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Sunday, February 9, 2020

पुण्यदायी तिथियाँ



६ मार्च : आमलकी एकादशी (व्रत करके आँवले के वृक्ष के पास रात्रि – जागरण, उसकी १०८ या 
२८ परिक्रमा करनेवाला सब पापों से छूट जाता है और १००० गोदान का फल प्राप्त करता है |)

९ मार्च : होलिका दहन (रात्रि – जागरण, जप, मौन और ध्यान बहुत ही फलदायी होता है |)

१४ मार्च : षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल: दोपहर ११:५५ से शाम ६:१९ तक) (ध्यान, जप व पुण्यकर्म का फल ८६,००० गुना होता है | - पद्म पुराण )

१५ मार्च : रविवारी सप्तमी ( सूर्योदय से १६ मार्च प्रात: ३:२० तक )


१६ मार्च : भगवत्पाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज का प्राकट्य दिवस

२० मार्च : पापमोचनी एकादशी (व्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जाता है |)


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से  

परमात्मा से एकाकारता के लिए


दुःखों में अप्रभावित रहने के लिए आकाश की तरफ देखें, भगवन्नाम – जप का रोज थोड़ा – थोड़ा अभ्यास करें | इससे मन व्यापक हो जायेगा, दुःख का प्रभाव नहीं पड़ेगा | 

ऐसे ही सुख का प्रभाव भी कम पड़ेगा तो आप सुख और दुःख के सिर पर पैर रख के परमात्मा के साथ एकाकार होने में सफल हो जाओगे | - पूज्य बापूजी


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

कार्य में विजयप्राप्ति हेतु


कार्य में विजयप्राप्ति हेतु नियमितरूप से संध्या के समय पीपल के नीचे मिट्टी का घी से भरा दीपक लगाने तथा कुछ देर गुरुमंत्र या भगवन्नाम का जप करके थोड़ी देर शांत बैठने से अभीष्ट सिद्धि होती है | (दीपक ६ घंटे पानी में भिगोकर रखें, फिर उपयोग करें ताकि घी न सोखें |)

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

लक्ष्मी की चाहवाले किनसे बचें ?


भगवान श्रीहरि कहते हैं : “जो अशुद्ध ह्रदयवाला, क्रूर, हिंसक, दूसरों की निंदा करनेवाला होता है, उसके घर से भगवती लक्ष्मी चली जाती हैं |

जो नखों से निष्प्रयोजन तिनका तोड़ता है अथवा नखों से भूमि को कुरेदता रहता है उसके घर से मेरी प्रिय लक्ष्मी चली जाती हैं |

जो सूर्योदय के समय भोजन, दिन में शयन तथा दिन में मैथुन करता है उसके यहाँ से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं |”          (श्रीमद् देवी भागवत )


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

धन – सम्पदा के स्थायी निवास हेतु


‘ॐ ह्रीं गौर्यै नम: |’ 

– इस मंत्र से ७ बार अभिमंत्रित करके अन्न का भोजन करनेवाले के पास सदा श्री ( धन – सम्पदा ) बनी रहती है |  
(अग्नि पुराण :३१३.१९,२४ )


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

स्वास्थ्यरक्षक व पुष्टिवर्धक – गाजर


ग्राही गृज्जनकस्तीक्ष्णो वातश्लेष्मार्शसां हित: |
(चरक संहिता, सूत्रस्थान : २७.१७४)

गाजर स्वाद में मधुर, कसैली तथा स्निग्ध, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मल को बाँधनेवाली, मूत्रल, ह्रदय – हितकर, रक्तशुद्धिकर, वातदोषनाशक, कफ निकालनेवाली, पुष्टिवर्धक, बवासीरवालों के लिए हितकारी तथा दिमाग एवं नस – नाड़ियों के लिए बलप्रद है |

