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Sunday, September 25, 2016

इन तिथियों का लाभ लेना न भूलें

१५ अक्टूबर :  शरद पूर्णिमा (रात्रि में चन्द्रमा की किरणों में रखी हुई दूध – चावल की खीर का सेवन पित्तशामक व स्वास्थ्यवर्धक है | इस रात को सूई में धागा पिरोने से नेत्रज्योति बढ़ती है | )

२३ अक्टूबर : रविपुष्यामृत योग ( सूर्योदय से रात्रि ८-४० तक )

२६ अक्टूबर : रमा एकादशी ( यह व्रत बड़े – बड़े पापों को हरनेवाला, चिन्तामणि तथा कामधेनु के समान सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है | ), ब्रह्मलीन श्री माँ महँगीबाजी का महानिर्वाण दिवस

२८ अक्टूबर : धनतेरस (इस दिन घर के द्वार पर दीपदान करने से अपमृत्यु का भी नहीं होता |)

२९ अक्टूबर : नरक चतुर्दशी (इस दिन शाम की संध्या एवं रात्रि में मंत्रजप करने से मंत्र सिद्ध होता है |)

३० अक्टूबर : दीपावली ( रात्रि में किया गया जप – तप, ध्यान – भजन अनंत गुना फल देता है | )

३१ अक्टूबर : नूतन वर्षारम्भ ( गुजरात ), बलि प्रतिपदा ( पूरा दिन शुभ मुहूर्त, सर्व कार्य सिद्ध करनेवाली तिथि )

       

स्त्रोत – लोककल्याण सेतु – सितम्बर – २०१६ से   

सेब जाम

यह स्वादिष्ट जाम पोषक तत्त्वों से भरपूर है | ह्रदयरोग, शारीरिक व मानसिक कमजोरी, खून की कमी, कब्ज, टी.बी. व भूख की कमी को दूर करता है | मस्तिष्क को पोषण देकर स्मृतिनाश से रक्षा करता है | यह कोलेस्ट्राँल की मात्रा को घटाने में मदद करता है |


ये अपने नजदीकी संत श्री आशारामजी आश्रम या समिति के सेवाकेंद्र से प्राप्त कर सकते हैं |



स्त्रोत – लोककल्याण सेतु – सितम्बर – २०१६ से      

शतावरी चूर्ण - चिरयौवन, दीर्घायुष्यप्रदायक व मातृ – दुग्धवर्धक

यह बल, वीर्य व बुद्धि वर्धक, चिरयौवन व दीर्घायुष्य देनेवाली, वजन बढाने में मददरूप, नेत्र एवं ह्रदय के लिए हितकर तथा रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ानेवाली श्रेष्ठ औषधि है | इसका नियमित सेवन सामान्य कमजोरी, दुर्बलता, वीर्यसंबंधी बीमारियों, अत्यधिक मासिक स्त्राव, वंध्यत्व आदि रोगों में लाभदायी है | इसके सेवन से प्रसूति के बाद दूध खुलकर आता है |

ये अपने नजदीकी संत श्री आशारामजी आश्रम या समिति के सेवाकेंद्र से प्राप्त कर सकते हैं |



स्त्रोत – लोककल्याण सेतु – सितम्बर – २०१६ से   

सब्जियों में बहूपयोगी – पत्तागोभी

पत्तागोभी कफ - पित्तनाशक, वायुवर्धक व ह्रदय के लिए हितकर है | यह ह्रदय की कमजोरी, त्वचारोग, अम्लपित्त, पाचन तथा मूत्र संबंधी तकलीफों में लाभदायी है | भोजन में इसका नियमित प्रयोग वजन कम करने में बहुत कारगर है | विटामिन ‘सी’ व सल्फर प्रचुर मात्रा में होने से यह रोगप्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाती है |

रेशे अधिक मात्रा में होने से यह कब्जियत में बहुत उपयोगी है | सलाद के रूप में पत्तागोभी को प्रतिदिन कच्चा खाने से पुराने कब्ज से भी छुटकारा मिलता है | पाचनतंत्र की अन्य समस्याओं में भी यह लाभकारी है |

