Search This Blog

Tuesday, October 22, 2013

अक्षय फल देनेवाली अक्षय नवमी



कार्तिक शुक्ल नवमी (११ नवम्बर २०१३ ) को ‘अक्षय नवमी’ तथा ‘आँवला नवमी’ कहते है | अक्षय नवमी को जप, दान, तर्पण, स्नानादि का अक्षय फल होता है | इस दिन आँवले के वृक्ष के पूजन का विशेष माहात्म्य है | पूजन में कपूर या घी के दीपक से आँवले के वृक्ष की आरती करनी चाहिए तथा निम्न मंत्र बोलते हुये इस वृक्ष की प्रदक्षिणा करने का भी विधान है :

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च |
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ||

इसके बाद आँवले के वृक्ष के नीचे पवित्र ब्राम्हणों व सच्चे साधक-भक्तों को भोजन कराके फिर स्वयं भी करना चाहिए | घर में आंवलें का वृक्ष न हो तो गमले में आँवले का पौधा लगा के अथवा किसी पवित्र, धार्मिक स्थान, आश्रम आदि में भी वृक्ष के नीचे पूजन कर सकते है | कई संत श्री आशारामजी आश्रमों में आँवले के वृक्ष लगे हुये हैं | इस पुण्यस्थलों में जाकर भी आप भजन-पूजन का मंगलकारी लाभ ले सकते हैं |
  

Limitless fruits from Akshay Navami

Karthik Shukla Navami (11 Nov 2013) is also renowned as "Akshay Navami" or "Amla Navami". Performing recitations, donations, tarpan, bathing, etc.. offers limitless benefits. There is a special significance of worshiping Amla tree on this day. During puja, one should use a lamp lit using camphor or clarified butter, ghee in front of an Amla tree. Following mantra should be recited and then circumambulate around the tree:
YANI KANI CHA PAPAANI JANMANTARAKRITAANI CHA |
TAANI SARVAANI NASHYANTU PRADAKSHINPADE PADE ||
After this, there is the custom of offering food to pure brahmins and devotees of pure heart, and then one should oneself take meal under the Amla tree. If one doesnot have Amla tree in his backyard then the same practice can be repeated around a small amla plant in a pot or in any holy, religious place or ashram. Many Sant Shri Asaramji ashrams have Amla trees planted in their premises. You may also take benefit of these holy places.


- Rishi Prasad Oct 2013

गौ-पूजन से सौभाग्यवृद्धि




(गोपाष्टमी पर्व – १० नवम्बर २०१३ )

कार्तिक शुक्ल अष्टमी को ‘गोपाष्टमी’ कहते हैं | यह गौ-पूजन का विशेष पर्व हैं | इस दिन प्रात:काल गायों को स्नान कराके गंध-पुष्पादि से उनका पूजन किया जाता है | इस दिन गायों को गोग्रास देकर उनकी परिक्रमा करें और थोड़ी दूर तक उनके साथ जायें तो सब प्रकार की अभीष्ट सिद्धि होती है | सायंकाल जब गायें चरकर वापस आयें, उस समय भी उनका आतिथ्य, अभिवादन और पंचोपचार-पूजन करके उन्हें हरी घास, भोजन आदि खिलाएं और उनकी चरणरज ललाट पर लगायें | इससे सौभाग्य की वृद्धी होती है |
  
- Rishi Prasad Oct 2013

Prosperity through worship of cows
Gopashtami - 10 November 2013
Karthik Shukla Ashtami is also renowned as "Gopashtami". This is a special occasion for cow worship. On this day, one should bathe cows early in the morning and then worship them with fragrance sticks and flowers. On this day, one should feed them grass and then circumambulate them. One should also follow their paths for a while for gaining higher spiritual achievements in life. During dusk, when the cows return after grazing, worshiping even then and welcoming them back in the shed by feeding them green grass or other fodder is also preferred.
Apply soil from cow's hoof on your forehead. This will bring prosperity in your life.