गाजर के विभिन्न लाभ

१)    विटामिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में होने से यह नेत्रज्योतिवर्धक है | दृष्टिमंदता, रतौंधी, पढ़ते समय आँखों में तकलीफ होना आदि रोगों में कच्ची गाजर या उसके रस का सेवन लाभप्रद है | यह प्रयोग चश्मे का नम्बर घटा सकता है |

२)    गाजर को खूब चबाकर खाने से दाँत मजबूत, स्वच्छ एवं चमकदार होते हैं तथा मसूड़े मजबूत बनते हैं |

३)    गाजर के रस का नित्य सेवन करने से दिमागी कमजोरी दूर होती है | गाजर का हलवा भी मस्तिष्क को पुष्ट करता है |

४)    गाजर का रस पीने से पेशाब खुलकर आता है, रक्तशर्करा भी कम होती है | इसमें लौह तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है |

५)    यह कफ व वात के रोगियों के लिए हितकारी है | कफशामक होने से यह वसंत ऋतू ( १९ फरवरी से १८ अप्रैल ) में विशेष लाभकारी है |

सावधानीयाँ : तीक्ष्ण, उष्णवीर्य होने के कारण पित्त प्रकृति के लोग गाजर का सेवन कम करें | गाजर को भीतर का पीला भाग निकालकर खाना चाहिए क्योंकि वह अत्यधिक गर्म प्रकृति का होने से पित्तदोष, वीर्यदोष एवं छाती में जलन उत्पन्न करता है |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

१९ फरवरी से १८ अप्रैल तक क्या करें


१९ फरवरी से १८ अप्रैल तक क्या करें 

१] कड़वे, तीखे, कसैले, शीघ्र पचनेवाले, रुक्ष (चिकनाईरहित) व उष्ण पदार्थों का सेवन करें | (अष्टांगह्रदय, योगरत्नाकर )

२] पुराने जौ तथा गेहूँ की रोटी, मूँग, साठी चावल, करेला, लहसुन, अदरक, सूरन, कच्ची मूली, लौकी, तोरई, बैंगन, सोंठ, काली मिर्च, पीपर, अजवायन, राई, हींग, मेथी, गिलोय, हरड, बहेड़ा, आँवला आदि का सेवन हितकारी है |

३] सूर्योदय से पूर्व उठकर प्रात:कालीन वायु का सेवन, प्राणायाम, योगासन - व्यायाम, मालिश, उबटन से स्नान तथा जलनेति करें |

४] अंगारों पर थोड़ी-सी अजवायन डालकर उसके धूएँ का सेवन करने से सर्दी, जुकाम, कफजन्य सिरदर्द आदि में लाभ होता है |

५] २ से ३ ग्राम हरड चूर्ण में समभाग शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लेने से रसायन के लाभ प्राप्त होते हैं |


१९ फरवरी से १८ अप्रैल तक क्या न करें

१] खट्टे, मधुर, खारे, स्निग्ध (घी – तेल से बने), देर से पचनेवाले व शीतल पदार्थो का सेवन हितकर नहीं है, अत: इनका सेवन अधिक न करें | (अष्टांगह्रदय, चरक संहिता )

२] नया गेहूँ व चावल, खट्टे फल, आलू, उड़द की दाल, कमल – ककड़ी, अरवी, पनीर, पिस्ता, काजू, शरीफा, नारंगी, दही, गन्ना, नया गुड़, भैस का दूध, सिंघाड़े, कटहल आदि का सेवन अहितकर है |

३] दिन में सोना, ओस में सोना, रात्रि – जागरण, परिश्रम न करना हानिकारक है | अति परिश्रम या अति व्यायाम भी न करें |

४] आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स व फ्रिज के ठंडे पानी का सेवन न करें |

५] एक साथ लम्बे समय तक बैठे या सोयें नहीं तथा अधिक देर तक व ठंडे पानी से स्नान न करें |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से