पत्तागोभी में एक ऐसा क्षार – तत्त्व है जो कार्बोहाइड्रेट और शर्करा को वसा में बदलने से रोकता है | इसलिए इसके प्रयोग से मोटापे से बचाव होता है | यह रक्ताल्पता में लाभदायी एवं रक्तशोधक भी है |

पत्तागोभी के फायदे

१] यह सब्जी तंत्रिका – तंत्र व मस्तिष्क को क्रियाशील बनाती है | कैंसर को रोकती है व ठीक करने में मदद करती है |

२] हड्डियों के क्षय व उच्च रक्तचाप से बचाती है | त्वचा व आँखों को स्वस्थ रखती है |

३] ५० ग्राम पत्तागोभी प्रतिदिन चबाकर खाने से बालों की तेजी से वृद्धि होती है व बाल टूटने बंद हो जाते हैं |

४] इसके निरंतर उपयोग से शरीर में संचित विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालने में मदद मिलती है | कुछ दिनों तक इसकी सब्जी खाने से अनिद्रा में लाभ होता है |

५] १ कप पत्तागोभी के रस में १ चम्मच शहद व चौथाई चम्मच जीरा – चूर्ण मिलाकर प्रात: पीने से ह्रदय की दुर्बलता के कारण सीढ़ियाँ चढ़ते समय दम फूलना, धडकन तेज होना, छाती में दर्द होना, भारीपन लगना आदि में फायदा होता है | एक – दो महीने तक यह प्रयोग करें |

६] पायरिया में गोभी के रस से कुल्ला करके दाँत व मसूड़ों पर तिल के तेल से मालिश करने से लाभ होता है |

७] पत्तागोभी का १०० ग्राम रस २ – ३ बार पीने से पेट के अल्सर से उत्पन्न दर्द शीघ्र नष्ट होता है | अल्सर का घाव भरने में भी मदद मिलती है |

८] पाचनशक्ति कमजोर होने से शरीर का भार घटता जा रहा हो तो इसके रस में गाजर का रस मिलाकर पियें | इससे यकृत ( लीवर ) व आँतों को बल मिलता है | शरीर को शुद्ध करने की प्रक्रिया बड़ी तेजी से होती है |

सावधानी :
१] पत्तागोभी की सब्जी अधिक मात्रा में खाने से गुर्दे (किडनी) के रोगियों को मुत्रावरोध होता है |
२] अधिक सेवन से पेट में भारीपन लगे तो भोजन के बाद थोड़ी – सी अजवायन व सौंफ खायें |
३] सब्जी बनाते समय हींग का छौंक लगाने से सेवन के बाद वायु की तकलीफ नहीं होती |


-           स्त्रोत – लोककल्याण सेतु – सितम्बर – २०१६ से   

Wednesday, September 7, 2016

डायबिटीज टेबलेट

यह गोली मधुमेह ( डायबिटीज ), पीलिया, यकृत के विकार, रक्ताल्पता, कैंसर तथा कुष्ठ आदि रोगों में लाभदायी है | यह कृमि व कफ का नाश करनेवाली, अरुचि, मंदाग्नि, मलावरोध व आंत्रविकारों को हरनेवाली, रक्तशोधक, शोथहर, ज्वरनाशक व पित्तशामक है |

ये आप अपने नजदीकी संत श्री आशारामजी आश्रम या समिति के सेवाकेंद्र से प्राप्त कर सकते है |



       स्रोत – ऋषिप्रसाद - सितम्बर २०१६ से      

दीपावली विद्यार्थी अनुष्ठान शिविर – ३० अक्टूबर से ५ नवम्बर २०१६

“विद्यार्थियों को गुरु-आश्रम में अनुष्ठान हेतु आने का जो अवसर मिलता है, यह बहुत भारी कल्याणकारी अवसर है |” – पूज्य बापूजी