अमृत बरसाती शरद पूर्णिमा


शरद पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा की किरणों से अमृत बरसता है | ये किरणें स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायी है | इस रात्रि में शरीर पर हल्के-फुल्के परिधान पहनकर चन्द्रमा की चाँदनी में टहलने, घास के मैंदान पर लेटने तथा नौकाविहार करने से त्वचा के रोमकूपों में चंद्र किरणें समां जाती है और बंद रोम-छिद्र प्राकुतिक ढंग से खुलते है | शरीर के कई रोग तो इन चंद्र-किरणों के प्रभाव से ही धीरे-धीरे दूर होने लगते है |
इन चंद्र-किरणों से त्वचा का रंग साफ़ होता है, नेत्रज्योति बढती है एवं चेहरे पर गुलाबी आभा उभरने लगती है | यदि देर तक पैरों को चंद्र-किरणों का स्नान कराया जाय तो ठंड के दिनों में तलुए, एडियाँ, होंठ फटने से बचे रहते हैं |
चन्द्रमा की किरणें मस्तिष्क के लिए अति लाभकारी हैं | मस्तिष्क की बंद तहें खुलती हैं, जिससे स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है | साथ ही सिर के बाल असमय सफेद नहीं होते हैं |

शरद पूर्णिमा की चाँदनी के स्वास्थ्य-प्रयोग

·         दो पके सेवफल के टुकड़े करके शरद पूर्णिमा को रातभर चाँदनी में रखने से उनमें चंद्रकिरणें और ओज के कण समा जाते हैं | सुबह खाली पेट सेवन करने से कुछ दिनों में स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक लाभकारी परिवर्तन होते हैं |

·         इस दिन रात को चाँदनी में सेवफल २ – ३ घंटे रख के फिर उसे चबा – चबाकर खाने से मसूड़ों से खून निकालने का रोग ( स्कर्वी ) नहीं होता तथा कब्ज से भी छुटकारा मिलता है |  

·         २५० ग्राम दूध में १ – २ बादाम व २ – ३ छुहारों के टुकड़े करके उबालें | फिर इस दूध को पतले सूती कपड़े से ढंककर चंद्रमा की चाँदनी में २ – ३ घंटे तक रख दें | यह दूध औषधीय गुणों से पुष्ट हो जायेगा | सुबह इस दूध को पी लें |

·         सोंठ, कालीमिर्च और लौंग डालकर उबाला हुआ दूध चाँदनी रात में २ – ३ घंटे रखकर पीने से बार-बार जुकाम नहीं होता, सिरदर्द में लाभ होता है |

·         इस रात्रि में ३ – ४ घंटे तक बदन पर चन्द्रमा की किरणों को अच्छी तरह पड़ने दें | इससे त्वचा मुलायम, कोमल व कंचन – सी दमकने लगेगी |

·         तुलसी के १० – १२ पत्ते एक कटोरी पानी में भिगोकर चाँदनी रात में २ – ३ घंटे के लिए रख दें | फिर इन पत्तों को चबाकर खा लें व थोडा पानी पियें | बचे हुये पानी को छानकर एक-एक बूंद आँखों से धुँधला दिखना, बार-बार पानी आना आदि में इससे लाभ होता है | तुलसी के पानी की बुँदे चंद्रकिरणों के संग मिलकर प्राकृतिक अमृत बन जाती हैं | (दूध व तुलसी के सेवन में दो-ढाई घंटे का अंतर रखें | )

