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Tuesday, January 28, 2020

पुण्यदायी तिथियाँ



२८ जनवरी : मंगलवारी चतुर्थी ( सुबह ८:२३ से २९ जनवरी सूर्योदय तक )

३० जनवरी : वसंत पंचमी ( इस दिन सारस्वत्य मंत्र का अधिक-से-अधिक जप करना चाहिए |)

१ फरवरी : अचला सप्तमी (प्रात: पुन्यस्नान, व्रत करके गुरु-पूजन करनेवाला सम्पूर्ण माघ मास के स्नान का फल व वर्षभर के रविवार व्रत का पुण्य पा लेता है | यह सम्पूर्ण पापों को हरनेवाली व सुख-सौभाग्य की वृद्धि करनेवाली है |)

५ फरवरी : जया एकादशी (व्रत से ब्रह्महत्यातुल्य पाप व पिशाचत्व का नाश होता है |)

७ फरवरी : माघ शुक्ल त्रयोदशी [इस दिन से माघी पूर्णिमा (९ फरवरी) तक प्रात: पुण्यस्नान तथा दान, व्रत आदि पुण्यकर्म करने से सम्पूर्ण माघ-स्नान का फल मिलता है | - पद्म पुराण ]





१३ फरवरी : विष्णुपदी संक्रांति (पुण्यकाल:सुबह ८-४१ से दोपहर ३-०५ तक )




१४ फरवरी : मातृ-पितृ पूजन दिवस



१९ फरवरी : विजया एकादशी (व्रत से इस लोक में विजयप्राप्ति होती है और परलोक भी अक्षय बना रहता है |)




२१ फरवरी : महाशिवरात्रि व्रत, रात्रि-जागरण, शिव-पूजन (निशीथकाल : रात्रि १२-२७ से १-१७ तक )





२३ फरवरी : द्वापर युगादि तिथि (स्नान, दान-पुण्य, जप, हवन से अनंत फल की प्राप्ति |)


१ मार्च       : रविवारी सप्तमी (दोपहर ११-१७ से २ मार्च सूर्योदय तक )

                                                                  ऋषिप्रसाद  और  लोककल्याण सेतु – जनवरी २०२० से

पौष्टिक सिंघाड़ा


सिंघाड़े मधुर, शीतल, वीर्यवर्धक, पित्तशामक तथा रक्त-विकार, जलन और सूजन को दूर करनेवाले, पचने में भारी तथा वात एवं कफ कारक हैं | ये विटामिन बी-१, बी-२, बी -९, सी तथा कैल्शियम, ताँबा, लौह तत्त्व, पोटैशियम, मैंगनीज आदि पोषक तत्त्वों के अच्छे स्त्रोत हैं | एंटी ऑक्सीडेट्स का समृद्ध स्त्रोत होने से सिंघाड़े उच्च रक्तचाप में एवं ह्रदय के लिए भी लाभकारी हैं |

सिंघाड़े के आटे से कई प्रकार के पौष्टिक व आरोग्यप्रद व्यंजन बनाये जाते हैं | आटा बनाने हेतु इसकी गिरी को निकालकर धूप में सुखा लें, फिर पिसवा लें | इसे उपवास में भी खा सकते हैं | पाचनशक्ति के अनुसार २०-३० ग्राम सिंघाड़े के आटे से बने हलवे का सेवन करने से श्वेतप्रदर व रक्तप्रदर में लाभ होता है, साथ ही शरीर भी पुष्ट होता है |

सिंघाड़े का हलवा

१०० ग्राम सिंघाड़े के आटे को घी में धीमी आँच पर सुनहरा होने तक भून लें | कढ़ाई को उतार के आटे को ठंडा होने दें | फिर इसमें १ कप गुनगुना दूध व स्वादानुसार मिश्री मिलाकर धीमी आँच पर पकायें | सिंघाड़े का यह हलवा लौह तत्त्व से भरपूर है | रक्ताल्पता एवं मासिक संबंधी रोगों में उपयोगी होने के साथ यह पौष्टिक और बलप्रद भी है |