अनुष्ठान के दौरान श्री वासुदेवानंदजी और साध्वी रेखा बहन के प्रवचनों का लाभ मिलेगा | अनुष्ठान शिविर में बच्चों के साथ बड़े भी लाभ ले सकते हैं |

सूचना : ‘बच्चों को अनुष्ठान हेतु अहमदाबाद नहीं लेकर जाना है’ – ऐसी बातें फैलानेवालों से भ्रमित न हों | आश्रम, समितियाँ, बाल संस्कार सेवाधारी व साधक अपने क्षेत्र के मंत्रदीक्षित विद्यार्थियों को इस सुअवसर का लाभ अवश्य दिलवायें |

सम्पर्क : बाल संस्कार विभाग, अहमदाबाद आश्रम, दूरभाष : (०७९) ३९८७७७४९ / ८८.

                                                                          स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से 

भोजन को औषधि बनाने की युक्ति

आप बीमार न हों तो अच्छा है लेकिन बीमार हों और कोई औषधि लें तो दायें हाथ में औषधि ले के २१ बार ‘ॐ नमो नारायणाय’ जपकर ही लें | और बायाँ स्वर चलता हो उस समय औषधि लेने से ज्यादा फायदा होता है | वृद्धों को तो ऐसा ख़ास करना चाहिए | 

हम तो चाहते हैं कि आप भोजन को भी औषधि बनाकर खाओ, जल भी पियो तो उसे औषध बनाकर पियो | भोजन करने या पानी पीने से पहले ‘ॐ नमो नारायणाय....’ २१ बार जपने से दोनों काम हो गये – भगवान की भक्ति की भक्ति हो गयी और औषधि भी बन गयी | भोजन दायाँ स्वर चलता हो तभी या उसे चालू करके करना चाहिए | इससे विशेष लाभ होता है |
                                                              
                                                                       स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से

स्वास्थ्यप्रद सरल घरेलू नुस्खे

उष्णता व पित्त का शमन आदि : कच्चे नारियल की गिरि के २ – ३ टुकड़ों के साथ १ – २ बताशे कुछ दिनों तक रोज खाने से चेहरे एवं त्वचा का रंग निखरता है, उष्णता एवं पित्त का शमन होता है और बाल घने व लम्बे होते हैं |

शरीर का भीतरी दाह : भिगोयी हुई द्राक्ष और मिश्री प्रात: काल खाने से लाभ होता है |

आँखों के आस-पास का कालापन : १ – १ चम्मच मुलतानी मिट्टी, खीरे का रस और आलू का रस मिलाकर आँखों के पास लेप करें |

स्वप्नदोष : १० ग्राम ग्वारपाठे का गुदा, १ ग्राम काली मिर्च का चूर्ण व सेंधा नमक मिला के शुद्ध देशी घी के साथ सेवन करने से लाभ होता है |

खुजली, घमौरियाँ : नारियल-तेल में नींबू का रस समभाग मिलाकर २ – ३ बार लगा देने से लाभ होगा तथा दुष्प्रभाव ( साइड इफेक्ट ) करनेवाली एलोपैथिक दवाइयाँ, ट्यूबों से बचेंगे |   


                                                                           स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

गुणों व खनिजों का खजाना : चौलाई

हरी सब्जियों में उच्च स्थान प्राप्त करनेवाली चौलाई एक श्रेष्ठ पथ्यकर तथा अनेक खनिजों का खजाना है | आयुर्वेद के ‘भावप्रकाश निघंटु’ के अनुसार यह हलकी, शीतल, रुक्ष, रुचिकारक, अग्निदीपक एवं मूत्र व मल को निकालनेवाली तथा पित्त, कफ, रक्तविकार व विष को दूर करनेवाली होती है |

चौलाई की मुख्य दो किस्में होती हैं – लाल और हरी | लाल चौलाई ज्यादा गुणकारी होती है |

