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Thursday, February 7, 2019

महिलाओं की समस्याओं में चमत्कारी बीजमंत्र


‘थं’ बीजमंत्र मासिक धर्म को सुनियंत्रित करता है | इससे अनियमित तथा अधिक मासिक स्त्राव में राहत मिलती है | महिलाएँ मासिक स्त्राव की तकलीफों से छुटकारा पाने के लिए हार्मोन्स की जो गोलियाँ लेती हैं, वे होनेवाली सन्तान में विकृति तथा गर्भाशय के अनेक विकार उत्पन्न करती हैं | 

उनके लिए भगवान एक प्रसाद है यह ‘थं’ बीजमंत्र | मासिक धर्म के अत्यधिक रक्तस्त्राव में भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ है |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०१९ से

स्वास्थ्य प्रसाद – पूज्य बापूजी


१] कइयों को सिर में दर्द रहता है तो क्या करें ? - देशी गाय के घी में कपूर घिस के माथे पर थोडा लगा लें व जरा सूँघे तो पित्तजन्य सिरदर्द छू !

२] जिन बच्चों को सर्दी हो जाती है, नाक बहती रहती है – उन्हें सुबह खाली पेट थोडा गुनगुना पानी पिलाओ दो–पाँच–दस दिन | नाक बहने की तकलीफ, सर्दी, खाँसी भाग जायेगी |  
दूसरा भी उपाय है – १० ग्राम लहसुन कूट के उसकी चटनी बना लों और उसमें ५० ग्राम शहद मिला दो | इसे सर्दियों में या ऋतू-परिवर्तन के दिनों में जब खाँसी आये या नाक बहे, बच्चों की भूख कम हो जाय तो बालक की उम्र के हिसाब से एक-दो ग्राम से लेकर पाँच – सात – दस ग्राम तक चटायें | इससे भूख खुलकर लगेगी, सर्दी भाग जायेगी, नाक बहना भी ठीक हो जायेगा |

ऋषिप्रसाद –फरवरी २०१९ से

त्वचा के उत्तम स्वास्थ्य के लिए ....


क्या करें
१] त्वचा स्वस्थ रखने हेतु शुद्ध वायु व प्रकाश का सेवन, पर्याप्त जल पीना और गहरे श्वास लेने चाहिए तथा मानसिक तनाव व चिंता से बचना चाहिए |
२] नियमित शरीर की मालिश करने से शरीर में रक्त व प्राण का संचार ठीक होने से त्वचा के दोष दूर होते हैं |
३] त्वचा-रोग का एक कारण कब्ज भी है | इसके निवारण हेतु रात को त्रिफला, हरड या हिंगादि हरड चूर्ण पानी के साथ लें |
४] स्नान के लिए सप्तधान्य उबटन, मुलतानी मिटटी अथवा देशी गाय के गोबर व गोमूत्र या गोमूत्र अर्क के मिश्रण का उपयोग करें |

क्या न करें
१] अधिक मीठे, खट्टे, तीखे, मिर्च-मसालेदार, तले हुए, अधिक नमक व विरुद्ध आहार के सेवन से बचें | चाय-कॉफ़ी तथा नशीली वस्तुओं से दूर रहें |
२] ज्यादा धूप से बचें | गीले, अधिक तंग व नायलॉन के कपड़े तथा प्लास्टिक के जूतों का उपयोग न करें |
३] चर्मरोगी के कपड़े एवं उसकी उपयोग की गयी चीजों का उपयोग न करें |
४] क्रोध, घृणा, ईर्ष्या आदि से रक्त-विकार होने से भी त्वचा-रोग होते हैं | इनसे बचने हेतु सत्संग-श्रवण, जप, आत्मविचार, सदाचार का अवलम्बन लें |

सप्तधान्य उबटन, मुलतानी मिटटी, त्रिफला, हरड व हिंगादि हरड चूर्ण एवं गोमूत्र अर्क समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |
ऋषिप्रसाद – फरवरी २०१९ से

वसंत ऋतू की बीमारियों में फायदेमंद औषधियाँ (वसंत ऋतू : १८ फरवरी से १९ अप्रैल तक )



सर्दी-जुकाम के लिए :
१] तुलसी अर्क : ३ – ३ चम्मच सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें |
२] योगी आयु तेल : २ – २ बूँद सुबह-शाम नाक में डालें |
३] अमृत द्रव : २ -३ बूँद १ कप गुनगुने पानी से सेवन करें |

