग्नि की वृद्धि, पीस के खाने से मल का शोधन व भून के खाने से त्रिदोष-शमन होता है तथा उबाल के खाने पर यह मल को रोकती है | सेंधा नमक के साथ खाने से कफ-संबंधी, मिश्री के साथ खाने से पित्त-संबंधी, घी के साथ खाने से वायु-संबंधी रोग और गुड़ के साथ खाने से यह समस्त व्याधियों को दूर करनेवाली होती है |



हरड रसायन योग
हरड व गुड़ के सम्मिश्रण से बना ‘हरड रसायन योग’ त्रिदोषशामक व शरीर को शुद्ध करनेवाला उत्तम रसायन है | इसको चूसकर सेवन करने से भूख खुलती है | अजीर्ण, अम्लपित्त, संग्रहणी, पेटदर्द, अफरा, कब्ज आदि पेट के विकार दूर होते हैं | छाती व पेट में संचित कफ को यह नष्ट करता है | अत: दमा, खाँसी व गले के विविध रोगों में भी यह लाभदायी है | इसके नियमित सेवन से बवासीर, आमवात, वातरक्त (gout), कमरदर्द, जीर्णज्वर, गुर्दों (kidneys) के रोग, रक्ताल्पता (anaemia) व यकृत – विकारों में लाभ होता है | यह ह्रदय के लिए बलदायक व श्रमहर है |

यह योग आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर ‘हरड रसायन टेबलेट’ के नाम से उपलब्ध है | विभिन्न रोगों में लाभदायी हरड के अन्य उत्पाद ‘हरड टेबलेट’‘हरडे चूर्ण’ भी सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |

हरड रसायन टेबलेट की सेवन – मात्रा : भोजन के दो घंटे बाद २ – २ गोलियाँ चूसकर अथवा पानी के साथ लें |

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

कानों की सुरक्षा हेतु


क्या करें

१] कान का मैल निकालने के लिए सरसों या तिल का गुनगुना तेल कान में डालें व दीयासलाई की नोक पर रुई लपेट के उससे सावधानी से कान साफ करें |

२] रात्रि में सोने से पहले सरसों का तेल गुनगुना करके कानों में डालें व धीरे-धीरे हलके हाथों से कनपटी की मालिश करें | इससे कान साफ व स्वस्थ रहते हैं | विजातीय द्रव्यों का निष्कासन होता है |

३] कानों को तेज ध्वनि, हवा आदि से बचायें | इयरफोन जैसे साधनों का सीमित, संयमित उपयोग करें | यथासम्भव कोलाहल से बचें |

४] कान के रोगों में सूर्यस्नान, मौन, संयम आदि का पालन विशेष लाभदायी है |

५] कानों पर सर्दी-गर्मी का असर अधिक होता है अत: अतिशय गर्मी या सर्दी में कानों को ढक लेना चाहिए |

क्या न करें

१] कान में दर्द या खुजली होने पर उसमें पेंसिल, तीली या कोई भी नुकीली चीज भूलकर भी न डालें | किसी भी हालत में कान कुरेदने नहीं चाहिए | कान में फूँक न मरवायें |

२] स्नान के समय कानों में पानी न जाने दें |

३] बाजार में बैठे नीम हकीमों से कान की सफाई न करवायें | असावधानी के कारण कान के पर्दे में छेद हो सकता है |

४] कर्णरोगी के लिए अधिक आराम व अधिक जागरण, वातानुकूलित वातावरण, अधिक चलना, ठंड तथा पंखे की हवा, अधिक बोलना, सिर भिगोकर व ठंडे पानी से स्नान, तैरना, संसार-व्यवहार आदि हानिकारक है |

५] आसमान में बादल हों तब तथा बारिश के दिनों में रात को सोने से पहले कानों में तेल नहीं डालना चाहिए |

संत श्री आशारामजी आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध कर्ण बिंदु व योगी आयु तेल कानों की सुरक्षा हेतु बहुत लाभदायी हैं |

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

ब्रह्मचर्य – रक्षा व १४० प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा का उपाय :स्थलबस्ती


सुबह खाली पेट दक्षिण या पूर्व की तरफ सिर करके सीधे लेट गये | श्वास बाहर निकाल दिया और मल-त्याग करने की इन्द्रिय (गुदा) का संकोचन-विस्तारण किया | एक बार श्वास बाहर रोक के करने से ३५ बार हो जाता है | ऐसे ३ बार करेंगे तो करीब १०० बार हो जायेगा | इसे ‘स्थलबस्ती’ कहते हैं |

८० प्रकार के वायुदोष होते हैं, ४० प्रकार की पित्त-संबंधी बीमारियाँ और २० प्रकार की कफ सबंधी बीमारियाँ होती हैं |

