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Monday, April 8, 2019

प्राकृतिक नियमों का करें पालन, बना रहेगा स्वस्थ जीवन ( भाग २)


५] बैठने – चलने का सही ढंग : गलत ढंग से बैठने, खड़े होने या चलने से हमारी कार्यक्षमता व जीवनीशक्ति की हानि होती है | अत: इस संदर्भ में कुछ बातों का ध्यान रखें :
ü दोनों नितम्ब बैठनेवाले स्थान पर समानरूप से रखने चाहिए |
ü रीढ़ की हड्डी अपने प्राकृतिक झुकावोंसहित सीधी रहनी चाहिए | इससे शरीर की सभी नस-नाड़ियाँ, जो शरीर के सभी भागों को शक्ति देती हैं, वे अच्छी तरह से कार्य करती है | मेरुदंड सीधा नहीं रखने से इन नाड़ियों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है | इसका बुरा प्रभाव शरीर के अन्य अंगो पर पड़ता है और वे सामान्यरूप से कार्य नहीं करते हैं | जब शरीर सीधा रखा जाता है तो छाती उभरी रहती है | इसके गोलाकार और फैले रहने से ह्रदय और फेफड़ों के के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है, जिससे वे अपनी पूरी कार्यक्षमता से कार्य कर पाते हैं |
ü सिर को ऐसी सीधी स्थिति में रखना चाहिए कि गर्दन के आगे और पीछे के भाग की मांसपेशियाँ दबाव या तनाव रहित रहें |

६] आवेगों को न रोकें : कक्षा में पढ़ते समय कई विद्यार्थी मल-मूत्र के आवेगों को रोके रखते हैं | अधिक समय तक मल को रोकने से वह सड़ने लगता है तथा आगे चलकर उसका निष्कासन करनेवाले अंग दुर्बल हो जाते हैं और निष्कासन-समय होने पर भी हमें संकेत नहीं दे पाते, जिससे कब्ज, पेट के रोग, कृमि, जोड़ों का दर्द, सिरदर्द, यकृत व गुर्दों के रोग जैसी अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं | शौच आदि से निवृत्त होकर ही विद्यालय या कार्यालय जायें तथा मल-मूत्र को न रोकें |

७] ब्रह्मचर्य – पालन : जिन्हें बल, बुद्धि, स्वास्थ्य, एकाग्रता व प्रसन्नता चाहिए हो, उन्नत जीवन जीना हो तथा जीवन के महानतम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति करना हो, उन्हें वीर्यक्षय न हो इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए | जो फ़िल्में, सीरियल, अश्लील वेबसाइट्स देखते हैं, कामोत्तेजक साहित्य पढ़ते हैं, लडकियाँ लडकों से व मजाक या स्पर्श करते हैं वे उपरोक्त बातों में सफल नहीं हो पाते और पतन, तबाही के शिकार हो जाते हैं | उनका जीवन ओज-तेजहीन, उत्साह व शक्ति हीन होने लगता है तथा नपुंसकता की तरफ घसीटा जाता है | अत: ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ पुस्तक का नित्य पठन कर ब्रह्मचर्य का दृढ़ता से पालन करें |

८] जैविक घड़ी पर आधारित दिनचर्या : अच्छे स्वास्थ्य की उत्तम कुंजी है जैविक घड़ी पर आधारित दिनचर्या | इसके अंतर्गत प्रात: ३ से ५ बजे के बीच प्राणायम, ५ से ७ के बीच मलत्याग, ७ से ९ के बीच सम्भव हो तो दूध ( भोजन से २ घंटे पूर्व) या फलों के रस का सेवन, ९ से ११ के बीच भोजन, शाम ५ से ७ के बीच भोजन, रात्रि ७ से ९ के बीच अध्ययन तथा ९ से ३ बजे तक नींद लेना विशेष लाभकारी है | पूज्य बापूजी द्वारा बतायी गयी यह दिनचर्या सर्वांगीण विकास में बहुत सहायक है |

ऋषिप्रसाद – अप्रैल २०१९ से   


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