खाँसी के लिए :
१] सितोपलादि चूर्ण : १ – १ चम्मच सुबह-शाम शहद के साथ लें |
२] कफ सिरप : ३ – ३ चम्मच सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें |

खुजली आदि चर्मरोगों के लिए :
१] नीम अर्क : ३ – ३ चम्मच सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें |
२] घृतकुमारी रस (अलोवेरा ज्यूस)  : ३ – ३ चम्मच सुबह-शाम लें |  
३] लीवर टॉनिक टेबलेट : २ – २ गोली सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें |
४] अच्युताय मलहम : त्वचा के प्रभावित अंग पर लगायें |

उपरोक्त औषधियों हेतु प्राप्ति-स्थान : सत्साहित्य सेवाकेन्द्र व आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्र |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०१९ से

अनेक रोगों में लाभदायी बिना खर्च का प्रयोग : जलनेति


लाभ : नियमपूर्वक जलनेति करने से –
१] आँखों की रोशनी बढती है | चश्मे की जरूरत नहीं पडती | चश्मा हो भी तो धीरे-धीरे नम्बर कम होकर छूट भी जाता है |
२] श्वासोच्छ्वास का मार्ग साफ़ होता है |
३] मस्तिष्क में ताजगी रहती है |
४] चित्त में प्रसन्नता बनी रहती है |
५] दमा, टी.बी., खाँसी, नकसीर, बहरापन आदि छोटी-मोटी असंख्य बीमारियों में लाभ होता है | सर्दी-जुकाम होने के अवसर कम होते हैं |

विधि : एक लीटर पानी को गुनगुना कर उसमें करीब १० ग्राम शुद्ध नमक घोल दें | सेंधा नमक मिले तो अच्छा है | सुबह स्नान के बाद यह पानी चौड़े मुँहवाले पात्र या कटोरे में लेकर पंजो के बल बैठें | पात्र को दोनों हाथों से पकड़कर नथुने पानी में डुबा दें | अब धीरे-धीरे नाक के द्वारा पानी को भीतर खींचे और मुँह से बाहर निकालते जायें | नाक को पानी में इस प्रकार डुबोये रखें कि भीतर जानेवाले पानी के साथ हवा प्रवेश न करे अन्यथा खाँसी आयेगी | इस प्रकार पात्र का सब पानी नाक द्वारा लेकर मुख द्वारा बाहर निकाल दें | अब दोनों पैर थोड़े खुले रख के खड़े हो जायें | दोनों हाथ कमर पर रख के भस्त्रिका करते हुए अर्थात श्वास को जोर से बाहर निकालते हुए आगे की ओर जितना हो सके उतना झुकें | यह क्रिया बार-बार करें, इससे नाक के भीतर का सब पानी बाहर निकल जायेगा | थोडा-बहुत रह भी जाय और दिन में कभी भी नाक से बाहर निकल आये तो कुछ चिंताजनक नहीं है |

नाक से पानी भीतर खींचने की यह क्रिया प्रारम्भ में उलझन जैसी लगेगी लेकिन अभ्यास हो जाने पर बिल्कुल सरल बन जायेगी |

ऋषिप्रसाद –फरवरी २०१९ से

प्राकृतिक शुद्धिकारक व स्वास्थ्यवर्धक मूली


आयुर्वेद के अनुसार ताज़ी, कोमल, छोटी मूली रुचिकारक, भूखवर्धक, त्रिदोषशामक, पचने में हलकी, तीखी, ह्रदय के लिए हितकर तथा गले के रोगों में लाभदायी है | यह उत्तम पाचक, मल-मूत्र की रुकावट को दूर करनेवाली व कंठशुद्धिकर है | बड़ी, पुरानी मूली पचने में भारी, उष्ण, रुक्ष और त्रिदोषकारक होती है | मूली के पत्ते व बीज भी औषधीय गुणों से युक्त होते हैं |

आधुनिक अनुसंधानानुसार मूली में कैल्शियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, मैग्नेशियम, मैंगनीज, लौह आदि खनिज पर्याप्त मात्रा में होने के साथ रेशे(fibres), विटामिन ‘सी’ तथा अन्य पोषक तत्त्व पाये जाते हैं |

