Search This Blog

Thursday, July 12, 2018

पुण्यदायी तिथियाँ




२३ जुलाई : देवशयनी एकादशी ( महान पुण्यमय, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदाता तथा पापनाशक व्रत| ), चतुर्मास व्रतारंभ



                                              

२७ जुलाई : गुरुपूर्णिमा, विद्यालाभ योग, खग्रास चन्द्रग्रहण






३१ जुलाई : मंगलवारी चतुर्थी (सुबह ८-४४ से १ अगस्त सूर्योदय तक )

८ अगस्त : कामिका एकादशी (व्रत व रात्रि-जागरण करनेवाला मनुष्य न तो कभी भयंकर यमराज का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है |)

१० अगस्त : गुरुपुष्यामृत योग (प्रात: ५-४४ से सूर्योदय तक )

१४ अगस्त: मंगलवारी चतुर्थी ( सूर्योदय से १५ अगस्त प्रात: ३-३० तक )

१७ अगस्त : विष्णुपदी संक्रांति (पुण्यकाल : सुबह ६-५२ से दोपहर १-१६ तक ) (विष्णुपदी संक्रांति में किये गये जप-ध्यान व पुण्यकर्म का फल लाख गुना होता है |- पद्म पुराण )

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से


ग्रहण की हानियों से बचकर कैसे उठायें करोड़ गुना लाभ ?


(खग्रास चन्द्रग्रहण : २७ जुलाई )

भूभाग में ग्रहण–समय : २७ जुलाई के रात्रि ११-५४ से २८ जुलाई प्रात: ३-५० तक ( पूरे भारत में दिखेगा, नियम पालनीय )

जानिये चन्द्रग्रहण – संबंधी महत्त्वपूर्ण बातें :

१] चन्द्रग्रहण में ग्रहण के तीन प्रहर ( ९ घंटे ) पूर्व से सूतक लगता है | सूतक व ग्रहण काल में भोजन नहीं करना चाहिए | बूढ़े, बालक और रोगी ग्रहण प्रारम्भ होने से डेढ़ प्रहर ( ४.५ घंटे ) पूर्व तक खा सकते हैं |

२] सूतक ( ग्रहण-वेध ) के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी-पत्ते डाल दियें जाते हैं, वे सूतक व ग्रहण काल में दूषित नहीं होते |

३] भगवान वेदव्यासजी कहते हैं : ‘सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (ध्यान, जप, दान आदि ) एक लाख गुना और गंगाजल पास में हो तो एक करोड़ गुना फलदायी होता है |’

४] ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा जो भगवन्नाम जपते हों उसका जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती हैं |

[विस्तृत जानकारी हेतु पढ़े आश्रम व समिति के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध पुस्तक ‘क्या करें, क्या न करें ?’ ]

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

व्यापार में वृद्धि हेतु ....


विवार को गंगाजल लेकर उसमें निहारते हुए २१ बार गुरुमंत्र जपें, गुरुमंत्र नहीं लिया हो तो गायत्री मंत्र जपें | फिर इस जल को व्यापार-स्थल पर जमीन एवं सभी दीवारों पर छिडक दें | ऐसा लगातार ७ रविवार करें, व्यापार में वृद्धि होगी |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

विघ्न-बाधाओं व पाप-ताप से रक्षा हेतु ....


पीपल का दर्शन, पूजन व स्पर्श बड़ा हितकारी है | व्यक्ति, कितना भी मुसीबतों और पापों से घिरा हुआ हो, ३ पीपल के पौधे या कलमें ले और ॐ अश्वत्थ वृक्षराजाय नम: |’  ऐसा १०८ बार जप करे एवं यह भावना करे कि  ‘हे पीपल देवता ! वृक्षों में राजा ! मैं आपको नमन करता हूँ |’ फिर हाथ से वे पौधे या कलमे ठीक जगह पर लगा दे | 

इससे उसके पाप-ताप कटेंगे, वह विघ्न-बाधाओं से बाहर आ जायेगा | यह तुम लोग कर सकते हो और दूसरों को भी प्रेरित कर सकते हो |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

पाचनशक्ति बढ़ाने हेतु ...