सिंघाड़े की पुष्टिदायी गोलियाँ

सिंघाड़े के आटे को घी में सेंक लें | आटे के समभाग खजूर को मिक्सी में पीसकर आटे में मिला लें | अब इसे हलका-सा सेंककर बेर के आकार की गोलियाँ बना लें | २ – ४ गोलियाँ सुबह चूसकर खायें, थोड़ी देर बाद दूध पियें |

इससे अतिशीघ्रता से रक्त की वृद्धि होती है | उत्साह, प्रसन्नता व वर्ण में निखार आता है | गर्भिणी माताएँ गर्भावस्था के छठे महीने से यह प्रयोग शुरू करें | इससे गर्भ का पोषण व प्रसव के बाद मातृदुग्ध में वृद्धि होगी | माताएँ बालकों को हानिकारक चॉकलेटस की जगह ये पुष्टिदायी गोलियाँ खिलायें |

पुष्टिकारक खीर

सिंघाड़े का २ छोटे चम्मच आटा, १ चम्मच घी, ३०० मि.ली. दूध, १०० मि.ली. पानी, स्वादानुसार
मिश्री व थोड़ी इलायची लें | सिंघाड़े के आटे को घी डालकर धीमी आँच पर सुनहरा लाल होने तक भूल लें | फिर इसमें दूध तथा पानी डाल के पकायें | पकने पर मिश्री व थोड़ी इलायची डालें | यह स्वादिष्ट तथा पौष्टिक खीर रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, शुक्रधातु की दुर्बलता, रक्तपित्त (शरीर के किसी भी भाग से खून आना ) आदि समस्याओं में तथा गर्भिणी व प्रसूता माताओं के लिए लाभकारी है | इसके सेवन से वजन व बल की वृद्धि होती है | 

गर्भस्थापक व गर्भपोषक पाक

सिंघाडा सगर्भावस्था में अत्यधिक लाभकारी होता है | यह गर्भस्थापक अर्थात गर्भपात से रक्षा
करनेवाला तथा गर्भपोषक है | इसका नियमित और उचित मात्रा में सेवन गर्भस्थ शिशु को कुपोषण से बचाकर स्वस्थ व सुंदर बनाता है | यदि गर्भाशय की दुर्बलता या पित्त की अधिकता के कारण गर्भ न ठहरता हो, बार-बार गर्भस्त्राव या गर्भपात हो जाता हो तो सिंघाड़े के आटे से बने पाक का सेवन करें |

सामग्री : २०० -२०० ग्राम सिंघाड़े व गेहूँ का आटा, ४०० ग्राम देशी घी, १०० ग्राम पिसा हुआ खजूर, १०० ग्राम बबूल का पिसा हुआ गोंद, ४०० ग्राम पीसी मिश्री |

विधि : गोंद को घी में भून लें | फिर उसमें सिंघाड़े व गेहूँ का आटा मिलाकर धीमी आँच पर सेंकें | जब मंद सुगंध आने लगे तब पिसा हुआ खजूर व मिश्री मिला दें | पाक बनने पर थाली में फैलाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट के रख लें |

सेवन-विधि : २ टुकड़े (लगभग २० ग्राम ) सुबह-शाम खायें | ऊपर से दूध पी सकते हैं |

सावधानियाँ : सिंघाड़ा या उसके आटे का सेवन पाचनशक्ति के अनुसार करें | कफ प्रकृति के लोग इसका सेवन अल्प मात्रा में करें | कब्ज हो तो इसका सेवन न करें |

लोककल्याण सेतु – जनवरी २०२० से
              


Monday, January 13, 2020

अभीष्ट सिद्धि हेतु


भीष्माष्टमी (२ फरवरी) के दिन निम्न मंत्र से भीष्मजी को तिल, गंध, पुष्प, गंगाजल व कुश मिश्रित अर्घ्य देने से अभीष्ट सिद्ध होता है :

वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च |
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आबालब्रह्मचारिणे ||




  ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से        

लक्ष्मी कहाँ से चली जाती है ?