घुटनों के दर्द हो तो


मेथी घुटनों के दर्द को मिटाती है और खजूर शक्ति देता है | 

२ – २ करेले और बैंगन हफ्ते में दोनों एक – एक बार खायें | - पूज्य बापूजी


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

कफ – शमन हेतु विशेष


खाँसी, सर्दी – कफ होने पर अंग्रेजी गोलियाँ लेकर जो कफ मिटाते हैं उनका कफ सूख जाता है | फिर उसके बारीक कण इकट्टे हो जाते हैं, जो नाड़ियों में अवरोध (blockage), ह्रदयाघात (heart attack), ब्रेन ट्यूमर, कमर या शरीर के अन्य किसी भाग का ट्यूमर आदि का कारण बनता है | यह भविष्य में टी. बी., दमा, कैंसर जैसे गम्भीर रोग भी उत्पन्न कर सकता है | सर्दी मिटाने के लिए ली जानेवाली अंग्रेजी गोली भविष्य में भयंकर बीमारियों को जन्म देती है तथा असहनीय पीड़ाएँ पैदा करती है | भूलकर भी बच्चों को इन गोलियों के गुलाम मत बनाओ, न स्वयं बनो |

यौगिक प्रयोग : सूर्यभेदी प्राणायाम

कफ मिटाना हो तो दायें नथुने से श्वास लेकर रोकें और ‘रं... रं... रं... रं...’ इस प्रकार मन में जप करें और ‘कफनाशक अग्नि देवता का प्राकट्य हो रहा है’ ऐसी भावना करें | श्वास ६० से १०० सेकंड तक रोक सकते हैं फिर बायें नथुने से धीरे – धीरे छोड़ दें | यह प्रयोग खाली पेट सुबह – शाम ३ से ५ बार करें | कफ – संबंधी गडबड छू हो जायेगी !  

गजकरणी

सुबह एक से सवा लिटर गुनगुना पानी लो | उसमें १० – १२ ग्राम सेंधा नमक डाल दो | वह पानी पंजों के बल बैठकर पियो और दाहिने हाथ की दो बड़ी उँगलियाँ मुँह में डाल के वमन करो, पानी बाहर निकाल दो | इससे कफ का शमन होता है |

कफशमन हेतु आयुर्वेदिक उपाय

बच्चों को कफ – संबंधी बीमारियाँ ज्यादा होती हैं | साल में तीन बार बच्चों की बीमारियों का मौसम होता है | कफ की समस्या है तो कफ सिरप पिला दो १ – २ दिन, ३ दिन बस, ठीक हो जायेगा बच्चा | डॉक्टर के यहाँ जाना नहीं पड़ेगा | कोई अंग्रेजी दवा की जरूरत नहीं है | तुलसी बीज टेबलेट सुबह – शाम १ – १ गोली दो | एकदम छोटा बच्चा है तो १ – १ गोली और १२ साल से बड़ा है तो २ – २ गोली भी दे सकते हैं |

और एक बहुत अच्छा उपाय है और बिल्कुल कारगर है | १० ग्राम लहसुन और १ ग्राम तुलसी-बीज पीस के ५० ग्राम शहद में डाल दो, चटनी बन गयी | बच्चे को सुबह – शाम ५ – ५ ग्राम थोड़ा – थोड़ा करके चटाओ | ह्रदय भी मजबूत हो जायेगा, कफ भी नष्ट हो जायेगा | ऐसे ही बच्चों के लिए तुलसी टॉफी बनवायी है | उसमें तुलसी के बीज और त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च व पीपर ) डलवाये हैं ताकि कफ शांत हो जाय |

उष्णोदक – पान

एक लीटर पानी को इतना उबालें कि २५० मि.ली. बचे | गुनगुना रहने पर पिलायें | बच्चों को एकदम जादुई फायदा कर देगा | कोई दवा की जरूरत नहीं, कफ सिरप की भी जरूरत नहीं |

विशेष सावधानी : खाँसते हैं तो कफ आता है और फिर कई लोग उसको निकल जाते हैं | कफ आये तो निगलना नहीं चाहिए, नुकसान करता है | जिसको कफ आता हो उसको कुछ दिन तक लस्सी, छाछ, दही, दूध व मिठाइयों का सेवन नहीं करना चाहिए |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

गोदुग्ध – सेवन करनेवाले ध्यान दें !


