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Friday, July 10, 2015

निरोगी व तेजस्वी आँखों के लिए

आँख हमारे शरीर के सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व कोमल अंगों में से एक है | वर्तमान समय में आँखों की समस्याओं से बहुत लोग ग्रस्त देखे जाते हैं , जिनमे विद्यार्थियों की भी बड़ी संख्या है | निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाय तो आँखों को जीवनभर स्वस्थ रख सकते हैं और चश्मे से भी छुटकारा पा सकते हैं |

आँखों के लिए हानिकारक

o कम प्रकाश में, लेटे –लेटे व चलते वाहन में पढना आँखों के लिए बहुत हानिकारक हैं |

o मोबाइल, टीवी, लैपटॉप, कम्प्यूटर आदि की स्क्रीन को अधिक समय तक लगातार देखने व हेयरड्रायर के उपयोग से आँखों को बहुत नुकसान होता है |

o आँखों को चौंधिया देनेवाले अत्यधिक तीव्र प्रकाश में देखना, ग्रहण के समय सूर्य या चन्द्रमा को देखना आँखों को हानि पहुँचता है |

o सूर्योदय के बाद सोये रहने, दिन में सोने और रात में देर तक जागने से आँखों पर तनाव पड़ता है और धीरे-धीरे आँखों की रोशनी कम तथा वे रुखी व तीखी होने लगती है |

o तेज रफ्तार की सवारी के दौरान आँखों पर सीधी हवा लगने से तथा मल-मूत्र और अधोवायु के वेग को रोकने एवं ज्यादा देर तक रोने आदि से आँखें कमजोर होती है |

o सिर पर कभी भी गर्म पानी न डालें और न ही ज्यादा गर्म पानी से चेहरा धोया करें |

o खट्टे, नमकीन, तीखे, पित्तवर्धक पदार्थों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए |

नेत्र - रक्षा के उपाय

o पढ़ते समय ध्यान रखें कि आँखों पर सामने से रोशनी नहीं आये, पीठ के पीछे से आये, आँख तथा पुस्तक के बीच की दूरी ३० से.मी. से अधिक हो | पुस्तक आँखों के सामने नहीं, नीचे की ओर हो | देर रात तक पढने की अपेक्षा प्रात: जल्दी उठकर पढ़ें |

o तेज धूप में धूप के चश्मे या छाते का उपयोग करें | धूप में से आकर गर्म शरीर पर तुरंत ठंडा पानी न डालें |

o चन्द्रमा व हरियाली को देखना आँखों के लिए विश्रामदायक हैं |

o सुबह हरी घास पर १५ – २० मिनट तक नंगे पैर टहलने से आँखों को तरावट मिलती है | (ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०१४, पृष्ठ २७ पर दिये गये नेत्र-सुरक्षा के उपायों का भी लाभ लें|)

कुछ विशेष प्रयोग

o अंजन : प्रतिदिन अथवा कम-से- सप्ताह में एक बार शुद्ध काले सुरमे (सौवीरांजन) से अंजन करना चाहिए | इससे नेत्ररोग विशेषत: मोतियाबिंद का भय नहीं रहता |

o जलनेति : विधिवत जलनेति करने से नेत्रज्योति बढती है | इससे विद्यार्थियों का चश्मा भी छूट सकता हैं | (विधि हेतु आश्रम की पुस्तक ‘योगासन’ का पृष्ठ ४३ देखें )

o नेत्रों के लिए विशेष हितकर पदार्थ : आँवला, गाय का दूध व घी, शहद, सेंधा नमक, बादाम, सलाद, हरी सब्जियाँ – विशेषत: डोडी की सब्जी, पालक, पुनर्नवा, हरा धनिया, गाजर, अंगूर, केला, संतरा, मुलेठी, सौंफ, गुलाबजल, त्रिफला चूर्ण |

o सर्वांगासन नेत्र-विकारों को दूर करने और नेत्रज्योति बढ़ानेवाला सर्वोत्तम आसन है | (आश्रम की पुस्तक ‘योगासन’ का पृष्ठ १५ देखें |)

- स्त्रोत – लोककल्याण सेतु – जून २०१५ से

यशप्राप्ति का अदभुत मंत्र

कौनसा भी कार्य की शुरवात करने से पहिले – ‘नारायण ... नारायण ..., नारायण ..., नारायण ...’ इसी मंत्र का सभी नर - नारी में छूपी सर्वव्यापक परमात्मा के नामस्मरण या उच्चारण करनेवालों को यश अवश्य मिलता है |