मूली मधुमेह (diabetes) के रोगियों के लिए लाभदायी है | यह गुर्दों (kidneys) के स्वास्थ्य के लिए अच्छी रहती है और शरीर से विषैले तत्त्वों को निकालने में भी कारगर है | इसे कच्ची हल्दी के साथ खाने से बवासीर में लाभ होता है | इसका ताजा रस पीने से पथरी एवं मूत्रसंबंधी रोगों में राहत मिलती है |अफरा में मूली के पत्तों का रस विशेषरूप से उपयोगी होता है | इसके नियमित सेवनसे पुराना कब्ज दूर होता है |

पेट के लिए उत्तम
मूली पेट व यकृत के रोगों में बहुत लाभकारी है अत: इसे पेट व यकृत हेतु सबसे अच्छा ‘प्राकृतिक शुद्धिकारक’ माना गया है | अधिक मात्रा में रेशे होने से यह मल को मुलायम करने और पाचनक्रिया को बढ़िया रखने में मदद करती है |
  • मूली व उसके पत्ते, खीरा या ककड़ी व टमाटर काट लें | इसमें नमक, काली मिर्च का चूर्ण व नींबू मिला के खायें | इससे पाचन-संबंधी अनेक समस्याओं तथा कब्ज में लाभ होता है |

औषधीय प्रयोग
१] पेशाब व शौच की समस्या : मूली के पत्तों का २०-४० मि.ली. रस सुबह-शाम सेवन करने से शौच साफ़ आता है और पेशाब खुलकर आता है, इससे वजन घटाने में मदद मिलती है |

२] पेट के रोग : मूली के ५० मि.ली. रस में अदरक का आधा चम्मच व नींबू का २ चम्मच रस मिलाकर नियमित पीने से भूख बढ़ती है | पेट में भारीपन महसूस हो रहा हो तो  मूली के १५-२० मि.ली. रस में नमक मिला के पीने से लाभ होता है |

३] पथरी : बार-बार पथरी होने की समस्या में मूली के पत्तों के ५० मि.ली. रस में १ चम्मच धनिया-चूर्ण मिला के लगातार ३ महीने लेने से पथरी होने की सम्भावना नहीं रहती है | साथ में पथ्य-पालन आवश्यक है |

४] सूजन : मूली के १-२ ग्राम बीज का ५ ग्राम तिल के साथ दिन में २ बार सेवन करने से सभी प्रकार की सूजन में लाभ होता है |

सावधानी : छोटी, पतली व कोमल मूली का ही सेवन करना चाहिए | मोटी, पकी हुई मूली नहीं खानी चाहिए | इसे रात में व दूध के साथ नहीं खाना चाहिए | माघ मॉस में ( २१ जनवरी से १९ फरवरी २०१९ तक ) मूली खाना वर्जित है |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०१९ से

शिवरात्रि का व्रत की ३ महत्त्वपूर्ण बातें

महाशिवरात्रि वस्त्र-अलंकार से इस देह को सजाने का, मेवा-मिठाई खाकर जीभ को मजा दिलाने का पर्व नहीं है | यह देह से परे देहातीत आत्मा में आत्मविश्रांति पाने का पर्व है, संयम और तप बढ़ाने का पर्व है | महाशिवरात्रि का व्रत ठीक से किया जाय तो अश्वमेध यज्ञ का फल होता है | इस व्रत में ३ बातें होती है :

१] उपवास : ‘उप’ माने समीप | आप शिव के समीप, कल्याणस्वरूप अन्तर्यामी परमात्मा के समीप आने की कोशिश कीजिये, ध्यान कीजिये | महाशिवरात्रि के दिन अन्न-जल या अन्न नहीं लेते हैं | इससे अन्न पचाने में जो जीवनशक्ति खर्च होती है वह बच जाती है | उसको ध्यान में लगा दें | इससे शरीर भी तंदुरुस्त रहेगा |