पाचनशक्ति बढ़ाने के लिए एक गिलास पानी में एक आँवले का रस व आधा चम्मच अदरक का रस मिलाकर  उसे धीमी आँच पर उबालें | पानी आधा शेष रहने पर ठंडा करके उसमें शहद व थोडा-सा सेंधा नमक मिला दें और धीरे-धीरे चुसकी लेकर पियें | इससे मंदाग्नि दूर हो जायेगी, भूख खुलकर लगेगी तथा स्फूर्ति व ताजगी का अनुभव होगा | 

अगर ताजा आँवला व अदरक न मिले तो २ ग्राम आँवला चूर्ण और १ ग्राम सोंठ चूर्ण का भी उपयोग कर सकते हैं |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

बवासीर की बीमारी है तो ....


कुछ लोग कम्बल (गर्म आसन) पर लम्बे समय तक बैठे रहते हैं, फिर उन्हें बवासीर की बीमारी होती है | पहले पता नही था तो हम भी गर्म आसन पर लम्बे समय तक बैठ जाते थे | जब गुरुदेव (साँई श्री लीलाशाहजी महाराज ) के चरणों में आये तो साँई ने बताया कि ‘२ नींबू निचोड़कर उनके बीच फेंक दो | एनिमा-यंत्र के द्वारा वह रस नीचे से ले लो फिर ५-१० मिनट गुदाद्वार का संकोचन करके रखो |’ यह प्रयोग किया तो बवासीर की बीमारी गायब हो गयी | 

इसलिए आपको भी बता देता हूँ, किसीको बवासीर है तो आसानी से इस प्रकार मिट जाती है |अति बैठने से उत्पन्न गर्मी बवासीर करती है |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

आँखों की अच्छी सेहत के लिए


क्या करें
१] प्रात: हरी दूब पर टहलना, सूर्य को अर्घ्य देना, रात्रि को चाँद की तरफ एकटक देखना आदि से आँखे स्वस्थ रहती हैं |
२] रात में अच्छी किस्म का सुरमा (संतकृपा सुरमा) लगाना अत्यंत लाभकारी है |
३] भोजनोंपरांत हाथ धोकर आँखों पर भीगे हाथ फेरना लाभदायी है |
४] पलकें झपकाते रहना आँखों की रक्षा का प्राकृतिक उपाय है |
(संतकृपा सुरमा आश्रम के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |)

क्या न करें
१] सिर पर गर्म पानी न डालें तथा आँखों को गर्म पानी से न धोयें |
२] अस्वच्छ हाथ या रुमाल आँखों पर न लगायें एवं दूसरों के चश्मे आदि का प्रयोग न करें |
३] किसी भी प्रकार की एकाएक चमक, धुम्रपान, मद्यपान तथा अन्य नशीले द्रव्यों का सेवन आँखों के लिए अत्यंत हानिकारक हैं |
४] बहुत कम या अत्यधिक रोशनी में पढ़ने या देखने के अन्य कार्य करने से आँखें दुर्बल हो जाती हैं |

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

उत्तम स्वास्थ्य हेतु कब व कितना पियें पानी ? (भाग-१)


हमारे शरीर का दो-तिहाई (२/३) हिस्सा पानी से बना हैं | जल का प्रमुख कार्य पाचन की विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल होना तथा शरीर की संरचना का निर्माण करना होता है | पानी पीने की मात्रा व शरीर के द्वारा पानी निष्कासित होने की मात्रा का संतुलन बना रहता है तो शरीर के सभी अंगो को समुचित रूप से जल मिलता रहता है | अति अथवा अत्यल्प मात्रा में तथा अनुचित ढंग से पानी पीने से स्वास्थ्य की हानि होती है |

कई लोग गलतफहमी के शिकार हैं कि रोज ५ लीटर से ज्यादा पानी पीना चाहिए | किंतु यह मात्रा आयु, स्थान, प्रकृति, कार्य, आहार आदि पर निर्भर होती है व तदनुसार कम या अधिक हो सकती है | अत: जैसे भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए वैसे प्यास लगने पर ही पानी पीना चाहिए |

अधिक जल-सेवन की हानियाँ
अधिक पानी पीने से आमदोष की वृद्धि होती है, जिससे मंदाग्नि होती है | मंदाग्नि से रसादि सप्तधातु विकृत होते हैं, जिससे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं | अति जल पीने के कारण तथा सुबह खाली पेट या रात्रि को सोते समय ठंडा जल पीने से आमदोष, मंदाग्नि व इनसे उत्पन्न होनेवाली अनेक बीमारियाँ घेर लेती हैं | आधुनिक शोधों के अनुसार भी अधिक मात्रा में जल का सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या बन सकता है, जिसे जल –विषाक्तता ( Water poisoning ) कहा जाता है |  