चौलाई में कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, विटामिन ‘ए’ व ‘सी’ प्रचुर मात्रा में होते हैं | गर्भिणी तथा स्तनपान करानेवाली माताओं को इसका सेवन अवश्य करना चाहिए | इसमें रेशें होने के कारण यह आँतों में चिपके हुए मल को अलग करती हैं | पुराने कब्ज में भी लाभदायी है | चौलाई रक्त शुद्ध करनेवाली, अरुचि को दूर कर पाचनशक्ति को बढ़ानेवाली, त्वचा के विकार व गर्मी के रोगों में बहुत गुणकारी है |

यह नेत्रों के लिए हितकारी, मातृदुग्धवर्धक एवं रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर आदि स्त्रीरोगों में लाभकारी है | चौलाई की सब्जी खून की कमी, शीतपित्त, रक्तपित्त, बवासीर, पुराना बुखार, संग्रहणी, गठिया, उच्च रक्तचाप, ह्रदयरोगों तथा बाल गिरने आदि बीमारियों में भी लाभदायक है |

चौलाई की भाजी को केवल उबालकर या घी का बघार दे के तैयार करें |

औषधीय प्रयोग

१] शरीर की गर्मी व जलन : चौलाई के ५० मि.ली. रस में मिश्री मिलाकर पीने से खुजली और गर्मी दूर होती है | हाथ-पैर के तलवों व पेशाब की जलन में लाभ होता है |

२] रक्तपित्त : चौलाई का रस शहद के साथ सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त में लाभ होता है तथा नाक, गुदा आदि स्थानों से निकलनेवाला खून बंद हो जाता है |

३] नेत्ररोग : आँखों से कम दिखना, आँखे लाल हो जाना, जलन, रात्रि को न दिखाना आदि तकलीफों में चौलाई का रस ५०-६० मि.ली. प्रतिदिन दें अथवा चौलाई को सब्जी के रूप में उपयोग करें |

४] पित्त-विकृति : पित्त-विकृति में चौलाई की सब्जी खाते रहने से बहुत लाभ होता है |
                                                                                     
                                                                        स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

इन तिथियों का लाभ लेना न भूलें

२० सितम्बर : मंगलवारी चतुर्थी ( सूर्योदय से दोपहर ११- ५९ तक )

२५ सितम्बर : रविपुष्यामृत योग ( दोपहर २-३७ से २६ सितम्बर सूर्योदय तक )

२६ सितम्बर : इंदिरा एकादशी ( व्रत से बड़े – बड़े पापों का नाश हो जाता है | यह नीच योनियों में पड़े हुए पितरों को भी सद्गति देनेवाली है | इसका माहात्म्य पढ़ने-सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है | - पद्म पुराण )

२ अक्टूबर : पूज्य संत श्री अशारामजी बापू का ५३ वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवस

४ अक्टूबर : मंगलवारी चतुर्थी ( दोपहर १२-३५ से ५ अक्टूबर सूर्योदय तक )

११ अक्टूबर : विजयादशमी ( पूरा दिन शुभ मुहूर्त ) विजय मुहूर्त ( दोपहर २-२३ से ३-११ तक ) (संकल्प, शुभारम्भ, नूतन कार्य, सीमोल्लंघन के लिए ), (गुरु-पूजन, अस्त्र-शस्त्र-शमी वृक्ष-आयुध-वाहन पूजन )

१२ अक्टूबर : पापांकुशा एकादशी ( उपवास करने से कभी यम-यातना नहीं प्राप्त होती | यह पापों को हरनेवाला, स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्य, सुंदर स्त्री, धन एवं मित्र देनेवाला व्रत है | इसका उपवास और रात्रि में जागरण माता, पिता व स्त्री के पक्ष की दस – दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है | )


स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, पुष्टि, धन-धान्य देनेवाला : श्राद्ध-कर्म

(श्राद्ध पक्ष : १६ से ३० सितम्बर )
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ‘पितृ पक्ष’ या ‘महालय पक्ष’ बोलते हैं | आपका एक माह बीतता है तो पितृलोक का एक दिन होता है | साल में एक बार ही श्राद्ध करने से कुल-खानदान के पितरों को तृप्ति हो जाती है |


श्राद्ध क्यों करें ?