स्थलबस्ती से ए १४० प्रकार की बीमारियाँ निकट नहीं आती हैं, अगर हैं तो भाग जाती हैं | जिसके कंधे जकड़े रहते हैं, जोड़ों में दर्द रहता है, शरीर जकड़ा रहता है वह भी स्थलबस्ती करे तो उसको भी आराम मिलेगा | इसे करने से भक्ति में भी बरकत आयेगी, व्यक्तित्व का प्रभाव भी बढ़ेगा, मन भी प्रसन्न रहेगा, कब्जियत भाग जायेगी और स्वप्नदोष, वीर्यक्षय आदि रोग मिट जायेंगे |

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

औषधीय गुणों से भरपूर काली मिर्च


काली मिर्च गर्म, रुचिकर, पचने में हलकी, भूखवर्धक, भोजन पचाने में सहायक तथा कफ एवं वायु को दूर
करनेवाली है | यह खाँसी, जुकाम, दमा, अजीर्ण, अफरा, पेटदर्द, कृमिरोग, चर्मरोग, आँखों के रोग, पेशाब-संबंधी तकलीफों, भूख की कमी, यकृत के रोग, ह्रदय की दुर्बलता आदि में लाभदायी है | नेत्रविकारों में सफेद मिर्च का विशेषरूप से उपयोग होता है |

काली मिर्च के सेवन से मूत्र की मात्रा बढती है | यह घृतयुक्त स्निग्ध पदार्थों को शीघ्र पचाती है | अल्प मात्रा में तीक्ष्ण होने से यह शरीर के समस्त स्त्रोतों से मल को बाहर कर स्त्रोत-शुद्धि करती है, जिससे मोटापा, मधुमेह(diabetes), ह्रदय की रक्तवाहिनियों के अवरोध(coronary artery disease) आदि से सुरक्षा होती है | दाँत –दर्द या दंतकृमि में इसके चूर्ण से मंजन करना अथवा इसे मुँह में रखकर चुसना लाभदायी है | नाड़ी-दौर्बल्य में यह लाभदायी है |

औषधीय प्रयोग
१] मस्तिष्क व नेत्रों के लिए : प्रात: काली मिर्च का १ – २ चुटकी चूर्ण शुद्ध घी व मिश्री के साथ सेवन करने से मस्तिष्क शांत रहता है तथा दृष्टी बलवान होती है |

२] शरीर-पुष्टि हेतु : रात्रि के समय १-२ काली मिर्च दूध में उबाल के लेने से शरीर में रस धातु की वृद्धि होकर शेष सभी धातुएँ पुष्ट होती हैं, शरीर का पोषण ठीक प्रकार से होता है |

३] दमा व खाँसी में : काली मिर्च का ४ चुटकी चूर्ण १ चम्मच मिश्री, आधा चम्मच शहद व १ चम्मच शुद्ध घी के साथ मिला के दिन में दो बार चटाने से सर्दी, छाती-दर्दसहित होनेवाले दमे व खाँसी में लाभ होता है तथा फेफड़ों में संचित दूषित कफ निकल जाता है |

४] गले के रोग : दिन में एक से दो बार काली मिर्च को चुसना या उसके काढ़े से कुल्ला करना लाभदायी है |

५] अफरा : काली मिर्च से युक्त संतकृपा चूर्ण २ ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ दिन में दो बार लें | अफरे के अलावा यह चूर्ण कब्ज, पेट के कृमि, गैस, बदहजमी, अम्लपित्त , सर्दी, खाँसी, सिरदर्द आदि को दूर करने तथा स्फूर्ति एवं ताजगी लाने हेतु लाभप्रद है |

सावधानी : अधिक मात्रा में काली मिर्च के सेवन से पेटदर्द, उलटी, पेशाब में जलन आदि विकार उत्पन्न होते हैं | अत: इसका अल्प मात्रा में सेवन करें |

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

आरोग्य, समृद्धि व पुण्य प्रदायक वृक्ष


आरोग्यप्रद नीम
रात को भी नीम की हवा आरोग्यप्रद है | ब्रह्मचर्य पालने में और पित्त-शमन करने में नीम का रस बड़ा काम करता है | जिनको पित्त, गर्मी या चमड़ी की तकलीफें हैं या रक्तस्त्राव बार-बार होता है, वे नीम की दातुन करके उसका रस लें तो इनमें राहत मिलेगी, नकसीर फूटना या बवासीर के मस्से या अन्य अंग से रक्त बहना कम हो जायेगा | नीम के पत्ते भी फायदा करते हैं |