२] पूजन : आपका जो व्यवहार है वह भगवान के लिए करिये, अपने अहं या विकार को पोसने के लिए नहीं | शरीर को तंदुरुस्त रखने हेतु खाइये और उसकी करने की शक्ति का सदुपयोग करने के लिए व्यवहार कीजिये, भोग भोगने के लिए नहीं | योगेश्वर से मिलने के लिए आप व्यवहार करेंगे तो आपका व्यवहार पूजन हो जायेगा |
महाशिवरात्रि हमें सावधान करती हैं कि आप जो भी कार्य करें वह भगवत हेतु करेंगे तो भगवान की पूजा हो जायेगी |
३] जागरण : आप जागते रहें | जब ‘मैं’ और ‘मेरे’ का भाव आये तो सोच लेना कि ‘यह मन का खेल है |’ मन के विचारों को देखना | क्रोध आये तो जागना कि ‘क्रोध आया है |’ तो क्रोध आपका खून या खाना खराब नहीं करेगा | काम आया और जग गये कि ‘यह कामविकार आया है |’ तुरंत आपने हाथ-पैर धो लिये, रामजी का चिन्तन किया, कभी नाभि तक पानी में बैठ गये तो कामविकार में इतना सत्यानाश नहीं होगा |

आप जगेंगे तो उसका भी भला होगा, आपका भी भला होगा | तो जीवन में जागृति की जरूरत है |

ऋषिप्रसाद – फरवरी २०१९ से 

Thursday, January 31, 2019

पुण्यदायी तिथियाँ



१३ फरवरी : बुधवारी अष्टमी (सूर्योदय से दोपहर ३-४७ तक), विष्णुपदी संक्रांति ( पुण्यकाल : सूर्योदय से सुबह ८-५० तक ) (ध्यान, जप आदि का लाख गुना फल )

१६ फरवरी : जया एकादशी (व्रत से ब्रह्महत्यातुल्य पाप व पिशाचत्व नाश )

१७ फरवरी : रविपुष्यामृत योग (शाम ४-४६ से १८ फरवरी सूर्योदय तक), माघ शुक्ल त्रयोदशी इसी दिन से माघी पूर्णिमा (१९ फरवरी) तक स्नान, दान, व्रत आदि पुण्यकर्म करने से सम्पूर्ण माघ स्नान का फल

२ मार्च : विजया एकादशी (व्रत से इस लोक में विजयप्राप्ति और परलोक अक्षय बना रहता है )

४ मार्च : महाशिवरात्रि व्रत, रात्रि-जागरण, शिव-पूजन (निशीथकाल: रात्रि १२-२६ से १-१५ तक)

लोककल्याणसेतु – जनवरी २०१९ से   

Wednesday, January 30, 2019

फलों और सब्जी के छिलकों को व्यर्थ न समझें



प्राय: साग-सब्जियों और फलों का उपयोग करते समय उनके छिलकों को बेकार समझकर फेंक दिया जाता है लेकिन छिलकों में कई चमत्कारिक गुण छिपे होते हैं | इन्हें कई रोगों को दूर करने के साथ-साथ सौंदर्य को निखारने में व अन्य प्रकार से उपयोग में लिया जा सकता है |

१] नीबू के छिलके : इनमें मौजूद अम्ल त्वचा की सफाई करता है व चमक और कोमलता को बढ़ाने में मदद करता है | इन्हें दाँतों पर मलने से दाँत चमकदार होते हैं और मसूड़े मजबूत बनते हैं | नींबू छिलकेसहित खाने पर कैंसर नहीं होता |



२] संतरे के छिलके : इनको सुखाकर खूब महीन चूर्ण बना लें | इसे दाँतों पर घिसने से दाँत चमकदार बनते हैं | यह चूर्ण कच्चे दूध व हल्दी में मिलाकर चेहरे पर लगाने से मुँहासों व धब्बों का नाश होता है और त्वचा चमक उठती है | संतरे के छिलकों में रेशे होने के कारण ये कब्ज को दूर करने में मदद करते हैं |


३] अनार के छिलके : अनार के सूखे छिलके बारीक पीस के रख लें | अधिक मासिक स्राव ने एक चम्मच चूर्ण पानी के साथ लेने से रक्तस्त्राव कम होगा | इसमें दही मिला के गाढ़ा अवलेह (paste) बनाकर सिर पर मलने से बाल मुलायम होते हैं व रुसी से भी छुटकारा मिलता है | अनार का छिलका मुँह में डालकर चूसने से खाँसी में लाभ होता है | इसका चूर्ण नागकेसर के साथ लेने से बवासीर का रक्तस्त्राव बंद होता है |

४] पपीते के छिलके : इन्हें छाया में सुखा के महीन चूर्ण बना लें | इसे ग्लिसरीन में मिला के चेहरे पर लगाने से त्वचा की रुक्षता दूर होती है |