- ऋषिप्रसाद (विशेषांक) –मई २०१५ से

Tuesday, July 7, 2015

विपरीतकरणी मुद्रा

इस आसन के नियमित व विधिवत अभ्यास से प्राणों के प्रवाह में सूक्ष्म परिवर्तन आता हैं | मणिपुर चक्र से प्राणशक्ति का प्रवाह प्रचुर मात्रा में विशुद्धाख्य चक्र की ओर होता है | इस प्रकार समस्त सूक्ष्म शरीर के शुद्धिकरण में सहायता मिलती हैं | इसका नियमित अभ्यास कई बीमारियों को रोकता हैं | यह ओजशक्ति को ऊपर के केन्द्रों में ले जाने की एक महत्त्वपूर्ण मुद्रा हैं | महर्षि घेरंड के अनुसार जो नित्यप्रति इसकी साधना करता हैं, वह बुढापे पर विजय प्राप्त करता हैं | इसके अभ्यास से प्राय: सर्वांगासन व शीर्षासन से होनेवाले सभी लाभ होते हैं |

लाभ : १) गले को तथा उसके ऊपर के अंगों को अधिक मात्रा में शुद्ध रक्त की प्राप्ति होती है |
२) मस्तिष्क में विशेषकर प्रमस्तिष्क आवरण ( सेरेब्रल काँर्टक्स ) तथा पीयूष ( पिट्यूटरी ) ग्रंथि एवं शीर्ष ( पीनियल ) ग्रंथि में रक्त का संचार बढ़ जाता है | प्रमस्तिष्क की अक्षमता तथा बुढापे के कारण होनेवाला मनोभ्रंश प्रभावहीन होते हैं तथा मानसिक सतर्कता बढती है |
३) स्नायविक दुर्बलता दूर होती है |
४) सफेद बाल काले होने लगते हैं और चेहरे की झुरियाँ दूर होकर नवयौवन प्राप्त होता है |
५) अल्पक्रियाशील थायराँइड संतुलित बनती है तथा सर्दी – जुकाम, गले की सूजन व श्वसन – संबंधी रोगों से बचाव होता है |
६) भूख व पाचन – क्रिया बढती हैं तथा कब्ज के उपचार में मदद मिलती हैं |
७) यह बवासीर एवं हर्निया के उपचार में सहायक है |
८) महिलाओं का बाँझपन और मासिक धर्म संबंधी विकार दूर होते हैं |

विधि : जमीन पर कम्बल बिछाकर शवासन में लेट जायें | दोनों पैरों को एक साथ धीरे – धीरे ऊपर उठायें | कमर को हथेलियों से सहारा देकर ऊपर उठायें | गर्दन से कमर तक का भाग जमीन से ४५ डिग्री पर ऊपर रखें तथा पैरों को सीधा रखते हुए सिर की ओर उतना ही झुकायें जिससे पैर दृष्टि की सीध में आ जायें | जीभ से तालू का स्पर्श करें | पैर के अँगूठों  पर दृष्टि एकाग्र करें अथवा ध्यान मणिपुर (नाभि) केंद्र में रखें |

आरम्भिक स्थिति में लौटने के लिए पैरों को सिर की ओर झुकायें, फिर धीरे – धीरे मेरुदंड को नीचे लायें तथा घुटने मोड बिना धीरे – धीरे पैरों को नीचे लायें | कुछ देर शवासन में लेटे रहें |

विपरीतकरणी मुद्रा का अभ्यास प्रतिदिन एक ही समय पर प्रात:काल करना लाभप्रद हैं |  प्रथम दिन कुछ सेकंड तक अभ्यास करें | धीरे – धीरे अवधि बढाते हुए १० – १५ मिनट तक कर सकते हैं | अपने नित्य योगाभ्यास के अंत में तथा ध्यान के पूर्व इसका अभ्यास करें |

सावधानियाँ : भोजन के कम – से – कम तीन घंटे बाद तक इसका अभ्यास न करें | उच्च रक्तचाप, ह्रदयरोग, थायराँइड अभिवृद्धि या शरीर में विषाक्त तत्त्वों की वृद्धि होने पर यह आसन न करें | गर्भवती महिलाओं व १४ वर्ष से कम आयु के बालकों को यह आसन नहीं करना चाहिए |