क्या है ‘ए – १’ व ‘ए – २’ दूध ?

गोदुग्ध में पाये गये प्रोटीन में लगभग एक तिहाई ‘बीटा कैसीन’ नामक प्रोटीन है | बीटा कैसीन के १२ प्रकार ज्ञात हैं, जिनमें ‘ए -१’ और ‘ए – २’ प्रमुख हैं | जर्सी, होल्सटीन आदि विदेशी तथाकथित गायों के दूध में ‘ए -१’ प्रोटीन होता है, जिसकी एमिनो एसिड श्रृंखला में ६७ वें स्थान पर हिस्टिडीन होने के कारण इसकी पाचनक्रिया में बीटा-केसोंमाँर्फीन – ७ (BCM-7) का निर्माण होता ही, जो विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य – विकारो को निमंत्रण देता ही | ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंस एंड नेचर’ मी छपे एक शोध के अनुसार ‘ए-१’ प्रोटीन से मानसिक रोग, टाईप – १ मधुमेह, ह्रदयरोग आदि हो सकते हैं | परंतु भारतीय नस्ल की गायों के दूध में ‘ए – २’ प्रकार का विषरहित प्रोटीन पाया जाता है, जो ऐसे किन्हीं रोगों को उत्पन्न नहीं करता | अत: भारतीय नस्ल की गायों का ही दूध पीना हितकारी है |

कही आप धीमा जहर तो नहीं पी रहे है !

कंज्यूमर गाइडेंस सोसायटी ऑफ़ इंडिया के महाराष्ट्र में हुए हालिया अध्ययन में पाया गया कि बेचे जा रहे ७८.१२% दूध FSSAI के आवश्यक गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं करते हैं |

देश में अन्यत्र भी दूध में मिलावटें होती हैं | शोधकर्ताओं के अनुसार दूध में अधिक मात्रा में  हाइड्रोजन परॉक्साइड व अमोनियम सल्फेट की मिलावट ह्रदयरोग, पेट व आँतों में जलन, उलटी, दस्त जैसी समस्याएँ पैदा कर सकती है | हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हुए डिटर्जेंट, यूरिया, स्टार्च, शर्करा, न्यूट्रलाइजर आदि अनेक पदार्थ मिला के कृत्रिम दूध तैयार कर बेचा जाता है डेयरियों आदि के द्वारा, जिसे पीने से पेटदर्द, आँखों व त्वचा की जलन, कैंसर, शुक्राणुओं की कमी आदि रोग होते हैं तथा यकृत व गुर्दों को हानि होती है | अत: सावधान !

अपनी स्वास्थ्य-रक्षा हेतु देशी गाय का शुद्ध दूध ही पियें एवं विदेशी तथा संकरित पशुओं के दूध एवं कृत्रिम दूध के सेवन से बचें और बचायें |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

होली की ४ महत्त्वपूर्ण बातें


१] पलाश के फूलों के रंग से होली खेलनी चाहिए | होली के बाद धरती पर सूर्य की सीधी तीखी किरणें पडती हैं, जिससे सप्तरंग और सप्तधातुओं में हलचल मच जाती है | अत: पलाश और गेंदे के फूलों का रंग हम होली पूर्णिमा और धुलेंडी को एक – दूसरे पर छिडकें तो वह सप्तरंग, सप्तधातुओं को संतुलित करेगा और हमें सूर्य की सीधी तीखी धूप पचाने की शक्ति मिलेगी | अब दुर्भाग्य यह हो गया कि विकृति आ गयी | लोग जहरी रासायनिक रंगों से होली खेलने लगे, जिनका बड़ा दुष्प्रभाव होता है |