गरुड़ पुराण (१०.५७-५९) में आता है कि ‘समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दु:खी नहीं रहता | पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशुधन, सुख, धन और धान्य प्राप्त करता है |

‘हारीत स्मृति’ में लिखा है : 

न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुष: |
न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम ||

‘जिनके घर में श्राद्ध नहीं होता उनके कुल-खानदान में वीर पुत्र उत्पन्न नहीं होते, कोई निरोग नहीं रहता | लम्बी आयु नहीं होती और किसी तरह कल्याण नहीं प्राप्त होता ( किसी – न - किसी तरह की झंझट और खटपट बनी रहती है ) |’

महर्षि सुमन्तु ने कहा : “श्राद्ध जैसा कल्याण – मार्ग गृहस्थी के लिए और क्या हो सकता है ! अत: बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए |”

श्राद्ध पितृलोक में कैसे पहुँचता है ?

श्राद्ध के दिनों में मंत्र पढकर हाथ में तिल, अक्षत, जल लेकर संकल्प करते हैं तो मंत्र के प्रभाव से पितरों को तृप्ति होती है, उनका अंत:करण प्रसन्न होता है और कुल-खानदान में पवित्र आत्माएँ आती हैं |

‘यहाँ हमने अपने पिता का, पिता के पिता का और उनके कुल-गोत्र का नाम लेकर ब्राह्मण को खीर खिलायी, विधिवत भोजन कराया और वह ब्राह्मण भी दुराचारी, व्यसनी नहीं, सदाचारी है | बाबाजी ! हम श्राद्ध तो यहाँ करें तो पितृलोक में वह कैसे पहुँचेगा ?’

जैसे मनीऑर्डर करते हैं और सही पता लिखा होता है तो मनीऑर्डर पहुँचता है, ऐसे ही जिसका श्राद्ध करते हो उसका और उसके कुल-गोत्र का नाम लेकर तर्पण करते हो कि ‘आज हम इनके निमित्त श्राद्ध करते हैं’ तो उन तक पहुँचता है | देवताओं व पितरों के पास यह शक्ति होती है कि दूर होते हुए भी हमारे भाव और संकल्प स्वीकार करके वे तृप्त हो जाते हैं | मंत्र और सूर्य की किरणों के द्वारा तथा ईश्वर की नियति के अनुसार वह आंशिक सूक्ष्म भाग उनको पहुँचता है |

‘महाराज ! यहाँ खिलायें और वहाँ कैसे मिलता हैं ?’

भारत में रूपये जमा करा दें तो अमेरिका में डॉलर और इंग्लैंड में पाउंड होकर मिलते हैं | जब यह मानवीय सरकार, वेतन लेनेवाले ये कर्मचारी तुम्हारी मुद्रा ( करंसी ) बदल सकते हैं तो ईश्वर की प्रसन्नता के लिए जो प्रकृति काम करती है, वह ऐसी व्यवस्था कर दे तो इसमें ईश्वर व प्रकृति के लिए क्या बड़ी बात है ! आपको इस बात में संदेह नहीं करना चाहिए |

जैसी भावना वैसा फल

देव, पितर, ऋषि, मुनि आदि सभीमें भगवान की चेतना है | निष्काम भाव से उनको तृप्ति कराने से भगवान में प्रीति होगी | सकाम भाव से उनको तृप्ति कराने से कुल – खानदान में अच्छी आत्माएँ आयेंगी | भगवान में ५ हजार से भी अधिक वर्ष पहले कहा था “

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रता: |
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ||

‘देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले भक्त मूझको ही प्राप्त होते हैं | इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता |’ ( गीता : ९.२५ )