    स्त्रोत – ऋषिप्रसाद – जुलाई २०१५ से  

Friday, June 12, 2015

युवाओं व विद्यार्थियों हेतु विशेष

>> अनिद्रा अथवा अतिनिद्रा, कमजोर याददाश्त, क्रोधी स्वभाव आदि को दूर करने के लिये लोग डॉक्टरों व दवाइयों की गुलामी करने के बाद भी सफल नहीं हो पाते | इन समस्याओं को दूर करने का आसान व बिना खर्च का उपाय है ‘ज्ञान मुद्रा’ | इससे पूजा-पाठ, ध्यान-भजन में मन लगता है तथा एकाग्रता में भी वृद्धि होती है | [विस्तृत जानकारी हेतु पढ़े, आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘जीवनविकास’, पृष्ठ- ८४ ]

>> जल्दी सोयें, जल्दी उठें | रात्रि ९ बजे से प्रात: ३ या ४ बजे तक की प्रगाढ़ निद्रा से ही आधे रोग ठीक हो जाते है | अर्धरोगहरी निद्रा ...

>> एकाग्रता के विकास का आसान व कारगर तरीका है ‘त्राटक’ | आसन पर बैठकर इष्टपूर्ति, सदगुरुदेव, दीपज्योति आदि को बिना पलक झपकाये एकटक देखते रहें | इससे नेत्रज्योति बढाने में विशेष लाभदायी है |




>> जिन विद्यार्थियों ( १८ वर्ष से कम उम्र) का कद नही बढ़ता, वे पुलअप्स का अभ्यास करें और बेल के ६ पत्ते व २ – ४ काली मिर्च हनुमानजी का स्मरण करते हुए चबाकर खायें | इनको पानी के साथ पीसकर भी खा सकते है |

>> यादशक्ति बढाने, मन की दुर्बलता मिटाने तथा शरीर में शक्ति बढ़ाने के लिए ४ – ५ काजू शहद के साथ खूब चबा के प्रतिदिन खाने चाहिए | बच्चों को २ से ५ काजू खाने चाहिए |

>> ताड़ासन करने से प्राण ऊपर के केन्द्रों में चले जाते हैं, इससे स्वप्नदोष, वीर्य-विकार, धातुक्षय जैसी बीमारियों में लाभ होता है | कद-वृद्धि में मदद मिलती है |




विधि : आसन पर सीधे खड़े होकर हाथ ऊँचे उठा के पंजों के बल पर खड़े रहें एवं दृष्टि ऊपर की ओर रखें | यह आसन दिन में २ – ३ बार ५ – १० मिनट तक कर सकते है |

  >> क्रोधी स्वभाव पर नियंत्रण पाने, निर्णयशक्ति बढ़ाने तथा आज्ञाचक्र के विकास में शशकासन बहुत लाभदायी है | वज्रासन में बैठ के सिर को जमीन पर लगायें और हाथों को नमस्कार की स्थिति में जोड़ दें |





                                                                                                - लोककल्याणसेतु – जून – २०१५ से

पूज्य बापूजी की – स्वास्थ्य की अनुपम युक्तियाँ

Cancer के रोगी को १० ग्राम तुलसी का रस तथा १० ग्राम शहद मिलाकर सुबह – दोपहर - शाम देने से अथवा १० ग्राम तुलसी का रस एवं ५० ग्राम ताजा दही (खट्टा नहीं ) देने से उसे राहत मिलती है | एक – एक घंटे के अंतर से दो – दो तुलसी के पत्ते भी मूँह में रखकर चूसते रहें |

सुबह – दोपहर – शाम दही व तुलसी का रस कैंसर मिटा देता है (सूर्यास्त के बाद दही नहीं खाना चाहिए ) | ‘वज्र रसायन’ की आधी गोली दिन में २ बार लें | नींबू के छिलके चाक़ू से निकाल के उनके छोटे – छोटे टुकड़े कर लें | अथवा नींबू को फ्रीजर में रखें और सख्त हो जाने पर उसके छिलके को कद्दूकश किये छिलकों को दाल, सब्जी, सलाद, सूप आदि खाद्य पदार्थों में मिला के नियमित सेवन करने से कैंसर रोग में लाभ होता है | १ दिन के लिए १ नींबू का छिलका पर्याप्त है |