५] खीरे के छिलके : इनमें पाये जानेवाले अघुलनशील रेशे पाचनतंत्र के लिए अच्छे होते हैं तथा कब्ज की समस्या को दूर करने में मदद करते हैं | छिलकों को सुखाकर बनाये गये चूर्ण में नींबू की कुछ बूँदे मिला के अवलेह बना लें | इसे एलोवेरा जेल के साथ मिला के त्वचा पर लगायें | इससे त्वचा में निखार आता है | (एलोवेरा जेल सत्साहित्य सेवाकेन्द्रों एवं संत श्री आशारामजी आश्रम की समितियों के सेवाकेन्द्रों पर उपलब्ध हैं |)

६] आलू के छिलके : जलने पर आलू का छिलका लगाने से शीघ्र राहत मिलती है | आँखों के नीचे का कालापन हटाने हेतु ककड़ी की फाँक और आलू के छिलकों को बारी-बारी से कालिमावाले स्थान पर रगड़ें |
- शरीर का कोई अंग जल जाय तो जले हुए स्थान पर तुरंत कच्चे आलू का रस लगाना व उसके पतले टुकड़े (कटे चिप्स) रखना पर्याप्त है | इससे न फोड़ा होगा, न मवाद बनेगा, न ही मलहम या अन्य औषधियों की आवश्यकता होगी |

७] चीकू के छिलके : चीकू को बिना छिलके उतारे खायें | इससे पाचनतंत्र को फायदा होगा |





८] सेब के छिलके : इन छिलकों व इनके ठीक नीचेवाले गूदे में विटामिन ‘सी’ प्रचुर होता है | छिलकेयुक्त सेब को चबा-चबाकर खानेवाले को मसूड़ों से खून निकलने की बीमारी कभी नहीं होती | सेब के छिलके में विटामिन ‘ए’ गूदे की अपेक्षा ५ गुना अधिक होता है | अत: सेब का पूरा – पूरा लाभ उठाने के लिए चाकू आदि से उसके छिलके पर की जानेवाली मोम की पर्त उतारकर उसे छिलकेसहित खूब चबा-चबा के खायें |


लोककल्याणसेतु – जनवरी २०१९ से         

शास्त्रीय, वैज्ञानिक भारतीय व्यवस्था का एक प्रमाण : गोबर-लेपन


देशी गाय का गोबर शुद्धिकारक, पवित्र व मंगलकारी है | यह दुर्गन्धनाशक एवं सात्त्विकता व कांति वर्धक है | भारत में अनादि काल से गौ-गोबर का लेपन यज्ञ-मंडप, मंदिर आदि धार्मिक स्थलों पर तथा घरों में भी किया जाता रहा है |

भगवन श्रीकृष्ण कहते हैं :
सभी प्रपा गृहाश्चापि देवतायतनानि च |
शुध्यन्ति शकृता यासां किं भूतमधिकं तत: ||

‘जिनके गोबर से लीपने पर सभा-भवन, पौसले (प्याउएँ), घर और देव-मंदिर भी शुद्ध हो जाते हैं, उन गौओं से बढ़कर और कौन प्राणी हो सकता है ?’ (महाभारत, आश्वमेधिक पर्व)

मरणासन्न व्यक्ति को गोबर-लेपित भूमि पर लिटाने का रहस्य !                                      
मरणासन्न व्यक्ति को गोबर-लेपित भूमि पर लिटाये जाने की परम्परा हमारे भारतीय समाज में आपने-हमने देखी ही होगी | क्या आप जानते हैं कि इसका क्या कारण हैं ?

गरुड पुराण के अनुसार ‘गोबर से बिना लिपी हुई भूमि पर सुलाये गये मरणासन्न व्यक्ति में यक्ष, पिशाच एवं राक्षस कोटि के क्रूरकर्मी दुष्ट प्रविष्ट हो जाते हैं |’

वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अनुसंधानों का निष्कर्ष भी इस भारतीय परम्परा को स्वीकार करता है | अनुसंधानो के अनुसार गोबर में फॉस्फोरस पाया जाता है, जो अनेक संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को नष्ट कर देता है | मृत शरीर में कई प्रकार के संक्रामक रोगों के कीटाणु होते हैं | अत: उसके पास उपस्थित लोगों के स्वास्थ्य-संरक्षण हेतु भूमि पर गोबर-लेपन करना अनिवार्य माना | अत: उसके पास उपस्थित लोगों के स्वास्थ्य-संरक्षण हेतु भूमि पर गोबर-लेपन करना अनिवार्य माना गया है |