Sharad Purnima - The night of Ambrosia
On the night of Sharad Purnima, it rains ambrosia from the moon rays. These rays are extremely beneficial towards one's health. On this night, one should wear light clothes and go for a stroll in the moonlit night across a grassy playground or take a boat ride so that your skin can absorb these moon rays and naturally augment opening up of the skin pores. Many hidden ailments inside the body slowly begin to wane away.
It lightens the skin tone of the body, enhances eye sight and brings forth a rosy skin tone on the face. If one can soak the rays on the feet for  long time, then one can prevent cracking of skin near the sole, ankle and lips during cold weather.
The moon rays are extremely beneficial for the brain. It opens up new nerve channels which augment memory. Also, early greying of hair is prevented.
Health tips by use of moonlight of Sharad Purnima 

- Place pieces of two ripe apples such that they can soak the moonlight throughout the entire night. By morning, they completely absorb the effulgence of moonrays. Taking them on an empty stomach in the morning brings forth exemplary improvement in the health of a person.
- On this night, if one eats apples which have been soaked in moonlight for 2-3 hours atleast and chews them properly while eating, then he is freed from bleeding gums disease and constipation permanently.
- Put 1-2 almonds and 2-3 date palm in 250 grams of milk and boil it. Then, cover this milk with a thin cotton cloth for about 2-3 hours. This milk is now becomes empowered with medicinal properties. Drink this milk next day morning.
- Milk boiled with Dry ginger, black pepper and cloves and placed in moonlight for 2-3 hours, becomes extremely potent is curing frequent colds and headaches.
- Allow the moon rays to fall on the bare body for 3-4 hours. This will make the skin supple, soft, and radiate spiritual composure.
- Take 10-12 Basil leaves soaked in water and place it in moonlight for 2-3 hours. Then, chew the Basil leaves properly and take a little sip of water too. Sieve the remnant water and put 1-1 drops in your eyes. Then, ailments like blurry vision, excess watering of eyes, etc will get alleviated. The extract from Basil along with the moon rays form a natural ambrosial mix. (Maintain atleast 2-3 hours gap between consumption of milk and Basil)
-  Rishi Prasad Oct' 2013



गाय का घी

स्वास्थ्य व पर्यावरण सुरक्षा का अमोग उपाय – गाय का घी

देशी गाय का घी शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास एवं रोग-निवारण के साथ पर्यावरण-शुद्धि का एक महत्त्वपूर्ण साधन है |

इसके सेवन से –

१) बल, वीर्य व आयुष्य बढ़ता है, पित्त शांत होता है |

२) स्त्री एवं पुरुष संबंधी अनेक समस्याएँ भी दूर हो जाती है |

३) अम्लपित्त (एसिडिटी) व कब्जियत मिटती है |

४) एक गिलास दूध में एक चम्मच गोघृत और मिश्री मिलाकर पीने से शारीरिक, मानसिक व   दिमागी कमजोरी दूर होती है |

५) युवावस्था दीर्घकाल तक रहती है | काली गाय के घी से वृद्ध व्यक्ति भी युवा समान हो जाता   है |

६) गर्भवती माँ घी – सेवन करे तो गर्भस्थ शिशु बलवान, पुष्ट और बुद्धिमान बनता है |

७) गाय के घी का सेवन ह्रदय को मजबूत बनता है | यह कोलेस्ट्रोल को नहीं बढाता | दही को   मथनी से मथकर बनाये गये मक्खन से बना घी ह्रदयरोगों में भी लाभदायी है |

८) देशी गाय के घी में कैंसर से लड़ने व उसकी रोकथाम की आश्चर्यजनक क्षमता है |

ध्यान दें : घी के अति सेवन से अजीर्ण होता है | प्रतिदिन १० से १५ ग्राम घी पर्याप्त है |

नाक में घी डालने से –

१) मानसिक शांति व मस्तिष्क को शांति मिलती है |
२) स्मरणशक्ति व नेत्रज्योति बढती है |
३) आधासीसी (माइग्रेन) में राहत मिलती है |
४) नाक की खुश्की मिटती है |
५) बाल झड़ना व सफ़ेद होना बंद होकर नये बाल आने लगते हैं |
६) शाम को दोनों नथुनों में २ – २ बूंद गाय का घी डालने तथा रात को नाभि व पैर के तलुओं