चैत्र मास में नीम के फूलों का रस १५-२० दिन लेने से वर्षभर रोगप्रतिकारक शक्ति आपके साथ रहेगी | निबौलियाँ (नीम के फल) सुखा के उनका चूर्ण बना लिया | २०-२५ ग्राम चूर्ण लेकर पानी में उबाला, काढ़ा बन गया, फिर दूसरा थोडा पानी डाल के उससे नहा लिया | ५ दिन ही नहाना है, तबियत खुश हो जायेगी | रोमकूपों में नीम का असर आयेगा | पाप और शरीर के दोष मिटेंगे | अगर पेट की तकलीफें हैं तो इसी काढ़े में से एक आचमन पी भी लो, देखो क्या जादू होता है ! इससे कड़वे रस की कमी की पूर्ति हो जायेगी | प्राय: लोग तीखा, खट्टा, खारा, कसैला तो खाते हैं और मीठा तो दबा के खाते हैं, लेकिन कड़वा रस नहीं लेते | शरीर में षडरसों का असंतुलन होता है तभी शरीर बीमार होता है | इस काढ़े को पीने से इनका संतुलन बन जायेगा | कैसी चिकित्सा खोजी महापुरुषों ने !

कभी-कभी रात्रि को घर में नीम का धुआँ करना सुखदायी होता है |

पुण्यदायी आँवला
शास्त्रों में आँवले के वृक्ष की बड़ी भारी महिमा वर्णित है | आँवला सृष्टि का आदिवृक्ष है | सृष्टि की शुरुआत में भगवान् नारायण की प्रसादीस्वरूप जो कुछ गिरा, उसीमें से आँवले का वृक्ष पैदा हुआ है | इसके सुमिरन से गोदान का फल होता है | स्पर्श से दोगुना और इसका फल खाने से तिगुना फल होता है | आँवला पोषक और पुण्यदायी है | इसके वृक्ष के नीचे ध्यान, जप करने से कोटि गुना फल होता है | हमने तो सभी आश्रमों में आँवले के वृक्ष लगवा दिये |

स्वास्थ व समृद्धि प्रदायक तुलसी
एक और ख़ास बात, तुलसी बोओ | तुलसी के पौधे से जो ऑक्सीजन निकलती है वह बहुत सात्त्विक होती है, और भी बहुत सारे फायदे हैं | आयुर्वेदिक ढंग से तो गजब के फायदे हैं लेकिन हवामान की शुद्धि करने में भी फायदेमंद है तुलसी | सुबह तुलसी के ५-७ पत्तों का सेवन स्मृति और रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाता है |

तुलसी के पौधे घर में लगे हों तो हानिकारक विषाणु नही आते |

ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

आत्मिक धन बढ़ाने का काल (चातुर्मास :१२ जुलाई से ८ नवम्बर)


देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक के ४ महीने भगवान नारायण योगनिद्रा में ध्यानमग्न रहते हैं | जैसे सर्दियों में हिमालय में बर्फ पडती है तो भारत के कई हिस्सों का वातावरण भी ठंडा हो जाता है | ऐसे ही चातुर्मास में भगवान नारायण आत्मशांति में समाधिस्थ रहते हैं तो वातावरण दूसरों को भी ध्यान-भजन करने और मौन-शांत होने में मददगार हो जाता है | जैसे सर्दियों के दिनों में सर्दी का खुराक ( भोजन ) अच्छा पचता है, ऐसे ही ध्यान-भजन करनेवालों को इन दिनों में ध्यान-भजन ज्यादा फलेगा | चातुर्मास में बादल, बरसात की रिमझिम, प्राकृतिक सौन्दर्य का लहलहाना – यह सब साधन- भजनवर्धन है, उत्साहवर्धक है | इसलिए इन दिनों में अनुष्ठान, जप, मौन का ज्यादा महत्त्व है | चातुर्मास में तो सहज में ही साधक के ह्रदय में भगवद-आनंद आ जाता है |

चातुर्मास में क्या करें,  क्या न करें ?

चातुर्मास में ईर्ष्यारहित होना चाहिए | इन दिनों में परनिंदा सुनने व करने से अन्य दिनों की अपेक्षा बड़ा भारी पाप लगता है | शास्त्र कहते हैं :

पर निंदा सम अघ न गरीसा |  (श्री रामचरित उ. कां. १२०.११ )

इसलिए परनिंदा का विशेषरूप से त्याग करें | पत्तल में भोजन करना बड़ा पुण्यदायी है लेकिन पत्तल पर आजकल लेमिनेशन करते हैं, उसमें क्या-क्या गंदी चीजें पडती हैं ! लेमिनेशन बिना की पलाश-पत्तों की पत्तल अथवा बड के पत्तों पर अगर कोई भोजन करता है तो उसे यज्ञ करने का फल होता है |

स्नान करते समय पानी की बाल्टी में २ – ४ बिल्वपत्र डाल दें और ‘ॐ नम: शिवाय |...’ जप करके नहायें अथवा थोड़े तिल व सूखे आँवलों का चूर्ण पानी में डाल के ‘गंगे यमुने ...’ करके नहायें, शरीर को रगड़ें, तो यह तीर्थ-स्नान और पुण्यदायी स्नान माना जाता है | यह शरीर की बीमारियों को भी मिटाता है और पुण्य व प्रसन्नता भी बढ़ाता है |