भगवान श्रीहरि कहते हैं : “जपो अल्पज्ञ भीगे पैर अथवा नग्न होकर सोता है तथा वाचाल की भाँति निरंतर बोलता रहता है, उसके घर से साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं |

जो व्यक्ति अपने सिर पर तेल लगाकर उसी हाथ से दूसरे के अंग का स्पर्श करता हैं * और अपने किसी अंग को बाजे की तरह बजाता है, उससे रुष्ट होकर लक्ष्मी उसके घर से चली जाती हैं | 

जो व्रत-उपवास नहीं करता, संध्या – वंदन नहीं करता, सदा अपवित्र रहता है तथा भगवदभक्ति से रहित है उसके यहाँ से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं |’ ( श्रीमद देवी भागवत : ९.४१.४२-४४ )

*पद्म पुराण के अनुसार मस्तक पर लगाने से बचे हुए तेल को अपने शरीर पर भी लगाना वर्जित है |

ऋषिप्रसाद- जनवरी २०२० से

क्या करें ....क्यां न करें


क्या करें
१] भोजन पचने में हलका व कम मात्रा में लें | जौ की रोटी या दलिया, ज्वार, कुलथी, सहजन, मेथी, करेला, पुनर्नवा, परवल, बथुआ, सोआ, कोमल बैंगन, लहसुन, अदरक, सोंठ, हींग, अजवायन, अरंडी का तेल आदि का सेवन हितकर है | गोमूत्र अथवा पानी मिलाकर गोमूत्र अर्क लेना लाभदायी है | पीने के लिए गुनगुने पानी का उपयोग करें |
२] १०० मि.ली, पानी में २ ग्राम सोंठ मिलाकर उसे इतना उबालें कि पानी केवल आधा शेष रहे | फिर इसे छानकर १५ से ३० मि.ली. अरंडी का तेल मिला के सूर्योदय के बाद पियें | यह प्रयोग हफ्ते में २-३ बार करें |
३] गठिया में उपवास अत्यंत हितकर है | सप्ताह में अथवा १५ दिन में एक दिन उपवास रखें | उस दिन केवल गुनगुना पानी पियें |
४] प्रतिदिन प्राणायाम करें |
५] स्पेशल मालिश तेल को गुनगुना करके उससे प्रभावित अंगों की मालिश करें | उसके बाद उन्हें १५-२० मिनट धूप से सेंक लें | फिर कम्बल से ढककर १५-२० मिनट धूप से सेंकें |
६] एक चुटकी रामबाण बूटी पानी से लें | अगर ज्यादा गर्मी है तो कम लें |

क्यां न करें
१] दही, छाछ, गुड़, तले हुए व उड़द से बने पदार्थ, अचार, पापड़, पनीर, फल, मिठाई, चावल, सुखा मेवा, आलू , मटर, टमाटर, नींबू, चना, राजमा, चौलाई, सेम, ग्वारफली, अरवी, टिंडा, मक्का, चिकने व भारी पदार्थ,  मैदे व दूध से बने पदार्थ एवं चाय-कॉफ़ी का सेवन न करें |
२] विरुद्ध आहार जैसे – नमक, खट्टे पदार्थ, फल, दालें, शाक, अदरक, लहसुन, तुलसी आदि का दूध के साथ सेवन न करें |
३] पूर्व में लिये हुए अन्न का पाचन होकर शरीर में हलकापन आने व खुल के भूख लगने से पहले फिर से अन्न ग्रहण न करें |
४] दिन में सोना, अनुचित समय पर भोजन, रात्रि-जागरण, खुली हवा में घूमना, फ्रिज का ठंडा पानी पीना, सतत पानी में काम करना, दलदलवाले स्थान पर तथा नमीयुक्त वातावरण में दीर्घकाल तक रहना व चिंता करना – इन कारणों से गठिया रोग उत्पन्न होता है | अत: इनसे बचें |
५] निवाड़ या रस्सी से बुने हुए खाट या पलंग पर न सोये |
६] लगातार बैठे रहना, गद्दों पर तथा ए. सी. , पंखा या कूलर की हवा में सोना, आरामप्रियता आदि का त्याग कर दें |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