२] होली के बाद के २० - २५ दिन नीम के २० - २५ कोमल पत्ते व १ - २ काली मिर्च खा लो या नीम के फूलों का रस १ – २ काली मिर्च का चूर्ण डालकर पी लो | इससे शरीर में ठंडक रहेगी और गर्मी झेलने की शक्ति आयेगी, पित्त-शमन होगा और व्यक्ति वर्षभर निरोग रहेगा |

३] होली के बाद १५ – २० दिनों तक बिना नमक का भोजन करें तो आपके स्वास्थ्य में चार चाँद लग जायें | बिना नमक का नहीं कर सकते तो कम नमकवाला भोजन करो |

४] अपने सिर को धूप से बचाना चाहिए | जो सिर पर धूप सहते हैं उनकी स्मरणशक्ति, नेत्रज्योति और कानों की सुनने की शक्ति क्षीण होने लगती है | ४२ साल के बाद बुढापा शुरू होता है, असंयमी और असावधानीवालों का दिमाग कमजोर हो जाता है | गर्मियों में नंगे सिर धूप में घूमने से पित्त बढ़ जाता है, आँखें जलती हैं | अत: सिर को धूप से बचाओं, अपने को दुःखों से बचाओ, मन को अहंकार से बचाओ और जीवात्मा को जन्म-मरण से बचा के परमात्मा से प्रेम करना सिखा दो !

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

होली की रात्रि-जागरण और जप आदि हैं बहुत फलदायी


(होली – ९ मार्च २०२० , धुलेंडी – १० मार्च २०२० )

पूनम और अमावस्या को समुद्र में ज्वार – भाटा विशेष आता है, जल – तत्त्व उद्वेलित होता है तो हमारे शरीर की सप्तधातुओं का जलीय अंश भी उद्वेलित होता है | सभी जल तथा जलीय पदार्थों पर चन्द्रमा का प्रभाव अधिक पड़ता है | व्यक्ति इन दिनों संसार-व्यवहार करे तो उसकी शक्तियों का ज्यादा ह्रास होगा | अगर गर्भधान हो गया तो संतान विकलांग पैदा होती ही है | 

इन दिनों में जैसे सम्भोग का कुप्रभाव ज्यादा पड़ता है ऐसे ही ध्यान, जप, तीर्थ-सेवन और महापुरुषों के सत्संग – सान्निध्य से सुप्रभाव भी ज्यादा पड़ता है | होली की रात्रि का जागरण और जप बहुत फलदायी होता है | एक जप हजार गुना फलदायी है |

मंत्रशक्ति तमोगुणी, रजोगुणी, सत्त्वगुणी और गुणातीत व्यक्ति के लिए भी हितकारी है | मंत्रजप से दैवी तत्त्व जागृत होता है, जन्म-जन्मांतरो के कुसंस्कार नष्ट होते हैं | श्रद्धा, तत्परता, संयम और एकाग्रता से ध्यान व जप कई जन्मों के कुसंस्कारों का नाश तथा कई गोहत्या के एवं अन्य अनगिनत पापों का शमन करके ह्रदय में शांति व आनंद ले आते हैं |


ऋषिप्रसाद – फरवरी २०२० से

Tuesday, January 28, 2020

पुण्यदायी तिथियाँ



२८ जनवरी : मंगलवारी चतुर्थी ( सुबह ८:२३ से २९ जनवरी सूर्योदय तक )

३० जनवरी : वसंत पंचमी ( इस दिन सारस्वत्य मंत्र का अधिक-से-अधिक जप करना चाहिए |)

१ फरवरी : अचला सप्तमी (प्रात: पुन्यस्नान, व्रत करके गुरु-पूजन करनेवाला सम्पूर्ण माघ मास के स्नान का फल व वर्षभर के रविवार व्रत का पुण्य पा लेता है | यह सम्पूर्ण पापों को हरनेवाली व सुख-सौभाग्य की वृद्धि करनेवाली है |)