प्रतिमा, मंत्र, तीर्थ, देवता एवं गुरु में जिसकी जैसी बुद्धि, भावना होती है, उसे वैसा फल मिलता है | पितृलोक में जाने की इच्छा से पूजन करता है तो मरने के बाद पितृलोक में जायेगा लेकिन पितरों की भलाई के लिए निष्काम भाव से, कर्तव्यबुद्धि में, भगवान की प्रसन्नता के लिए करता है तो ह्रदय प्रसन्न होकर उसके ह्रदय में भगवदरस तो आयेगा, तडप बढ़ी तो साकार-निराकार का साक्षात्कार करने में भी सफल होगा |

बहुत-प्रेत की सदगति के लिए कुछ कर लें तो ठीक है लेकिन ‘बहुत-प्रेत मुझे यह दे दें’ ऐसी कामना की और उनके प्रति स्थायी श्रध्दा और चिंतन हो गया तो भूतानि यान्ति भूतेज्या....‘भूतों को पूजनेवाले ( मरने के बाद ) भूतों को प्राप्त होते हैं |’ ( गीता ल ९.२५ )

श्राद्ध फलित होने का आसान प्रयोग

स्वधा देवी पितरों को तृप्त करने में सक्षम है | तो उसी देवी के लिए यह मंत्र उच्चारण करना है | श्राद्ध करते समय यह मंत्र ३ बार बोलने से श्राद्ध फलित होता है :

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा |

जो जाने-अनजाने रह गये हों, जिनकी मृत्यु की तिथि का पता न हो, उनका भी श्राद्ध-तर्पण सर्वपित्री अमावस्या को होता है |

‘सामूहिक श्राद्ध’ का लाभ लें

सर्वपित्री दर्श अमावस्या ( ३० सितम्बर २०१६ ) के दिन विभिन्न स्थानों के संत श्री आशारामजी आश्रमों में ‘सामूहिक श्राद्ध’ का आयोजन होता है, जिसमें आप सहभागी हो सकते हैं | इस हेतु अपने नजदीकी आश्रम में २३ सितम्बर तक पंजीकरण करा लें | अधिक जानकारी हेतु पहले की अपने नजदीकी आश्रम से सम्पर्क कर लें | अगर खर्चे की परवाह न हो तो अपने घर में भी श्राद्ध करा सकते हैं |
                                                                                         
                                                                         स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से        

आराधना, उपवास और विश्रांति का सुवर्णकाल – नवरात्रि : १ से १० अक्टूबर

‘श्रीमद देवी भागवत’ के तीसरे स्कंध में महर्षि वेदव्यासजी जनमेजय को नवरात्रों का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं :  ६ – ६ मास में नवरात्रि आती है | शारदीय नवरात्र रावण-वध की तिथि के पहले आते हैं और दूसरे नवरात्र आते हैं वसंत ऋतू में रामजी के प्राकट्य के पहले | ये दोनों ऋतुएँ बड़ी क्रूर हैं | ये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं | इन दिनों में व्यक्ति अगर नवरात्रि का व्रत और उपवास नहीं करता तो वह आगे चल के बड़ी – बड़ी बीमारियों का शिकार हो सकता है अथवा अभी भी बीमारियों में वह भुन जायेगा | अगर नवरात्रि व्रत रखना है, भगवती की आराधना करता है तो आराधना की पुण्याई व प्रसन्नता से मनोरथ भी पुरे होते हैं और शरीर में जो विजातीय द्रव्य हैं, उपवास और विश्रांति उन रोगकारक द्रव्यों को भस्म कर देती है |

नवरात्रि के उपवास से शरीर के जीर्ण – शीर्ण रोग और लानेवाले कण ये सब नष्ट हो जाते हैं, पाप दूर होते हैं, मन प्रसन्न होता है, बुद्धि का औदार्य व तितिक्षा का गुण बढ़ता है और नारकीय योनियों से छुटकारा मिलता है | ९ दिन के नवरात्रि व्रत या उपवास नहीं रख सकते तो भैया ! ६ दिन, ५ दिन, नहीं तो अंतिम ३ दिन कड़क नियम पालन करते हुए उपवास रखें तो भी ९ दिन के नवरात्रि का फल प्राप्त कर सकते हैं |


स्रोत – ऋषिप्रसाद – सितम्बर २०१६ से