पूज्य बापूजी द्वारा बताये गये गठिया रोग में अत्यंत लाभकारी प्रयोग


एलोपैथी की दवाई रोगों को दबाती है जबकि प्राणायम, आसन, उपवास आदि रोगों की जड़ को उखाड़कर फेंक देते हैं | इन उपायों से जो फायदा होता है वह एलोपैथी के कैप्सूल, इंजेक्शन आदि से नही होता है | वातरोग के ८० प्रकार हैं | उनमें से किसी भी प्रकार के वातरोग (गठिया आदि ) में ये उपाय लाभदायी हैं |

१] वायु मुद्रा : दोनों हाथों की अँगूठे के पासवाली प्रथम ऊँगली को मोड़कर अँगूठे से हलका-सा दबायें | शेष तीनों उंगलियाँ सीधी रहें | ५ -१० मिनट दिन में ४-५ बार यह मुद्रा करें |

२] प्राणायाम :

प्रयोग :१] वायु मुदा में बैठो | फिर बायाँ नथुना बंद ककरके दायें नथुने से खूब श्वास भरो फिर जहाँ पर वातरोग का प्रभाव हो- चाहे घुटने का दर्द हो, चाहे कमर का दर्द हो, चाहे कहीं भी दर्द हो- उस भाग को हिलाओ-डुलाओ |

भरे हुए श्वास को १ मिनट अंदर रोको और गुरुमंत्र या भगवन्नाम का मानसिक जप करो | फिर दायाँ नथुना बंद करके बायें नथुने से श्वास धीरे-धीरे निकाल दो | फिर ६५ सेकंड. ७० सेकंड.... इस प्रकार धीरे-धीरे कुछ दिनों के अंतराल में ५ – ५ सेकंड श्वास अंदर रोकना बढ़ाते जाओ | इस प्रकार ८०-१०० सेकंड श्वास भीतर रोको | ऐसे ८ से १० प्राणायाम करो तो दर्द में फायदा होता है (इससे किसीको गर्मी महसूस हो तो तथा ग्रीष्म ऋतू में ३ से ५ प्राणायाम करें ) | रक्त दाब (बी.पी.) अधिक हो तो श्वास कम समय रोकें |

प्रयोग -२] वायु मुद्रा में बैठकर दायें नथुने से श्वास लें , बायें से छोड़ें तथा बायें से लें, दायें से छोड़ें – ऐसा ८-१० बार करें | फिर दोनों नथुनों से गहरा श्वास भरें | अब गुदा को सिकोड़ लें व पेट को अंदर खींचे ( ये क्रमश: मूलबंध व उड्डियान बंध हुए ), फिर इस मंत्र का मानसिक जप करें – “नासै रोग हरै सब पीरा | जपत निरंतर हनुमत बीरा ||” ६० से ९० सेकंड श्वास अंदर रोकें और फिर धीरे-धीरे छोड़ दें | २ – ४ – ५ श्वास स्वाभाविक लें फिर पूरा श्वास बाहर निकाल के ५० से ८० सेकंड बाहर ही रोके रहें | मन में जप चलता रहे, मुद्रा यही बनी रहे | फिर श्वास ले लें | गठिया हो या कैसी भी वायु-संबंधी बीमारी होगी वह ऐसे भागेगी जैसे सूर्य के आने से रात्रि भाग जाती है |  ( यह प्राणायाम ५ से १० बार करें |)

प्रयोग के दिनों में १ – २ काली मिर्च, ७ तुलसी-पत्ते और १ चम्मच पिघला हुआ देशी गाय का घी सुबह खाली पेट लें |

(ध्यान दें : उपरोक्त दो में से कोई एक ही प्रयोग करें व लगातार करें, बीच में बदलें नहीं | )

सावधानी : प्राणायाम के २५-३० मिनट बाद ही किसी आहार अथवा पेय पदार्थ का सेवन करें | प्राणायाम का अभ्यास खाली पेट ही करे अथवा भोजन के ३ – ४ घंटे के बाद करें |