 >> एक चुटकी दालचीनी के चूर्ण को एक कप दूध में समभाग पानी मिलाकर तब तक उबालें, जब एक पानी वाष्पीभूत न हो जाय | फिर मिश्री मिलाकर पी लें, इससे ह्रदयाघात (हार्ट-अटैक) से सुरक्षा होगी और नाड़ियाँ के अवरोध (ब्लाँकेज) भी खुल जायेंगे |

>> १० मिनट विधिवत शवासन करने से या जीभ के अग्रभाग को दाँतो से थोडा दबाकर १० मिनट तक ज्ञान मुद्रा लगा के बैठने से शारीरिक-मानसिक तनाव व अनिद्रा आदि की बीमारी दूर होती है |

>> बच्चों को पढ़ा हुआ याद नहीं रहता है तो प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दें, ५ – ७ तुलसी के पत्ते खाकर आधा गिलास पानी पियें, जीभ तालू में लगा के पढ़ें, कमर सीधी रख के बैठे, बुद्धि व मेधाशक्तिवर्धक प्रयोग आदि करें |

>> व्यवस्थित सुखासन में (पलथी मार के ) बैठकर ही भोजन करना चाहिए | खड़े हो के भोजन करना व पानी पीना हानिकारक है | बैठकर और चुस्की लेते हुए पानी पिये |

>> धुप में नंगे सिर नही टहलना चाहिए | इससे आँख, नाक, कान व ज्ञानतंतुओं (स्मरणशक्ति) आदि की कार्यक्षमता को बहुत नुकसान होता है |

>> रात को सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ करके ही सोना चाहिए अन्यथा सिरदर्द, तनाव, चिंता पीछा नहीं छोंड़ेंगे |

>> घर में लड़ाई – झगड़े ज्यादा होते हों तो ‘हे प्रभु ! आनंददाता ...’ प्रार्थना पुरे परिवारसहित एक साथ बैठकर करें | (आश्रम के पुस्तक ‘हम भारत के लाल है’ पृष्ठ – ५७ )

>> एकादशी के दिन भूलकर भी चावल नहीं खायें, न किसीको खिलायें, अन्न भी नहीं खायें, न खिलायें | फल, दूध या छाछ, नींबू – शिंकजी पी सकते है | उपवास में उपयोग की जानेवाली सब्जियाँ ले सकते हैं |

>> सिर पर बाजारू शैम्पू – साबुन लगाने से ज्ञानतंतु कमजोर होते हैं | बालों की जड़ें भी कमजोर होती हैं व बाल झड़ते हैं | आँवले का रस लगाने से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं एवं उनका झड़ना बंद हो जाता है | मुलतानी मिटटी या सप्तधान्य उबटन से स्नान साबुन व शैम्पू से १०० गुना हितकारी है |

                                                                                              - लोककल्याणसेतु – जून – २०१५ से

आरती में कपूर का उपयोग


कपूर – दहन में बाह्य वातावरण को शुद्ध करने की अदभुत क्षमता है | इसमें जीवाणुओं, विषाणुओं तथा सूक्ष्मतर हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने की शक्ति है | घर में नित्य कपूर जलाने से घर का वातावरण शुद्ध रहता है, शरीर पर बीमारियों का आक्रमण आसानी से नहीं होता, दु:स्वप्न नहीं आते और देवदोष तथा पितृदोषों का शमन होता है |

                                                                                       लोककल्याणसेतु – जून – २०१५ से

Wednesday, April 15, 2015

एलोवेरा जेल

लाभ : यह त्वचा को मुलायम व कोमल बनाकर उसमें निखार लाता हैं तथा अल्ट्रावाँयलेट किरणों के प्रदुषण व त्वचा-उत्तेजकोण आदि से होनेवाले हानिकारक प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करता हैं | इसके उपयोग से किल-मुँहासे, काले दाग-धब्बे, निशान, दरारें व झुरियों से रक्षा होती हैं | यह रुखी और तैलीय त्वचा – दोनों के लिए उपयोगी हैं |
 
  त्वचा को पानी से धोने के बाद हलके हाथों से लगायें |

(सभी संत श्री आशारामजी आश्रम व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध )

 लोककल्याणसेतु – मार्च – २०१५ से

गर्मी में विशेष लाभकारी – पुदीना

पुदीना गर्मियों में विशेष उपयोगी एक सुगंधित औषध है | यह रुचिकर, पचने में हलका, तीक्ष्ण, ह्रदय-उत्तेजक, विकृत कफ हो बाहर लानेवाला, गर्भाशय-संकोचक बी चित्त को प्रसन्न करनेवाला हैं | पुदीने के सेवन से भूख खुलकर लगती है और वायु का शमन होता हैं | यह पेट के विकारों में विशेष लाभकारी है | श्वास, मुत्राल्पता तथा त्वचा के रोगों में भी यह उपयुक्त हैं |