इन ४ महीनों में शादी और सकाम कर्म मना है | पति-पत्नी का संसार-व्यवहार स्वास्थ्य के लिए खतरे से खाली नहीं हैं | अगर करेंगे तो कमजोर संतान पैदा होगी और स्वयं भी कमजोर हो जायेंगे |

शाश्वत की उपासना का सुवर्णकाल
इन दिनों आसमान में बादल रहते हैं, हवामान ऐसा रहता है कि ज्यादा अन्न पचता नहीं इसलिए एक समय भोजन किया जाता है | जो जीवनीशक्ति भोजन पचाने में लगती है, एक समय भोजन करनेवाले व्यक्ति की वह शक्ति कम खर्च होती है तो वह उसे भजन करने में लगायें, जीवनदाता के तत्त्व का अनुभव करने में लगाये |

दूसरी बात, ध्यान व जप करनेवाले लोग यह बात समझ लें कि चतुर्मास में उपासना तो करनी ही है | नश्वर के लिए तो ८ महीने करते हैं, ये ४ महीने तो परमात्मा के लिए करें,  शाश्वत के लिए करें | इन महीनों में छोटा-बड़ा कोई-न-कोई नियम ले सकते हैं | ईश्वर को आप कुछ नहीं दे सकें तो प्यार तो दे सकते हैं | ईश्वर को प्यार करने में, अपना मानने में, वेदांत का सत्संग सुनने में आप स्वतंत्र हैं | अपने को ईश्वर का और ईश्वर को अपना मानने से स्नेह, पवित्र प्यार व आनंद उभरेगा | आप संकल्प कर लीजिये कि ‘चातुर्मास में इतनी माला तो जरुर करूँगा | इतनी देर मौन रहूँगा | इतना यह साधन अवश्य करूँगा... |’ इस प्रकार कोई नियम लेकर आप अपना आत्मिक धन बढ़ाने का संकल्प कर लो | ॐ ॐ ॐ ...
ऋषिप्रसाद – जून २०१९ से

Thursday, May 30, 2019

बद्धपद्मासन


इसमें पूरा शरीर हाथों व पाँवों द्वारा बँध जाने से यह ‘बद्धपद्मासन’ तथा गरिष्ठ भोजन जल्दी पचाने में सक्षम होने से ‘भस्मासन’ भी कहलाता है |

लाभ: पद्मासन से होनेवाले अनेक लाभ उस आसन से भी मिलते हैं | इसके नियमित अभ्यास से –

१] ह्रदय, फेफड़े, जठर, यकृत व मेरुदंड की दुर्बलता दूर होती है एवं हाथ, पैरों के तलवे, घुटने मजबूत होते हैं |
२] पेट की बीमारियों से सुरक्षा होती है | पेट के अधिकांश रोग जैसे अजीर्ण, अफरा, पेटदर्द तथा प्लीहा व यकृत के विकार दूर होते हैं |
३] हड्डियों का बुखार भी चला जाता है |
४] हर्निया में बहुत लाभ होता है |
५] स्त्रियों की गर्भाशय की बहुत-सी बीमारियाँ दूर होती हैं | संतानोत्पत्ति के बाद पेट पर जो निशान पड़ने लगते हैं वे दूर होते हैं |
६] जिन्हें शरीर के किसी अंग में पसीना न आता हो, जिसके कारण बीमारी का भय हो, उन्हें यह आसन जरुर करना चाहिए |
चित्र १

विधि : बायें पैर को उठाकर दायीं जंघा पर तथा दायें पैर को बायीं जंघा पर इस प्रकार लायें कि दोनों पैरों की एडियाँ नाभि के नीचे आपस में मिल जायें | फिर बायें हाथ को पीछे से ले जाकर बायें पैर के अँगूठे को पकड़ें तथा दायें हाथ को पीछे से ले जा के दायें पैर के अँगूठे को पकड़ें | मेरुदंडसहित सम्पूर्ण शरीर को सीधा रखते हुए स्थित रहें | श्वास दीर्घ, दृष्टि नासाग्र ( नासिका के अग्र भाग पर ) व ध्यान भी वही हो ( देखे चित्र १ ) | इस आसन को दूसरी विधि से भी किया जाता है, जिसमें उपरोक्त स्थिति के बाद सिर को जमीन से लगाकर यथासाध्य रोके रखना होता है (देखें चित्र २ ) |
चित्र २ 

इस आसन को पैर बदलकर भी करना चाहिए |

समय : सामान्यत: १ मिनट; क्रमश: बढ़ाकर १० मिनट तक कर सकते हैं |

लोककल्याणसेतु – मई २०१९ से