५ फरवरी : जया एकादशी (व्रत से ब्रह्महत्यातुल्य पाप व पिशाचत्व का नाश होता है |)

७ फरवरी : माघ शुक्ल त्रयोदशी [इस दिन से माघी पूर्णिमा (९ फरवरी) तक प्रात: पुण्यस्नान तथा दान, व्रत आदि पुण्यकर्म करने से सम्पूर्ण माघ-स्नान का फल मिलता है | - पद्म पुराण ]





१३ फरवरी : विष्णुपदी संक्रांति (पुण्यकाल:सुबह ८-४१ से दोपहर ३-०५ तक )




१४ फरवरी : मातृ-पितृ पूजन दिवस



१९ फरवरी : विजया एकादशी (व्रत से इस लोक में विजयप्राप्ति होती है और परलोक भी अक्षय बना रहता है |)




२१ फरवरी : महाशिवरात्रि व्रत, रात्रि-जागरण, शिव-पूजन (निशीथकाल : रात्रि १२-२७ से १-१७ तक )





२३ फरवरी : द्वापर युगादि तिथि (स्नान, दान-पुण्य, जप, हवन से अनंत फल की प्राप्ति |)


१ मार्च       : रविवारी सप्तमी (दोपहर ११-१७ से २ मार्च सूर्योदय तक )

                                                                  ऋषिप्रसाद  और  लोककल्याण सेतु – जनवरी २०२० से

पौष्टिक सिंघाड़ा


सिंघाड़े मधुर, शीतल, वीर्यवर्धक, पित्तशामक तथा रक्त-विकार, जलन और सूजन को दूर करनेवाले, पचने में भारी तथा वात एवं कफ कारक हैं | ये विटामिन बी-१, बी-२, बी -९, सी तथा कैल्शियम, ताँबा, लौह तत्त्व, पोटैशियम, मैंगनीज आदि पोषक तत्त्वों के अच्छे स्त्रोत हैं | एंटी ऑक्सीडेट्स का समृद्ध स्त्रोत होने से सिंघाड़े उच्च रक्तचाप में एवं ह्रदय के लिए भी लाभकारी हैं |

सिंघाड़े के आटे से कई प्रकार के पौष्टिक व आरोग्यप्रद व्यंजन बनाये जाते हैं | आटा बनाने हेतु इसकी गिरी को निकालकर धूप में सुखा लें, फिर पिसवा लें | इसे उपवास में भी खा सकते हैं | पाचनशक्ति के अनुसार २०-३० ग्राम सिंघाड़े के आटे से बने हलवे का सेवन करने से श्वेतप्रदर व रक्तप्रदर में लाभ होता है, साथ ही शरीर भी पुष्ट होता है |

सिंघाड़े का हलवा

१०० ग्राम सिंघाड़े के आटे को घी में धीमी आँच पर सुनहरा होने तक भून लें | कढ़ाई को उतार के आटे को ठंडा होने दें | फिर इसमें १ कप गुनगुना दूध व स्वादानुसार मिश्री मिलाकर धीमी आँच पर पकायें | सिंघाड़े का यह हलवा लौह तत्त्व से भरपूर है | रक्ताल्पता एवं मासिक संबंधी रोगों में उपयोगी होने के साथ यह पौष्टिक और बलप्रद भी है |


सिंघाड़े की पुष्टिदायी गोलियाँ

सिंघाड़े के आटे को घी में सेंक लें | आटे के समभाग खजूर को मिक्सी में पीसकर आटे में मिला लें | अब इसे हलका-सा सेंककर बेर के आकार की गोलियाँ बना लें | २ – ४ गोलियाँ सुबह चूसकर खायें, थोड़ी देर बाद दूध पियें |