औषधि प्रयोग

१] पेट के रोग : अपच, अजीर्ण, अरुचि, मंदाग्नि, अफरा, पेचिश, पेट में मरोड़, अतिसार, उलटियाँ, खट्टी डकारें आदि में पुदीने के रस में जीरे का चूर्ण व आधे नींबू का रस मिलाकर पीने से लाभ होता है |

२] मासिक धर्म : पुदीने को उबालकर पीने से मासिक धर्म की पीड़ा तथा अल्प मासिक स्राव में लाभ होता हैं | अधिक मासिक स्त्राव में यह प्रयोग न करें |

३] गर्मियों में : गर्मी के कारण व्याकुलता बढने पर एक गिलास ठंडे पानी में पुदीने का रस तथा मिश्री मिलाकर पीने से शीतलता आती है |

४] पाचक चटनी :
ताजा पुदीना, काली मिर्च, अदरक, सेंधा नमक, काली द्राक्ष और जीरा – इन सबकी चटनी बनाकर उसमें नींबू का रस निचोड़कर खाने ने रूचि उत्पन्न होती है, वायु दूर होकर पाचनशक्ति तेज होती है | पेट के अन्य रोगों में भी लाभकारी है |

५] उलटी-दस्त, हैजा : पुदीने के रस में नींबू का रस, अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है |

६] सिरदर्द : पुदीना पीसकर ललाट पर लेप करें तथा पुदीने का शरबत पियें |

७] ज्वर आदि : गर्मी में जुकाम, खाँसी व् ज्वर होने पर पुदीना उबाल के पीने से लाभ होता हैं |

८] नकसीर : नाक में पुदीने के रस की ३ बूँद डालने से रक्तस्त्राव बंद हो जाता हैं |

९] मूत्र-अवरोध : पुदीने के पत्ते और मिश्री पीसकर १ गिलास ठंडे पानी में मिलाकर पियें |

१०] गर्मी की फुंसियाँ : समान मात्रा में सूखा पुदीना एंव मिश्री पीसकर रख लें | रोज प्रात: आधा गिलास पानी में ४ चम्मच मिलाकर पियें |

११] हिचकी :पुदीने या नींबू के रस-सेवन से राहत मिलती हैं |

मात्रा : रस -५ से २०० मि.ली.| अर्क – १० से २० मि.ली. (उपरोक्त प्रयोगों में पुदीना रस की जगह अर्क का भी उपयोग किया जा सकता है ) | पत्तों का चूर्ण – २ से ४ ग्राम (चूर्ण बनाने के लिए पत्तों का छाया में सुखाना चाहिये ) |

- लोककल्याणसेतु – मार्च – २०१५ से

Tuesday, March 24, 2015

स्वाइन फ्लू से सुरक्षा

स्वाइन फ्लू एक संक्रामक बीमारी हैं, जो श्वसन-तंत्र को प्रभावित करती है |

लक्षण – नाक ज्यादा बहना, ठंठ लगना, गला खराब होना, मांसपेशियों में दर्द, बहुत ज्यादा थकान, तेज सिरदर्द, लगातार खाँसी, दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ना आदि |

सावधानियाँ –


- लोगों से हाथ-मिलाने, गले लगाने आदि से बचें | अधिक भीडवाले थिएटर जैसे बंद स्थानों पर जाने से बचें |

- बिना धुले हाथों से आँख, नाक या मुँह छूने से परहेज करें |

- जिनकी रोगप्रतिकारक क्षमता कम हो उन्हें विशेष सावधान रहना चाहिए |

- जब भी खाँसी या छींक आये तो रुमाल आदि का उपयोग करें |

स्वाइन फ्लू से कैसे बचें ?