   में गोघृत लगाकर सोने से गहरी नींद आती है |

मात्रा : ४ से ८ बूंद

गोघृत से करें वातावरण शुद्ध व पवित्र

१) अग्नि में गाय के घी की आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक का सारा    वातावरण प्रदुषण और आण्विक विकिरणों से मुक्त हो जाता है | मात्र १ चम्मच गोघृत की   आहुति देने से एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती है, जो अन्य किसी भी उपाय से संभव   नहीं है |

२) गोघृत और चावल की आहुति देने से कई महत्त्वपूर्ण गैसे जैसे –इथिलिन ऑक्साइड,   प्रोपिलिन ऑक्साइड, फॉर्मलडीहाइड आदि उत्पन्न होती है | इथिलिन ऑक्साइड गैस आजकल   सबसे अधिक प्रयुक्त होनेवाली जीवाणुरोधक गैस है,  जो शल्य – चित्किसा (ऑपरेशन) से   लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी है |

३) मनुष्य-शरीर में पहुँचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता गोघृत   में है |

- Rishi Prasad Sept 2013     

Benefits of cow's clarified butter

The best means to good health and saving the environment - Using clarified butter
Clarified butter obtained from indigenous cows enhances physical, mental and intellectual health, rids us of diseases and also augments purification of atmosphere.
Through its use,
1. One gains strength, virility and longevity. It alleviates any excess bile.
2. Many hidden health problems pertaining to both men and women can be alleviated.
3. It cures high acidity and constipation.
4. Taking one glass of milk with a spoon of clarified butter and rock sugar leads to physical, mental and intellectual growth.
5. It retains youth for a longer time. Clarified butter from a black cow can bring forth youth in even aged persons.
6. Regular intake by pregnant women benefit the child in womb by making him stronger, healthier and more intelligent.
7. Regular consumption of clarified butter makes the heart stronger. It does not allow the cholesterol to increase. Clarified butter made from butter extracted by churning curd is extremely beneficial in numerous heart ailments.
8. Clarified butter made from indigenous cows  is also a potent medicine against all forms of cancer.
Caution: Excess consumption of clarified butter can lead to indigestion. Daily intake of 10 to 15 grams is adequate.
Taking clarified butter through nose

1. It has a soothing effect and enhances peace of mind.
2. It augments memory power and eye sight.
3. Provides relief during migraine.
4. Removes dryness and flaking inside the nose.
5. Hair loss and greying of hair stops completely and infact, new hair begin to grow.
6. One gets deep sleep by putting 2-2 drops in one's nostrils and rubbing it on belly button and sole of feet during evening time.
Dosage: Maximum 4 to 8 drops.

Purify the environment using cow's clarified butter

1. By offering oblations of clarified butter in fire, the environment becomes free from pollution and harmful particulates to the entire extent of the spread of the smoke. Just by putting one spoon of oblation is adequate to generate one ton of purified oxygen in the air. This is not feasible by any other means.
2. Offering oblation of clarified butter with rice  leads to release of some really vital gas like - ethylene oxide, propylene oxide, formaldehyde, etc. These gases are extremely potent in removing harmful bacteria or organisms and so, are also used in surgeries in the form of life saving medical cases.
3. Clarified butter has tremendous capacity to rid the body of any aberrations due to exposure to radiothermy.
- Rishi Prasad Sept 2013
__________________________
        

Monday, October 21, 2013

रक्षा कवच


(संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग - प्रवचन से)
जब आप सत्संग में होते है, शुद्ध वातावरण में होते है, तब लगता है कि कामविकार भोगने में वास्तव में कोई सार नहीं है | धन इकठ्ठा कर-करके ज्यादा सँभालने की चिंता ही तो मिलती है, आखिर कुछ नहीं | अपनी संतान के लिए जो लोग छल - कपट करते है, आखिर में वाही (संतान) उन पर थूकतीहै, यह भी लोगों का अनुभव है | जब आप बाहर जाते हो, बाहर के कामी - क्रोधी लोगों के आभामंडल में जाते हो तो आपकी पुरानी आदत के अनुसार आपको भी काम-क्रोध सताने लगते है |