पर्याप्त मात्रा में पानी पियें
प्यास लगने पर भी जो लोग टालते रहते हैं, पानी नहीं पीते उन्हें मुखशोष, अंगों में शिथिलता (थकान), कम सुनाई देना, ज्ञान-ग्रहण शक्ति की कमी होना, चक्कर आना, ह्रदयरोग आदि दुष्परिणामों का सामना करना पड़ता है इसलिए प्यास लगने पर आवश्यक मात्रा में पानी पियें |

इन बीमारियों में पानी कम पियें
पर्याप्त मात्रा में पानी पीना शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है पर कुछ विपरीत शारीरिक अवस्थाओं में पानी कम पीना अनिवार्य होता है | आयुर्वेद के अनुसार मंदाग्नि, खून की कमी (anaemia), जलोदर (ascites), भूख की कमी, आँखों के रोग, मधुमेह (diabetes), त्वचा-विकार, सर्दी-जुकाम, बवासीर, संग्रहणी, सूजन – इन व्याधियों में अधिक पानी पीना हितकर नहीं हैं | वृक्क अकर्मण्यता (renal failure) में अत्यल्प पानी पीना चाहिए |  

भोजन के समय व बाद में पानी कब पियें ?
खाया हुआ अन्न पहले आमाशय में पहुँचता है | उचित समय पर उचित मात्रा में खाये गये अन्न को आमाशय में पाचकाग्नि प्रबल होकर सम्यक रूप से पचाती है | अगर भोजन करते समय अधिक मात्रा में या भोजन के तुरंत बाद पानी पी लिया जाय तो पाचकाग्नि मंद हो जाने से पाचनक्रिया मंद हो जाती है और आहार आम (कच्चा रस ) में रूपांतरित हो जाता है | अत: भोजन के डेढ़ से पौने दो घंटे बाद प्यास-अनुरूप पानी पीना हितावह है |

भोजन के पहले पानी पीने से व्यक्ति कृश होता है, मध्य में पीने से सम रहता है और अंत में पानी पीने से स्थूल होता है | भोजन के बीच में थोडा-थोडा गुनगुना पानी पीना जरूरी होता है |

आचार्य चाणक्य ने लिखा है :
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम ||
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम ||

अजीर्ण में (गुनगुना) पानी औषधि जैसा है | भोजन पूरा पचने के बाद ( शुद्ध डकार आना, उत्साह लगना, शरीर हलका लगना – ये आहार पचने के लक्षण हैं |) पानी पीना बलप्रद है | भोजन के बीच-बीच में जल पीना अमृत के समान है | भोजन के बाद जल पीना विष के समान है |’  (चाणक्यनितिदर्पण :८.७)

 ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

पुण्यात्मा, उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए


बृहस्पति, बुध, शुक्र, चन्द्र – ये शुभ ग्रह हैं | इनमें बृहस्पति तो अत्यंत शुभ ग्रह है | बृहस्पति जब बलवान होता है तब पुण्यात्मा पृथ्वी पर अवतरित होते हैं | बलवान बृहस्पति जिसकी जन्म-कुंडली में होता है, उसमें आध्यात्मिकता, ईमानदारी, अच्छाई, सच्चरित्रता, आदि गुण तथा विद्या व अन्य उत्तम विशेषताएँ होती हैं | इसलिए गर्भाधान ऐसे समय में होना चाहिए जिससे बच्चे का जन्म बलवान व उत्तम ग्रहों की स्थिति में हो |  

वर्तमान समय में दिनांक ३ अगस्त २०१८ से २५ जनवरी २०१९ तक का समय गर्भाधान के लिए उत्तम है | इसके अलावा २७ दिसम्बर २०१९ से १५ फरवरी २०२० तक का समय तो गर्भाधान के लिए अतिशय उत्तम है |

हान आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन उसके लिए संयमी पति-पत्नी की आवश्यकता होती है | अत: उत्तम सन्तान की इच्छावाले दम्पति गर्भाधान से पहले कम-से-कम २-३ माह का ब्रह्मचर्य –व्रत अवश्य रखें, साथ ही अधिकाधिक गुरुमंत्र का जप करें | हो सके तप पुरुष ४० दिन के और महिलाएँ २१ दिन के २ या ३ अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु सदगुरु या इष्टदेव से प्रार्थना करें, फिर गर्भाधान करें |