यह बीमारी हो तो इलाज से कुछ ही दोनों में ठीक हो सकती है, दरें नहीं | प्रतिरक्षा व श्वसन तन्त्र को मजबूत बनायें व इलाज करें |

पूज्य बापूजी द्वारा बतायी गयी जैविक दिनचर्या से प्रतिरक्षा तन्त्र मजबूत होता है | सुबह 3 से 5 बजे के बीच में किये गये प्राणायाम से श्वसन तन्त्र विशेष बलशाली बनता है | घर में गौ-सेवा फिनायल से पोछा लगाये व् गौ-चन्दन धूपबत्ती पर गाय का घी, डाल के धुप करें | कपूर भी जलाये | इससे घर का वातावरण शक्तिशाली बनेगा | बासी, फ्रिज में रखी चीजें व बाहर के खाने से बचें | खुलकर भूख लगने पर ही खायें | सूर्यस्नान, सूर्यनमस्कार, आसन प्रतिदिन करें | कपूर, इलायची व तुलसी के पत्तो को पतले कपड़े में बाँधकर बार-बार सूंघें | तुलसी के 5 - 7 पत्ते रोज खायें | आश्रमनिर्मित होमियों तुलसी गोलियाँ, तुलसी अर्क, संजीवनी गोली से रोगप्रतिकारक क्षमता बढती है |

कुछ वर्ष पहले जब स्वाइन फ्लू फैला था, तब पूज्य बापूजी ने इसके बचाव का उपाय बताया था : ‘ नीम की 21 डंठलियाँ (जिनमें पत्तियाँ लगती हैं, पत्तियाँ हटा दें ) व 4 काली मिर्च पानी डालकर पीस लें और छान के पिला दें | बच्चा हैं तो 7 डंठलियाँ व सवा काली मिर्च दें |’

स्वाइन फ्लू से बचाव के कुछ अन्य उपाय

- 5 – 7 तुलसी पत्ते, 10 - 12 नीमपत्ते, 2 लौंग, 1 ग्राम दालचीनी चूर्ण, 2 ग्राम हल्दी, 200 मि.ली. पानी में डालकर उबलने हेतु रख दें | उसमें 4 - 5 गिलोय की डंडियाँ कुचलकर डाल दें अथवा 2 से 4 ग्राम गिलोय चूर्ण मिलाये | 50 मि.ली. पानी शेष रहने पर छानकर पिये | यह प्रयोग दिन में 2 बार करें | बच्चों को इसकी आधी मात्रा दें |

- दो बूँद तेल नाक के दोनों नथुनों के भीतर ऊँगली से लगाये | इससे नाक की झिल्ली के ऊपर तेल की महीन परत बन जाती हैं, जो एक सुरक्षा-कवच की तरह कार्य करती हैं, जिससे कोई भी विषाणु, जीवाणु तथा धुल-मिटटी आदि के कण नाक की झिल्ली को संक्रमित नहीं कर पायेंगे |

- स्वाइन फ्लू के लिए विशेष रूप से बनायी गयी आयुर्वेदिक औषधी (सुरक्षा चूर्ण व सुरक्षा वटी) संत श्री आशारामजी औषधी केन्द्रों पर उपलब्ध हैं | सम्पर्क करें : 09227033056

- स्वाइन फ्लू से बचाव की होमियोपैथिक दवाई हेतु सम्पर्क करे : 09541704923

(यदि किसी को स्पष्ट रूपसे रोग के लक्षण दिखाई दें तो वैद्य या डॉक्टर से सलाह लें |)

- ऋषिप्रसाद – मार्च – २०१५ से

शंखपुष्पी सिरप - त्रिफला चूर्ण

शंखपुष्पी सिरप

लाभ – चक्कर आना, थकावट अनुभव करना, मानसिक तनाव, सहनशक्ति का अभाव, चिडचिडापन, निद्रल्पता, मन की अशांति तथा उच्च रक्तचाप आदि रोगों में लाभप्रद स्मरणशक्ति बढाने हेतु एक दिव्य औषधि |

त्रिफला चूर्ण

लाभ – आँखों की सुजन, लालिमा, दृष्टिमांद्य, कब्ज, मधुमेह, मूत्ररोग, त्वचा-विकार, जीर्णज्वर व पीलिया में लाभदायक |

सभी संत श्री अशारामजी आश्रमों व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |

- ऋषिप्रसाद – मार्च – २०१५ से

वसंत ऋतू में बीमारीयों से सुरक्षा

वसंत ऋतू में शरीर में संचित कफ पिघल जाता है | अत: इस ऋतू में कफ बढानेवाले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए | दिन में सोने से भी कफ बढ़ता है | इस ऋतू में नमक का कम उपयोग स्वास्थ्य के लिए हितकारी है | तुलसी-पत्ते व गोमूत्र के सेवन एवं सूर्यस्नान से कफ का शमन होता है | मुँह में कफ आने पर उसे अंदर न निगलें | कफ निकालने के लिए जलनेति, गजकरणी का प्रयोग कर सकते हैं | (देखें आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘योगासन’, पृष्ठ 43, 44 )