३] लहसुन प्रयोग : लहसुन की एक कली के ३ टुकड़े कर लें | सुबह खाली पेट एक टुकड़ा मुँह में डाल के थोडा-सादबा दिया और पानी का घूँट पी लिया | फिर दूसरा टुकड़ा भी ऐसे ही ले लिया और तीसरा अपने ऊपर से उतारकर फेक दिया | और ‘मैं ठीक हो रहा हूँ’ यह भावना करें | ऐसा ८ दिन तक करें और ९ वें दिन तीनों टुकड़े एक-एक करके खा लें | गठियावात हो, उसका बाप हो, भांजा हो, चाचा हो – सब भाग जायेंगे बोरिया-बिस्तर बाँधकर ! (लहसुन लेने के बाद १ घंटे तक कुछ भी खायें – पियें नहीं |)

अगर मंत्रदीक्षा ली है तो उसमें दियें हुए स्वास्थ्य मंत्र की १-२ माला जपे और यह प्रयोग करें तो इस रोग में और भी फायदा होता है |

४] बीजमंत्रसहित प्रयोग : ३ बिल्वपत्र के साथ १-२ काली मिर्च खरल में रगड़ के या चबाकर खा लें | इससे वायु-प्रकोप में आराम मिलता है | महाशिवरात्रि ( २१ फरवरी) की रात को वायु मुद्रा में बैठकर ‘ॐ बं बं ....’ – इस प्रकार ‘बं’ बीजमंत्र का सवा लाख जप करें | गठिया, गठिया का बाप भाग जायेगा एक ही रात में |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

इन खाद्य पदार्थों को भिगोकर पा सकते हैं अधिक पौष्टिकता


       
अंजीर : अंजीर एक पौष्टिक फल है | यह तृप्तिकर, वजन बढाने में लाभदायी, पचने में भारी, वात-पित्तशामक, जलन कम करनेवाला तथा रक्तवर्धक है |

  v २ सूखे अंजीर पानी में रात को भिगोकर सुबह तथा सुबह भिगो के शाम को खाने से पुरानी खाँसी, दमा, टी.बी., रक्तपित्त, पुराना गठिया, बवासीर व पित्तजन्य त्वचा-विकारों में लाभ होता है |

प्रतिदिन २ से ४ अंजीर खाये जा सकते हैं | ज्यादा मात्रा में खाने पर सर्दी, कफ एवं मंदाग्नि हो सकती है | सूखे अंजीरों को सेवन से पूर्व १-२ घंटे पानी में भिगो के रखना चाहिए |

मूँगफली : भिगोयी हुई मूँगफली पचने में आसान होती है | इसके सेवन से स्मरणशक्ति का विकास होता है | यह आमाशय, फेफड़ों तथा हड्डियों को मजबूती प्रदान करती है |

v रात हो भिगोयी हुई  मूँगफली को सुबह थोड़े गुड़ के साथ खूब चबाकर सेवन करें |

भोजन के बाद अथवा साथ में मूँगफली नहीं खानी चाहिए | भोजन और मूँगफली खाने के बीच ३ - ४ घंटे का अंतर होना चाहिए तभी मूँगफली पौष्टिक सिद्ध होती है |

खड़े मूँग : ये कफ-पित्तशामक थोड़े वायुकारक तथा नेत्रों के लिए हितकर व ज्वरनाशक होते हैं | अन्य दालों की अपेक्षा मूँग की दाल अधिक सुपाच्य होती है | इसमें प्रोटीन, रेशे और विटामिन बी आदि तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पायें जाते हैं | इसका नियमित सेवन उच्च रक्तचाप व कब्ज के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद है | मूँग का उपयोग करने से पहले कुछ घंटे भिगोकर रखना लाभकारी है |

गेहूँ : एक मुट्ठी गेहूँ एक गिलास पानी में रात को भिगो दें | सुबह उन्हें पीसकर उबलते हुए पानी में डाल के उसमें मिश्री, इलायची, १-२ काली मिर्च मिलायें तथा कलछी से सतत चलाते हुए पकायें | फिर उसमें दूध डाल के सेवन करें | 

कुछ दिनों तक यह प्रयोग करने से स्वप्नदोष, वीर्यपात, पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना आदि में लाभ होता है तथा शरीर की अत्यधिक उष्णता भी कम होती है |


ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

सूर्य का पूजन और अर्घ्य क्यों ? – भाग -१


सुर्यापासना का शास्त्रों में विस्तृत वर्णन है | ऋग्वेद (मंडल १, सूक्त ११५, मंत्र १) में आता है :

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च |

सारे जगत का आत्मा सूर्य है | सूर्य की उपासना करनेवाले को दुःख, दरिद्रता, गरीबी, दीनता-हीनता छू नहीं सकते | शीघ्र ही बुद्धि का विकास, रोग-दोष का शमन यह साफल्य प्राप्त होता है |

रोज प्रात:काल में सूर्योदय से पहले स्नानादि करके खुले मैदान में अथवा घर की छत पर जहाँ सूर्य का प्रकाश ठीक से आता हो वहाँ नाभि का भाग खुला करके सूर्यदेव के सामने खड़े होकर (अथवा आसन आदि पर बैठ के ) उन्हें प्रणाम करो और आँखे बंद करके चिंतन करो कि ‘जो सूर्य का आत्मा है वही मेरा आत्मा है | तत्त्वरूप से दोनों की शक्ति समान है |’ फिर आँखें खोलकर नाभि पर सूर्य के नीलवर्ण का आवाहन करो और ये मंत्र बोलो :

ॐ सूर्याय नम: | ॐ मित्राय नम: | ॐ रवये नम: | ॐ भानवे नम: | ॐ खगाय नम: | ॐ पूष्णे नम: | ॐ हिरण्यगर्भाय नम: | ॐ मरीचये नम: | ॐ आदित्याय नम: | ॐ सवित्रे नम: | ॐ अर्काय नम: | ॐ भास्कराय नम: | ॐ श्रीसवितृसुर्यनारायणाय नम: |

सूर्य – पूजा के लाभ

सूर्योपासना से स्मरणशक्ति, निर्णयशक्ति व पाचनशक्ति विकसित होती हैं | सर्दी, खाँसी, दमा जैसे रोग वायु और कफ के कारण हों तो दूर होते हैं | शीत प्रक्रुतिवालों को सदैव सूर्य-पूजा करनी चाहिए | 
मासिक स्त्राव के दिनों में तथा सगर्भावस्था में महिलाएँ सूर्य-पूजा न करें | गर्मियों में ८ बजे तक और अन्य ऋतुओ में ९ बजे तक पूजा कर लेनी चाहिए | वर्षा ऋतू में जब सूर्य निकले तब सूर्य-पूजा कर सकते हैं |”

सूर्य –अर्घ्य की विधि व उसके लाभ

सूर्य बुद्धिशक्ति के स्वामी हैं | सूर्य को मंत्रोच्चारण के साथ अर्घ्य देने से बुद्धि तीव्र बनती है तथा परावर्तित सूर्यकिरणें, हमारी श्रद्धा, मंत्र के सामर्थ्य और सूर्यदेव की कृपा – इन सबका लाभ भी मिलता है | भगवान् सूर्य प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन-धान्य, तेज वीर्य, यश-कीर्ति आदि प्रदान करते हैं |

सूर्य को नहा-धोकर अर्घ्य देना चाहिए | सूर्योदय के समय ताँबे के पात्र में जल लेकर उसमें यथासम्भव लाल फूल, लाल चंदन, चावल, कुमकुम आदि डाल के सूर्यनारायण को अर्घ्य दे | जहाँ अर्घ्य का जल गिरे वहाँ की गीली मिट्टी का तिलक करे | फिर आँखें बंद करके मन-ही-मन सूर्यनारायण को देखे और गुरुमंत्र अथवा तो बीजसंयुक्त सुर्यमंत्र – ‘ॐ ह्रां ह्रीं स: सूर्याय नम: |’ का जप करे तो बुद्धि सात्त्विक, विकसित होती है और निर्भीकता का लाभ होता है |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

यदि पुण्यात्मा, उत्तम संतान चाहते हैं तो....