गर्भाधान के लिए अनुचित काल

पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि (जन्माष्टमी, श्रीराम नवमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि ), श्राद्ध के दिन, प्रदोषकाल (१. सूर्यास्त का समय, २. सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे बाद तक का समय ), क्षयतिथि एवं मासिक धर्म के प्रथम ५ दिन, माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, संध्या के समय एवं दिन में समागम या गर्भाधान करना सर्वथा निषिद्ध है | दिन के गर्भाधान से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है |

शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, नहीं तो आसुरी, कुसंस्कारी या विकलांग संतान पैदा होती है | संतान नही भी हुई तो भी दम्पति को कोई खतरनाक बीमारी हो जाती है |

गर्भाधान के पूर्व विशेष सावधानी
अपने शरीर व घर में धनात्मक ऊर्जा आये इसका तथा पावित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए | बहनों को मासिक धर्म में भोजन नहीं बनाना चाहिए | गर्भाधान घर के शयनकक्ष में ही हो, होटलों आदि ऐसी-वैसी जगहों पर न हो |

टिप्पणी : उत्तम समय के अलावा के समय में भी यदि गर्भाधान हो गया हो तो गर्भपात न करायें बल्कि गर्भस्थ शिशु में आदरपूर्वक उत्तम संस्कारों का सिंचन करें | गर्भपात महापाप है |

विशेष : उत्तम संतानप्राप्ति हेतु महिला उत्थान मंडल के ‘दिव्य शिशु संस्कार केन्द्रों’ का भी लाभ ले सकते हैं | ‘दिव्य शिशु संस्कार’ पुस्तक पढ़ें |
सम्पर्क : ९१५७३०६३१३ और (०७९) ३९८७७७३०

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

साधना में चार चाँद लगानेवाला अमृतकाल : चतुर्मास


( चतुर्मास : २३ जुलाई से १९ नवम्बर २०१८ तक )

चतुर्मास की बड़ी भारी महिमा है, इन बातों को जानकर इस अमृतकाल का लाभ उठाइये :

१] सद्धर्म, सत्संग-श्रवण, सत्पुरुषों की सेवा, संतो के दर्शन, भगवान का पूजन आदि सत्कर्मों में संलग्न रहना और सुपात्र हेतु दान देने में अनुराग होना – ये सब बातें चतुर्मास में अत्यंत कल्याणकारी बतायी गयी हैं |

२] इन दिनों भूमि पर (चटाई, कम्बल, चादर आदि बिछाकर) शयन, ब्रह्मचर्य-पालन, उपवास, मौन, ध्यान, जप, दान-पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं |

३] जल में आँवला मिलाकर स्नान करने से पुरुष तेजवान होता है और नित्य महान पुण्य प्राप्त होता है |

४] चतुर्मास में ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है | इन दिनों धातु के पात्रों का त्याग कर पलाश के पत्तों पर भोजन करनेवाला ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है, ऐसा शास्त्र में कहा गया है |

५] इन दिनों में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करें |

६] चतुर्मास में शादी-विवाह और सकाम यज्ञ नहीं होते | ये चार मास साधन-भजन करने के हैं |

७] पद्म पुराण में आता है कि जो व्यक्ति भगवान के शयन करने पर विशेषत: उनके नाम का कीर्तन और जप करता है,  उसे कोटि गुना फल मिलता है |

८] चतुर्मास में भगवान विष्णु के सामने खड़े होकर ‘पुरुष सूक्त’ का पाठ करने से बुद्धिशक्ति बढ़ती है |

अपना आध्यात्मिक खजाना बढायें

चतुर्मास की महिमा के बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है : “जैसे किसान बोवाई करके थोडा आराम करता हैं और खेत के धन का इंतजार करता है, ऐसे ही चतुर्मास में आध्यात्मिक धन को भरने की शुरुवात होती है | हो सके तो सावन के महीने में एक समय भोजन करें, जप बढ़ा दे | हो सके तो किसी पवित्र स्थान पर अनुष्ठान करने के लिए चला जाय अथवा अपने घर में ही पूजा कमरा बना दे | एक सुबह को नहा-धोकर ५ बजे पूजा-कमरे में चला जाय और दूसरी या तीसरी सुबह को निकले | मौन रहे, शरीर के अनुकूल फलाहर, अल्पाहार करे | अपना आध्यात्मिक खजाना बढाये | ‘आदर हो गया, अनादर हो गया, स्तुति हो गयी, निंदा हो गयी.... कोई बात नहीं, हम तो करोड़ काम छोड़कर प्रभु को पायेंगे |’ ऐसा दृढ़ निश्चय करे | बस, फिर तो प्रभु तुम्हारे ह्रदय में प्रकट होने का अवसर पैदा करेंगे |”

ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१८ से

Tuesday, June 12, 2018

औषधीय गुणों से युक्त : जामुन


औषधीय गुणों से युक्त जामुन का फल शीतल, रुक्ष तथा कफ-पित्तशामक होता है | इसमें लौह तत्त्व,औषधीय गुणों से युक्त जामुन का फल शीतल, रुक्ष तथा कफ-पित्तशामक होता है |इसमें लौह तत्त्व, फॉलिक एसिड, विटामिन ‘बी’ व ‘सी’  पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं | 
जामुन ह्रदय के लिए एवं रक्ताल्पता, पेशाब की जलन, अपच, दस्त, पेचिश, संग्रहणी, पथरी, रक्तपित्त, रक्तदोष आदि में लाभदायी है | मधुमेह (diabetes) के लिए यह वरदानस्वरुप माना जाता है |

जामुन की छाल, गुठलियों और पत्तों का भी औषधीय रूप में उपयोग किया उपयोग किया जाता है | इसके कोमल पत्तों का २० मि.ली. रस निकालकर उसमें थोड़ी मिश्री मिला के पीने से खूनी बवासीर में खून गिरना बंद होता है | प्रयोग के दौरान लाल मिर्च व खटाई का सेवन न करें |



जामुन का गुणकारी औषधीय पेय
अच्छे पके जामुनों के १ लीटर रस में १ कि.ग्रा. मिश्री मिलाकर उबालें | एक तार की चाशनी बन जाय तो छान के बोतल में भर लें | १० से २५ मि.ली. पेय को दस्त, संग्रहणी, उलटी, जी मिचलाना, गले की सूजन आदि तकलीफों में पानी के साथ तथा अत्यधिक मासिक स्त्राव, प्रमेह, सूजाक, खूनी बवासीर आदि में मक्खन के साथ लेने से उत्तम लाभ होता है |

गुठलियों के भी बेहतरीन लाभ
जामुन की गुठलियों के चूर्ण में ऐसे-ऐसे औषधीय गुण हैं जो उसके फल में भी नहीं हैं | जामुन की गुठलियों को सूखा के उनका चूर्ण बना लें अथवा यह तैयार चूर्ण आयुर्वेदिक औषधियों की दूकान पर भी मिलता है | यह विभिन्न रोगों में लाभदायी है :
१] स्वप्नदोष : २-३ ग्राम चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ लेने से स्वप्नदोष ठीक होता हैं |

२] श्वेतप्रदर:  २ ग्राम चूर्ण चावल की धोवन या चावल के पानी के साथ दिन में २ बार लेने से श्वेतप्रदर में लाभ होता है |

३] मधुमेह व बार-बार लगनेवाली प्यास : २-३ ग्राम चूर्ण पानी के साथ दिन में २-३ बार लेने से इन रोगों में लाभ होता है |

४] नींद में बिस्तर गीला करना (nocturnal enuresis): रात्रि को सोते समय १ ग्राम चूर्ण पानी के साथ देने से लाभ होता है |

५] दस्त:  ५-७ ग्राम चूर्ण को छाछ के साथ दिन में २ बार लेने से लाभ होता है |

सावधानियाँ : १] अधिक मात्रा में जामुन न खायें अन्यथा शरीर में जकड़ाहट तथा बुखार हो सकता है |
२] भोजन के पूर्व या खाली पेट जामुन खाने से वात की वृद्धि तथा अफरा होता है | अत:भोजन के पश्चात अन्न का पाचन हो जाने पर (भोजन के तुरंत बाद फल नहीं खाने चाहिए) नमक (यथासम्भव सेंधा नमक ) और काली मिर्च के चूर्ण के साथ इन्हें थोड़ी मात्रा में खाना चाहिए | इससे इनका वातवर्धक दोष कम हो जाता है |

लोककल्याण सेतु – जून २०१८ से

कोष्ठशुद्धि कल्प


ये गोलियाँ यकृत, गुर्दों, प्लीहा, जठर तथा आँतों को मलरहित बनाकर उनकी कार्यक्षमता बढ़ाती हैं | मंदाग्नि, संग्रहणी, पेचिश, बवासीर, उदरशूल, कब्ज, अफरा व त्वचा-विकारों में लाभदायी हैं | 


ये जठारग्निवर्धक, कृमिनाशक व कफशामक हैं अत: बालकों के लिए विशेष हितकर हैं |
    
लोककल्याण सेतु – जून २०१८ से