बाहर जाने पर बाह्य हलकी तरंगो से हमारा पतन हो जाता है और हम पछताते हैं | हम पुन: सावधान होते हैं, किंतु फिर से झटका लग जाता हैं | अच्छे-अच्छे लोगों की यह हालत है | एक-दो की नहीं, लगभग सभीकी यह हालत है |

यदि हम सावधान नहिओ रहें, आप पैर छुएँ और हम छुआते रहें, आप देते और हम लेते रहें तो हमारी भी ऐसी दुर्दशा हो जायेगी कि हम आपको मुँह दिखाने के काबिल न रहेंगे | एक बार ऐसा हुआ था | जब हम अमेरिका गये थे तब मेरे मन में हुआ कि 'ये जो डॉलर आते हैं आरती में, दक्षिणा में, वे हमको अपने पास रखने चाहिए; आयोजन-समिति के हवाले नहीं करने चाहिए | काम में आयेंगे |

थोड़ी ही देर में भगवान् की कृपा हुई, गुरुदेव का सहयोग रहा .... तुरंत मैंने अपने भक्त से कहा कि 'मुझे वापस भारत जाना है , टिकट करवा लो |'
"बापूजी ! कार्यकर्मों का क्या होगा ?"
"जितने हो गए बहुत हैं | जो दो-चार दिये हैं उन्हें पूरा करके भारत जाना है | जल्दी से टिकट करवाओ |"
"क्या हमसे कोई गलती हो गयी है ?"
"नहीं, नहीं | आप लोगों से कोई गलती नहीं हुई हैं |"
किंतु आप लोगों के एयर कंडीशंड वातावरण में रहकर और आप लोगों के श्वासोच्छ्वास में रहकर हमारा मन कहता है कि 'हमें डॉलर रखने चाहिए |'

उनका यह लम्बी बात नहीं कही, किंतु मैंने टिकट बनवा ली और फिसलते-फिसलते बाख गया | भगवान् साक्षी हैं, उसके बाद में अमेरिका कभी नहीं गया | बहुत आमंत्रण आये, बहुत बार वहाँ के लोगों ने बुलाया लेकिन मैं नहीं गया |"

भगवान रामजी के गुरुदेव कहते हैं कि 'हे रामजी ! वासना के आवेग में बहने की दीर्घकाल की आदत दीर्घकालीन शुभ अभ्यास के बिना नहीं मिटती |'


जब रामजी के ज़माने में भी लोग फिसलते थे और दीर्घकालीन अभ्यास की आवश्यकता थी तो अभी तो कलियुग है | अभी तो ज्यादा सावधानी की जरुरत हैं | इस सावधानी के लिए मुझे शास्त्रों में से एक रक्षा -कवच मिल गया है जो मुझे अच्छा लगा | मैंने उसका प्रयोग किया | बड़ा सरल है |
आरंभ में आप यह प्रयोग थोड़े दिन लगातार करें | फिर तो आप याद करेंगे और रक्षा - कवच आपके इर्दगिर्द बन जायेगा | फिर वासना की तरंगे आपके अंदर नहीं घुसेंगी |

आँख ने कुछ देखा, मन उसके लिए लालायित हुआ, बुद्धि ने निर्णय लिया कि ऐसा करना है | इस प्रकार एक-एक इन्द्रिय मन को खींच लेती है | मन बुद्धि से सम्मत्ति ले लेता है और आप उसमें गरक हो जाते है |