हानिकारक विकिरणों से रक्षा का उपाय
वर्तमान समय में वातावरण में हानिकारक विकिरण (radiations) फेंकनेवाले उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता जा रहा है | इन विकिरणों तथा आणविक प्रकल्पों व कारखानों एवं परमाणु हथियारों के प्रयोग से निकलनेवाले विकिरणों से सुरक्षित रहने का सहज व सरल उपाय भारतीय ऋषि-परम्परा के अंतर्गत चलनेवाली सामाजिक व्यवस्था में हर किसीको देखने को मिल सकता है |

इस बात को स्पष्ट करते हुए डॉ. उत्तम माहेश्वरी कहते हैं : “घर की बाहरी दीवार पर गोबर की मोटी पर्त का लेपन किया जाय तो वह पर्त हानिकारक विकिरणों को सोख लेती है, जिससे लोगों का शरीरिक-मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है |”

भारतीय सामजिक व्यवस्था संतो-महापुरुषों के सिद्धांतों के अनुसार स्थापित व प्रचलित होने से इसके हर एक क्रियाकलाप के पीछे सूक्ष्मातिसूक्ष्म रहस्य व उन महापुरुषों की व्यापक हित की भावना छुपी रहती है | विज्ञान तो उनकी सत्यता और महत्ता बाद में व धीमे-धीमे सिद्ध करता जायेगा और पूरी तो कभी जान ही नहीं पायेगा | इसलिए हमारे सूक्ष्मद्रष्टा, दिव्यदृष्टा महापुरुषों के वचनों पर, उनके रचित शास्त्रों-संहिताओं पर श्रद्धा करके स्वयं उनका अनुभव करना, लाभ उठाना ही हितकारी है |

लोककल्याणसेतु – जनवरी २०१९ से

सुप्तवज्रासन



लाभ: 
१] इस आसन का सबसे विशेष लाभ यह होता है कि अकेला यह आसन अँगूठे से सिरपर्यंत रक्त का संचार करके सम्पूर्ण शरीर को मजबूत बना देता है |
२] शरीर की थकान दूर होती है | मेरुदंड व कमर लचीले होते हैं तथा सीना चौड़ा होता है |
३] मस्तिष्क-नियन्त्रण में काफी मदद मिलती है |
४] शरीर के नाड़ी-जाल का केंद्र नाभि-स्थान ठीक रहता है |
५] सुषुम्ना नाड़ी का मार्ग अत्यंत सरल होता है | कुंडलिनी शक्ति सरलता से ऊर्ध्वगमन करती है | इस आसन में ध्यान करने से मेरुदंड को सीधा रखने का श्रम नहीं करना पड़ता और उसे आराम मिलता है |
६] सभी अंत:स्त्रावी ग्रंथियों को पुष्टि मिलती है, जिससे शारीरिक व आध्यात्मिक विकास सहज हो जाता है |
७] जठराग्नि प्रदीप्त होकर कब्ज की समस्या में फायदा होता है | कमर, घुटनों आदि का दर्द, धातुक्षय, लकवा, टी.बी., पथरी, बहरापन, तोतलापन, आँखों व स्मरणशक्ति की दुर्बलता आदि में लाभ होता है |
८] श्वास-संबंधी बीमारियों में बहुत ही लाभ होता है |
९] टॉन्सिलाइटिस आदि गले के रोगों में भी लाभदायी है |
१०] बचपन से ही इसका अभ्यास किया जाय तो दमे की बिमारी नहीं हो सकती |
११] पेट, कमर, नितम्ब का मोटापा कम होता है और शरीर आकर्षक बनता है |

विधि : वज्रासन में बैठने (पैरों को घुटनों से मोड़कर दोनों एड़ियों पर ऐसी बैठना कि उनके तलवों पर नितम्ब हों तथा अँगूठे परस्पर जुड़ें हों ) के बाद चित होकर पीछे की ओर भूमि पर लेट जायें | दोनों जंघाएँ परस्पर मिली रहें | श्वास छोड़ते हुए बायें हाथ का खुला पंजा दाहिने कंधे के नीचे और दाहिने हाथ का खुला पंजा बायें कंधे के नीचे इस प्रकार रखें कि सर दोनों हाथों की ऑटी (क्रॉस ) के ऊपर आये | ध्यान विशुद्धाख्य चक्र (कंठस्थान) में रखें |

सावधानी : रीढ़ के निचले भाग के रोगी तथा हड्डी की टी.बी. से पीड़ित व्यक्तियों को बिना किसी जानकार से पूछे इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए |

लोककल्याणसेतु – जनवरी २०१९ से

Saturday, January 19, 2019

साधना में अपनी उन्नति को स्वयं कैसे मापें ?