महान आत्माएँ धरती पर आना चाहती हैं लेकिन उसके लिए संयमी पति-पत्नी की आवश्यकता होती है | अत: उत्तम संतान की इच्छावाले दम्पति गर्भाधान से पहले अधिक-से-अधिक ब्रह्मचर्य का पालन करें व गुरुमंत्र का जप करें | अनुष्ठान करके उत्तम संतान हेतु सद्गुरु या इष्टदेव से प्रार्थना करें, फिर गर्भाधान करें | वर्तमान समय में २७ दिसम्बर २०१९ से १५ फरवरी २०२० तक का समय तो गर्भाधान के लिए अतिशय उत्तम है |

गर्भाधान के लिए अनुचित काल
पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि (जन्माष्टमी, श्रीरामनवमी, होली, दिवाली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि), श्राद्ध के दिन, प्रदोषकाल ( १. सूर्यास्त का समय, २. सूर्यास्त से लेकर ढाई घंटे बाद तक का समय ), क्षयतिथि एवं मासिक धर्म के प्रथम ५ दिन, माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, संध्या के समय एवं दिन में समागम या गर्भाधान करना भयंकर हानिकारक है | दिन के गर्भाधान से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है |

शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, नहीं तो आसुरी, कुसंस्कारी या विकलांग संतान पैदा होती है | संतान नहीं भी हुई तो भी दम्पति को कोई खतरनाक बीमारी हो जाती है |

गर्भाधान के पूर्व विशेष सावधानी

अपने शरीर व घर में धनात्मक ऊर्जा आये इसका तथा पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए | महिलाओं को मासिक धर्म में भोजन नहीं बनाना चाहिए तथा अपने हाथ का भोजन परिवारवालों को देकर उनका ओज, बल और बुद्धि क्षीण करने की गलती कदापि नहीं करनी चाहिए |

गर्भाधान घर के शयनकक्ष में ही हो, होटलों आदि ऐसी-वैसी जगहों पर न हो |

ध्यान दें : उत्तम समय के अलावा के समय में भी यदि गर्भाधान हो गया हो तो गर्भपात न करायें बल्कि गर्भस्थ शिशु में आदरपूर्वक उत्तम संस्कारों का सिंचन करें | गर्भपात महापाप है |

विशेष : १] उत्तम संतानप्राप्ति हेतु महिला उत्थान मंडल के ‘दिव्य शिशु संस्कार केन्द्रों’ का भी लाभ ले सकते हैं |  सम्पर्क : ९१५७३०६३१३  
२] उत्तम संतानप्राप्ति में सहायक विस्तृत जानकारी हेतु पढ़े आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध पुस्तक ‘दिव्य शिशु संस्कार’ | सम्पर्क : (०७९) ६१२१०७३०

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

अद्भुत प्रभाव-सम्पन्न संतान की प्राप्ति करानेवाला व्रत : पयोव्रत


(पयोव्रत : २४ फरवरी से ६ मार्च )
अद्भुत प्रभाव-सम्पन्न संतान की प्राप्ति की इच्छा रखनेवाले स्त्री-पुरुषों के लिए शास्त्रों में पयोव्रत करने का विधान है | यह भगवान को संतुष्ट करनेवाला है इसलिए इसका नाम ‘सर्वयज्ञ’ और ‘सर्वव्रत’ भी है | यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में किया जाता है | इसमें केवल दूध पीकर रहना होता है |

व्रतधारी व्रत के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करें, धरती पर दरी या कम्बल बिछाकर शयन करे अथवा गद्दा-तकिया हटा के सादे पलंग पर शयन करे और तीनों समय स्नान करे | झूठ न बोले एवं भोगों का त्याग कर दे | किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाये | सत्संग-श्रवण, भजन-कीर्तन, स्तुति-पाठ तथा अधिक-से-अधिक गुरुमंत्र या भगवन्नाम का जप करे | भक्तिभाव से सद्गुरुदेव को सर्वव्यापक परमात्मस्वरूप जानकर उनकी पूजा करे और स्तुति करे : ‘प्रभो! आप सर्वशक्तिमान हैं | समस्त प्राणी आपमें और आप समस्त प्राणियों में निवास करते हैं | आप अव्यक्त और परम सूक्ष्म हैं | आप सबके साक्षी हैं | आपको मेरा नमस्कार है |’

व्रत के एक दिन पूर्व (२३ फरवरी) से समाप्ति (६ मार्च) तक करने योग्य :