वासना के इन आवेगों से स्वयं को बचने में यदि आप सहयोग नहीं देते तो भगवान और गुरु भी आपको बचने में सफल नहो हो सकते | यदि विद्यार्थी साथ नहीं देता है तो शिक्षक और प्राचार्य मिलकर भ विद्यार्थी को पदवीधारी नहीं बना सकते | अत: पुरुषार्थ तो आपको ही करना पड़ेगा |
भगवान की, शास्त्रों की, ऋषियों एवं सदगुरु की कृपा अनावृत हैं, जैसे सूर्य की किरणे, बरसात सामान्यत: मिलते ही है | किंतु किसान स्वयं मेहनत नहीं करे तो बरसात और सूर्य क्या करेंगे ?
आप अपनी रक्षा कीजिये |

रक्षा -कवच धारण करने एवं आत्मबल जगाने की विधि 

पद्मासन या सिद्धासन में बैठे | मेरुदंड सीधा हो | आँखें आधी खुली -आधी बंद रखे | '
​​
​​
​'​
 या अपने इष्टमंत्र अथवा गुरुमंत्र का जप करते हुए दृढ़ भावना करें कि 'मेरे इष्ट की कृपा का शक्तिशाली प्रवाह मेरे अंदर प्रवेश कर रहा है और मेरे चारों और सुदर्शन चक्र - सा एक इन्द्रधनुषी घेरा बनाकर घूम रहा है | वह अपने दिव्य तेज से मेरी रक्षा कर रहा है | इन्द्रधनुषी प्रकाश घना होता  जा रहा है | दुर्भावनारुपी अंधकार विलीन हो गया है | सात्त्विक प्रकाश -ही-प्रकाश छाया है | सूक्ष्म आसुरी शक्तियों से मेरी रक्षा करने के लिए वह रश्निल चक्र सक्रिय है | मैं पूर्णत: निश्चिंत हूँ |'

श्वास जितनी देर भीतर रोक सकें, रोंके | मन-ही-मन उक्त भावना को दोहराये | मानसिक चित्र बना लें | अब धीरे-धीरे '
​​
​​
ॐ ....
' का दीर्घ उच्चारण करते हुए श्वास बाहर निकाले और भावना करें कि 'मेरे सारे दोष, विकार भी बाहर निकल गए है | मन-बुद्धि शुद्ध हो गये हैं | श्वास के खाली होने के बाद तुरंत श्वास न लें | यथाशक्ति बिना श्वास रहें और भीतर-ही-भीतर '
​​
हरि ॐ ... हरि ॐ ....
' का मानसिक जप करें | दस-पंद्रह मिनट ऐसे प्राणायामसहित उच्च स्वर से 'ॐ ...' की ध्वनि करके शांत हो जायें | सब प्रयास छोड़ दें | वृत्तियों को आकाश की ओर फैलने दें | आकाश के अन्दर पृथ्वी है | पृथ्वी पर अनेक देश, अनेक समुद्र एवं अनेक लोग हैं | उनमें से एक आपका शरीर आसन पर बैठा हुआ हैं | इस पुरे दृश्य को आप मानसिक आँख से, भावना से देखते रहें | आप शरीर नहीं हो बल्कि अनेक शरीर, देश, सागर, पृथ्वी, ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र एवं पुरे ब्रम्हांड के दृष्टा हो, साक्षी हो, इस साक्षीभाव में जाग जायें |

थोड़ी देर के बाद फिर से प्राणायामसहित '
​​
ॐ ....' का जाप करें और शांत होकर अपने विचारों को देखते रहें |

इस अवस्था में दृढ़ निश्चय करें कि 'मैं जैसा बनना चाहता हूँ वैसा होकर ही रहूँगा |' विषयसुख, सत्ता, धन-दौलत इत्यादि कि इच्छा न करें क्योंकि आत्मबलरूपी हाथी के पदचिन्ह में अन्य सभीके पदचिन्ह समाविष्ट हो ही जायेंगे | आत्मानंदरूपी सूर्य के उदय होने पर मिट्टी के तेल के दीये के प्रकाशरूपी क्षुद्र सुखाभास कि गुलामी कौन करें ?