इससे अतिशीघ्रता से रक्त की वृद्धि होती है | उत्साह, प्रसन्नता व वर्ण में निखार आता है | गर्भिणी माताएँ गर्भावस्था के छठे महीने से यह प्रयोग शुरू करें | इससे गर्भ का पोषण व प्रसव के बाद मातृदुग्ध में वृद्धि होगी | माताएँ बालकों को हानिकारक चॉकलेटस की जगह ये पुष्टिदायी गोलियाँ खिलायें |

पुष्टिकारक खीर

सिंघाड़े का २ छोटे चम्मच आटा, १ चम्मच घी, ३०० मि.ली. दूध, १०० मि.ली. पानी, स्वादानुसार
मिश्री व थोड़ी इलायची लें | सिंघाड़े के आटे को घी डालकर धीमी आँच पर सुनहरा लाल होने तक भूल लें | फिर इसमें दूध तथा पानी डाल के पकायें | पकने पर मिश्री व थोड़ी इलायची डालें | यह स्वादिष्ट तथा पौष्टिक खीर रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, शुक्रधातु की दुर्बलता, रक्तपित्त (शरीर के किसी भी भाग से खून आना ) आदि समस्याओं में तथा गर्भिणी व प्रसूता माताओं के लिए लाभकारी है | इसके सेवन से वजन व बल की वृद्धि होती है | 

गर्भस्थापक व गर्भपोषक पाक

सिंघाडा सगर्भावस्था में अत्यधिक लाभकारी होता है | यह गर्भस्थापक अर्थात गर्भपात से रक्षा
करनेवाला तथा गर्भपोषक है | इसका नियमित और उचित मात्रा में सेवन गर्भस्थ शिशु को कुपोषण से बचाकर स्वस्थ व सुंदर बनाता है | यदि गर्भाशय की दुर्बलता या पित्त की अधिकता के कारण गर्भ न ठहरता हो, बार-बार गर्भस्त्राव या गर्भपात हो जाता हो तो सिंघाड़े के आटे से बने पाक का सेवन करें |

सामग्री : २०० -२०० ग्राम सिंघाड़े व गेहूँ का आटा, ४०० ग्राम देशी घी, १०० ग्राम पिसा हुआ खजूर, १०० ग्राम बबूल का पिसा हुआ गोंद, ४०० ग्राम पीसी मिश्री |

विधि : गोंद को घी में भून लें | फिर उसमें सिंघाड़े व गेहूँ का आटा मिलाकर धीमी आँच पर सेंकें | जब मंद सुगंध आने लगे तब पिसा हुआ खजूर व मिश्री मिला दें | पाक बनने पर थाली में फैलाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट के रख लें |

सेवन-विधि : २ टुकड़े (लगभग २० ग्राम ) सुबह-शाम खायें | ऊपर से दूध पी सकते हैं |

सावधानियाँ : सिंघाड़ा या उसके आटे का सेवन पाचनशक्ति के अनुसार करें | कफ प्रकृति के लोग इसका सेवन अल्प मात्रा में करें | कब्ज हो तो इसका सेवन न करें |

लोककल्याण सेतु – जनवरी २०२० से
              


Monday, January 13, 2020

अभीष्ट सिद्धि हेतु


भीष्माष्टमी (२ फरवरी) के दिन निम्न मंत्र से भीष्मजी को तिल, गंध, पुष्प, गंगाजल व कुश मिश्रित अर्घ्य देने से अभीष्ट सिद्ध होता है :

वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च |
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आबालब्रह्मचारिणे ||




  ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से        

लक्ष्मी कहाँ से चली जाती है ?