१] द्वादशाक्षर मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |) से भगवान या सद्गुरु का पूजन करें तथा इस मंत्र की एक माला जपें |

२] यदि सामर्थ्य हो तो दूध में पकाये हुए तथा घी और गुड़ मिले हुए चावल का नैवेद्य अर्पण करें और उसीका देशी गौ-गोबर के कंडे जलाकर द्वादशाक्षर मंत्र से हवन करें | (नैवेद्य हेतु दूध के साथ गुड का अल्प मात्रा में उपयोग करें |) नैवेद्य को भक्तों में थोड़ा –थोड़ा बाँट दें |

३] सम्भव हो तो दो निर्व्यसनी, सात्त्विक ब्राह्मणों को खीर का भोजन करायें |

४] अमावस्या के दिन (२३ फरवरी को ) खीर का भोजन करें |

५] २४ फरवरी को निम्नलिखित संकल्प करें तथा ६ मार्च तक केवल दूध पीकर रहें |

संकल्प :
मम सकलगुणगणवरिष्ठमहत्त्व-सम्पन्नायुष्मत्पुत्रप्राप्तिकामनया
विष्णुप्रीतये पयोव्रतमहं करिष्ये |  

व्रत-समाप्ति के अगले दिन (७ मार्च को ) सात्त्विक ब्राह्मण को तथा अतिथियों को अपने सामर्थ्य-अनुसार शुद्ध, सात्त्विक भोजन करना चाहिए | दीन, अंधे और असमर्थ लोगों को भी अन्न आदि से संतुष्ट करना चाहिए | जब सब लोग खा चुके हों तब उन सबके सत्कार को भगवान की प्रसन्नता का साधन समझते हुए अपने भाई-बंधुओं के साथ स्वयं भोजन करें |

इस प्रकार विधिपूर्वक यह व्रत करने से भगवान प्रसन्न होकर व्रत करनेवाले की अभिलाषा पूर्ण करते हैं |

टिप – ब्राह्मण-भोजन के लिए बिना गुड़-मिश्रित खीर बनायें एवं एकादशी (६ मार्च) के दिन खीर चावल की न बनायें अपितु मोरधन, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा आदि उपवास में खायी जानेवाली चीजें डालकर बनायें |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से

निरापद पद की प्राप्ति में सहायक व्रत


(षट्तिला एकादशी : २० जनवरी )
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा : “देव ! माघ (गुजरात-महाराष्ट्र के अनुसार पौष) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का माहात्म्य मैं जानना चाहता हूँ |”

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं : “यह एकादशी ‘षट्तिला’ के नाम से विख्यात है | पुलस्त्य ऋषि ने दाल्भ्य ऋषि से इसके माहात्म्य का वर्णन किया था | इस एकादशी का व्रत पापों का शमन  करता है | जीव को निरापद पद की प्राप्ति के लिए षट्तिला एकादशी का व्रत करना चाहिए, सर्वव्यापक भगवान हरि का पूजन करना चाहिए | काम=क्रोध आदि से लिप्त नीच कर्मों और अति भाषण का त्याग करके मौन का अवलम्बन लेना चाहिए और भगवत्सुमिरन बढ़ाकर भगवदरस लेते हुए रात्रि का जागरण करना चाहिए | (रात्रि में १२ बजे तक का जागरण ) ”

इस दिन तिलों का ६ जगह उपयोग कर लेना चाहिए –

१] तिल, आँवला आदि मिलाकर बना उबटन लगाना |

२] जल में तिल डालकर स्नान करना |

३] पीनेवाले जल में तिल डाल के पानी पीना |

४] भोजन में तिल का उपयोग करना |

५] तिल का दान करना और

६] हवन-यज्ञ में तिल का उपयोग करना |

तिल हितकारी हैं परन्तु रात्रि में तिल-मिश्रित पदार्थ का सेवन हानि करता है | दही और तिल रात्रि को नहीं खाने चाहिए | जो षट्तिला एकादशी का उपवास करते हैं वे भी तिल-शक्कर की चिक्की अथवा लड्डू खा सकते हैं |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से