किसी भी भावना को साकार करने के लिए ह्रदय को कुरेद डाले ऐसी निश्चयात्मक बलिष्ठ वृत्ति होनी आवश्यक है | | अंत:करण के गहरे -से -गहरे प्रदेश में चोट करे ऐसा श्वास भरके निश्चयबल का आवाहन करें | सीना तानकर खड़े हो जाये अपने मन कि दीन-हीन, दु:खद मान्यतावों को कुचल डालने के लिए |

सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ आपकी शक्ति भी बिखरती रहती है | अत: तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधनाकाल में आत्मचिंतन में लगाये और व्यवहारकाल में जो कार्य करते हो उसमें लागायें | हरेक कार्य आवेशरहित व दत्तचित्त होकर करें | सदैव विचारशील एवं प्रसन्न रहें | जीवमात्र को अपना स्वरुप समझे | सबसे स्नेह करें | दिल को व्यापक रखें | खंडनात्मक वृत्ति का सर्वथा त्याग करें |


  
आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग तथा सत्साहित्य से अपने जीवन को  मुखरित हो जायेगी | दुष्प्रभावों के अदृश्य परमाणुओं के भजन के लिए ये अचूक साथी है | जैसे लोहे को लोहा काटता है, वैसे ही विचार को विचार काटता है | आपके इन दो साथियों - आत्मबल एवं रक्षा -कवच के सामर्थ्य पर विश्वास कीजिये | ये सतत आपकी रक्षा एवं पुष्टि करेंगे |

​- -ऋषिप्रसाद - जून २००४ से


Protective Sheath

( Excerpts from Sant Shri Asaramji Bapu's discourses )
When you are sitting in a discourse, in a pure environment, then you have realisation that there is no true joy in lust. Even by accruing wealth,all we get at the end of the day is tension, nothing else. Those who engage in treacherous practices for the benefit of their children, eventually those children themselves spit back at them. This is an oft commonly observed experience in the society. When you return back to the outside world, then in the presence of vibrations of lust-anger of common man, you too get troubled by lust-anger.
On venturing outside, the low vibrations cause our downfall and then we repent. We resolve to become cautious of ourselves, but are once again trumped by those low feelings. Even those with the strongest resolve suffer this same problem. This is a problem not of a few, but pretty much everyone!
If we do not exercise caution, you begin praising me and I fill myself with pride, you begin giving and I start stalking things for myself, then even I would have suffered such depravity that I would become ashamed of coming out in front of you all. This happened once too. When I went to America, then I had a faint thought, "Some of the doltar that is offered to me during puja, arti, donation, I should reserve some for myself rather than depositing it to the committee. It could be useful later on. "

But soon God's grace dawned upon me and with my Guru's support..... I immediately reverted to my devotee, "I want to return to India, get the tickets quickly."
"Bapuji! What will happen to the program ?"
"Whatever has concluded is sufficient. Whatever couple of sessions are left, I want to return to India as soon as I finish them. Get the tickets quickly"
"Have we committed any mistake ?"
"No, No... You have done nothing wrong. But after staying in the air conditioned environment with you all, in your breath and vibration, my mind too has now started having thoughts that I should keep some dollar to myself. "