भगवान श्रीहरि कहते हैं : “जपो अल्पज्ञ भीगे पैर अथवा नग्न होकर सोता है तथा वाचाल की भाँति निरंतर बोलता रहता है, उसके घर से साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं |

जो व्यक्ति अपने सिर पर तेल लगाकर उसी हाथ से दूसरे के अंग का स्पर्श करता हैं * और अपने किसी अंग को बाजे की तरह बजाता है, उससे रुष्ट होकर लक्ष्मी उसके घर से चली जाती हैं | 

जो व्रत-उपवास नहीं करता, संध्या – वंदन नहीं करता, सदा अपवित्र रहता है तथा भगवदभक्ति से रहित है उसके यहाँ से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं |’ ( श्रीमद देवी भागवत : ९.४१.४२-४४ )

*पद्म पुराण के अनुसार मस्तक पर लगाने से बचे हुए तेल को अपने शरीर पर भी लगाना वर्जित है |

ऋषिप्रसाद- जनवरी २०२० से

क्या करें ....क्यां न करें


क्या करें
१] भोजन पचने में हलका व कम मात्रा में लें | जौ की रोटी या दलिया, ज्वार, कुलथी, सहजन, मेथी, करेला, पुनर्नवा, परवल, बथुआ, सोआ, कोमल बैंगन, लहसुन, अदरक, सोंठ, हींग, अजवायन, अरंडी का तेल आदि का सेवन हितकर है | गोमूत्र अथवा पानी मिलाकर गोमूत्र अर्क लेना लाभदायी है | पीने के लिए गुनगुने पानी का उपयोग करें |
२] १०० मि.ली, पानी में २ ग्राम सोंठ मिलाकर उसे इतना उबालें कि पानी केवल आधा शेष रहे | फिर इसे छानकर १५ से ३० मि.ली. अरंडी का तेल मिला के सूर्योदय के बाद पियें | यह प्रयोग हफ्ते में २-३ बार करें |
३] गठिया में उपवास अत्यंत हितकर है | सप्ताह में अथवा १५ दिन में एक दिन उपवास रखें | उस दिन केवल गुनगुना पानी पियें |
४] प्रतिदिन प्राणायाम करें |
५] स्पेशल मालिश तेल को गुनगुना करके उससे प्रभावित अंगों की मालिश करें | उसके बाद उन्हें १५-२० मिनट धूप से सेंक लें | फिर कम्बल से ढककर १५-२० मिनट धूप से सेंकें |
६] एक चुटकी रामबाण बूटी पानी से लें | अगर ज्यादा गर्मी है तो कम लें |

क्यां न करें
१] दही, छाछ, गुड़, तले हुए व उड़द से बने पदार्थ, अचार, पापड़, पनीर, फल, मिठाई, चावल, सुखा मेवा, आलू , मटर, टमाटर, नींबू, चना, राजमा, चौलाई, सेम, ग्वारफली, अरवी, टिंडा, मक्का, चिकने व भारी पदार्थ,  मैदे व दूध से बने पदार्थ एवं चाय-कॉफ़ी का सेवन न करें |
२] विरुद्ध आहार जैसे – नमक, खट्टे पदार्थ, फल, दालें, शाक, अदरक, लहसुन, तुलसी आदि का दूध के साथ सेवन न करें |
३] पूर्व में लिये हुए अन्न का पाचन होकर शरीर में हलकापन आने व खुल के भूख लगने से पहले फिर से अन्न ग्रहण न करें |
४] दिन में सोना, अनुचित समय पर भोजन, रात्रि-जागरण, खुली हवा में घूमना, फ्रिज का ठंडा पानी पीना, सतत पानी में काम करना, दलदलवाले स्थान पर तथा नमीयुक्त वातावरण में दीर्घकाल तक रहना व चिंता करना – इन कारणों से गठिया रोग उत्पन्न होता है | अत: इनसे बचें |
५] निवाड़ या रस्सी से बुने हुए खाट या पलंग पर न सोये |
६] लगातार बैठे रहना, गद्दों पर तथा ए. सी. , पंखा या कूलर की हवा में सोना, आरामप्रियता आदि का त्याग कर दें |

ऋषिप्रसाद – जनवरी २०२० से