कितने ही साधक-भक्त ऐसे हैं जो लम्बे समय से साधना कर रहे हैं | साधना में प्रगति के लिए साधक के जीवन में स्वयं का मूल्यांकन आवश्यक है | साधक को खुद ही अपना आत्म-विश्लेषण करना चाहिए | जितना ठीक ढंग से हम स्वयं अपना निरिक्षण कर सकते हैं उतना अन्य नहीं कर सकता क्योंकि हम जितने अच्छे-से अपने गुण-दोषों, कमजोरियों से परिचित होते हैं, उतने अन्य व्यक्ति नहीं होते | जिज्ञासु साधकों को इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं ही खोजना चाहिए ताकि साधना में शीघ्र उन्नति हो :
१] साधना में रूचि दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है अथवा घट रही है या उदासीनता आ रही है ?

२] सत्संग सुनने के बाद उसे जीवन में उतारने की जिज्ञासा भी है या नहीं ?

३] ध्यान-भजन-सत्संग का लक्ष्य आपके लिए परमात्मा की प्राप्ति है या नश्वर संसार के क्षणभंगुर भोग ?

४] मंत्रदीक्षा के समय साधना की जो पद्धतियाँ बतायी गयी थीं, उनसे आप कितने लाभान्वित हुए हैं या वे याद ही नहीं हैं ?

५] संसार के प्रति आकर्षण कम हुआ है या ज्यों-का-त्यों बना हुआ है ?

६] शास्त्रवचन और संत-उपदेश में श्रद्धा है या नहीं ?

७] कही आप सेवा-साधना के बहाने प्रशंसा के रोग से तो ग्रस्त नहीं हो गये हैं ?

८] भोगों से मन उपराम हुआ है या अभी भी उनमें सुखबुद्धि बनी हुई हैं ?

९] त्रिकाल संध्या का नियम माह में कितनी बार पूर्ण करते हैं ? ध्यान-भजन और सेवा के लिए दिनभर में कितना समय देते हैं ?

१०] क्या कभी प्रभु के साथ एकाकार हो जाने की तड़प मन में उठती है ?

११] मंत्रजप करते-करते कहीं मनोराज में तो नहीं उलझ जाते हैं ?

१२] चित्त की चंचलता, मन की मनमुखता शांत होकर अंतर का आराम प्रकट हो रहा है या नहीं ?

१३] सुख में सुखी और दुःख में दु:खी होने की प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर आप अग्रेसर हो रहे हैं या नहीं ? सुख-दुःख में सम हो रहे हैं या नहीं ?

१४] सत्संग में जाने के बाद सत्संग का, मनुष्य-जीवन का महत्त्व समझ में आया है अथवा रोजी-रोटी के लिए ही जीवन पूरा हो रहा है ?

१५] जीवन में निर्भयता, निश्चिंतता, प्रसन्नता जैसे उन्नति के परम गुणों का प्रादुर्भाव (प्राकट्य) हो रहा है ?

१६] मौन, एकांत, अनुष्ठान के प्रति रूचि कितनी है ?

१७] उद्वेग के प्रसंग में आप कितना धैर्य और संयम रख पाते हैं ?

अपने जीवन में किसी प्रकार की कमियाँ दिखें तो सुबह १०-१२ प्राणायाम करके उन कमियों को निकालने के लिए सद्गुणों का विचार करने से आपके दुर्गुण धीरे-धीरे निवृत्त होते जायेंगे एवं ह्रदय सद्गुणों से भरता जायेगा | सद्गुणों के विकास से सर्वगुणसम्पन्न परमात्मा का दीदार (अनुभव) करना भी आसान होता जायेगा |

                   लोककल्याणसेतु – दिसम्बर २०१८ से