I am not describing the whole episode, but I got the tickets quickly and prevented myself from slipping away. God is witness to it, I have never visited America again. Many invitations were sent, numerous times I got calls for programs yet I abstained."
Lord Ram ji's Gurudev once said: "He Ramji ! The age old habit of getting carried away in the flood of desires cannot be overcome without long, concerted positive efforts."
When even people of Ramji's generation could slip away and had to engage in concerted efforts, then it cannot be any better in today's age of Kaliyuga. Infact, there is an even greater need to be cautious now. So, to become cautious, I have found a special protective sheath which I found very useful. It is very easy.
To begin with, you must repeat this exercise daily for a few days. Then, within a few days, just reminding oneself of it will form the protective screen around you. Then, the vibrations of low desires will not longer penetrate you.
The eyes see something, the mind wanders off in its crave and then the intellect finally takes decisions accordingly. In this way, every sense is trying to pull the mind towards itself. Mind takes approval from intellect and then you slip away into those cravings.
If you do not exercise self restraint from falling for these cravings, then even Lord or Guru can do nothing to help you out. If the student does not co-operate, how can the teacher or principal combined, help the student to score a better rank. So, you will have to take efforts.
Lord's grace, grace of Scriptures, Saints and Gurudev are all plentiful abound; similar to Sun's rays and rainfall is adequate. But if the farmer does not take any effort, then what is the use of Sun and the rain??
So, take a firm resolve to protect yourself.
Procedure to engage the protective sheath and arouse your inner resolve

Sit in Padmasan or Siddhasan. Keep the backbone erect. Ensure your eyes are half closed- half open... Recite AUM or your Guru mantra and make a firm resolve that
" My graceful Lord is showering His powerful blessings on me which are piercing through me and forming a Sudarshan chakra around me - a sort of rainbow colored sheath. He is protecting me by His divine grace. The rainbow sheath is becoming dense. All impure darkness is fading away. Pure, Sattivic light is spreading all around. Subtle demonaic thoughts are now driven away by this activated light sheath. I am now completely relaxed and relieved."
Hold the breath inside for as long as you can. Repeat the above process in your mind again and again. Generate a mental image. Now, slowly, recite "AUM...." with a long pronunciation while releasing your breath and imagine that "All my sins, desires have been thrown out. My mind-intellect is pure now. "  Do not breathe in immediately after releasing it. Stay put as long as you can and repeat "HARI AUM..... HARI AUM......" mentally. For 10-15 minutes, repeat this process with pranayam and long pronunciation of AUM..... and repose in its peace. Give away any forceful efforts. Let your thoughts spread across the sky. The earth is within the sky. This earth has numerous nations, oceans and people. Among these, there is your body sitting here on an asana. Observe this entire picture through your mental eyes and inner feelings. You are no longer a body, but the true observer of numerous bodies, nations, oceans, earth, planets, constellations, sun, moon and the entire cosmos. You are the sole witness. Awaken yourself in the witnessing state.
After a while, once again recite "AUM...." along with pranayam and peacefully observe your thoughts.
In this state, make a firm resolve "I shall become the way I resolve to be." Desires, hunger for power, wealth, etc must be shunned as under the elephant footprint of power of inner soul, all other miniscule desires are already included. With the dawn of the sun of Divine bliss, why would anyone care for the light from a diminuitive earthen lamp lit by oil?

In order to realise your dreams, you must have the power to shake up your heart with a firm and steady resolve. Make that impact in the deepest recess of your inner self by holding  your breath inside and repeating your resolve. Hold your chest high and throw away all weak-infirm and  pitiable notions inside you.
Always remember, your energy gets wasted due to the ever outgoing fickle and distributed thoughts. So, condense back all those thoughts during spiritual practice and resolve it in the thought of Self and in the activities you perform during the day. Perform all activities without flowing away in desires and with a steady mind. Always remain thoughtful and cheerful. Embrace Life as your own self. Love everyone. Expand your heart. Rid yourself forever of divisive thoughts.
 Through discourses and scriptures given by great saints who have reposed themselves in the Self, one will be able to blossom one's life. To drive away the subtle atoms of vile thoughts, this is a sureshot technique. Just as iron can pierce through iron, so is it true with thoughts too. Have faith in the power of these two companions - Self repose and protective sheath. They will constantly protect and nourish you.

RishiPrasad - June 2004.