वसंत ऋतू में सर्दी-खाँसी, गले की तकलीफ, दमा, बुखार, पाचन की गडबडी, मंदाग्नि, उलटी-दस्त आदि बीमारियाँ अधिकांशत: देखने को मिलती हैं | नीचे कुछ सरल घरेलू उपाय दिये जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आसानी से इन रोगों से छुटकारा पाया जा सकता हैं |

मंदाग्नि :
10 – 10 ग्राम सौंठ, कालीमिर्च, पीपर व सेंधा नमक – सभी को कूटकर चूर्ण बना लें | इसमें 400 ग्राम काली द्राक्ष (बीज निकाली हुई) मिलायें और चटनी की तरह पीस के काँच के बर्तन में भरकर रख दें | लगभग 5 ग्राम सुवह-शाम खाने से भूख खुलकर लगती है |

कफ, खाँसी और दमा : 4 चम्मच अडूसे के पत्तों के ताजे रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 2 बार खाली पेट लें | (रस के स्थान पर अडूसा अर्क समभाग पानी मिलाकर उपयोग कर सकते हैं | यह आश्रम व समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |) खाँसी, दमा, क्षयरोग आदि कफजन्य तकलीफों में यह उपयोगी है | इनमें गोझरण वटी भी अत्यंत उपयोगी हैं | आश्रमनिर्मित गोझरण वटी की 2 से ४ गोलियाँ दिन में 2 बार पानी के साथ लेने से कफ का शमन होता हैं तथा कफ व वायुजन्य तकलीफों में लाभ होता हैं |

दस्त :
इसबगोल में दही मिलाकर लेने से लाभ होता है | अथवा मूँग की दाल की खिचड़ी में देशी घी अच्छी मात्रा में डालकर खाने से पानी जैसे पतले दस्त में फायदा होता है |

दमे का दौरा : अ] साँस फूलने पर २० मि.ली.तिल का तेल गुनगुना करके पीने से तुरंत राहत मिलती हैं |

आ] सरसों के तेल में थोडा-सा कपूर मिलाकर पीठ पर मालिश करें | इससे बलगम पिघलकर बाहर आ जायेगा और साँस लेने में आसानी होती है |

इ] उबलते हुए पानी में अजवायन डालकर भाप सुंघाने से श्वास-नलियाँ खुलती हैं और राहत मिलती है |

- ऋषिप्रसाद – मार्च – २०१५ से

मंडूकासन

इस आसन में शरीर मंडूक (मेढ़क) जैसा दिखता है | अत: इसे मंडूकासन कहते हैं |

लाभ : १] प्राण और अपान की एकता होती है | वायु-विकारवालों के लिए यह आसन रामबाण के समान है | यह आसन ऊर्ध्व वायु और अधोवायु का निष्कासन करता है |

२] पेट के अधिकांश रोगों में लाभप्रद है व तोंद कम होती है | अतिरिक्त चरबी दूर होती है |

३] मधुमेह में विशेष लाभ होता है |

४] रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है |

५] पंजों को बल मिलता हैं और उछलने की क्षमता बढती है |

६] शरीर में हलकापन व आराम महसूस होता है |

७] जोड़ों व घुटनों के दर्द में राहत होती है |

विशेष :
जो सामान्य (13 से 15 प्रति मिनट) से ज्यादा श्वास लेते हों, उनको यह आसन अवश्य करना चाहिये |

विधि : दोनों पैरों को पीछे की तरफ मोडकर (वज्रासन में ) बोथे | घुटनों को आपस में मिलाएं | हथेलियों को एक के ऊपर एक रखकर नाभि पर इसप्रकार रखें कि दायें हाथ की हथेली ठीक नाभि पर आये | फिर श्वास छोड़ते हुए शरीर को आगे की और झुकाये और सीने को घुटनों से लगाये | सिर उठाकर दृष्टि सामने रखें | 4 – 5 सेंकड इसी स्थिति में रुकें, फिर श्वास भरते हुए वज्रासन की स्थिति में आए | 3 – 4 बार यह प्रक्रिया दोहराये |

                                                                                                             ऋषिप्रसाद – मार्च – २०१५ से