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Monday, November 18, 2019

इन खाद्य पदार्थों को भिगोकर पा सकते हैं अधिक पौष्टिकता


यहाँ कुछ ऐसे पदार्थ दिये जा रहे है जिनका सेवन भिगोकर करने से वे सुपाच्य व विशेष गुणकारी बनते हैं | भिगोये हुए इन पदार्थों में पोषक तत्त्वों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होती है | परन्तु आयुर्वेद में अंकुरित अनाज के सेवन को अनेक प्रकार के दोषों को उत्पन्न करनेवाला बताया गया है इसलिए भिगोये हुए पदार्थो को अंकुरित होने से पहले ही सेवन करें |

काले चने
भिगोये हुए काले चने बलवर्धक, पित्तशामक, वातवर्धक तथा शुक्र धातु को गाढ़ा करनेवाले होते हैं | इनमें प्रोटीन भी भरपूर होते हैं, जो मांसपेशियों को मजबूत बनाने में सहाय्यक हैं |
v  उत्तम पाचनशक्तिवाले व्यक्ति २५-३० ग्राम देशी काले चने १०-१५ ग्राम त्रिफला चूर्ण के साथ १ गिलास पानी में शाम को मिट्टी के बर्तन में भिगवा दें | सुबह चने खूब चबा-चबाकर खायें | ऐसा ४० दिन करने से रक्त शुद्ध हो जायेगा और धातुएँ पुष्ट होंगी | चने खाने से पूर्व थोड़ी कसरत कर लेना उत्तम होता है |
v भोगोये हुए चने के जल में शहद मिलाकर पीने से वीर्य-स्तम्भन शक्ति में वृद्धि होती है| नपुंसकता में लाभ होता है | स्वरशुद्धि होती है तथा मूत्र खुलकर आता है |

मेथीदाना              
मेथीदाना कब्ज को दूर क्र आँतों को साफ़ रखने में मदद करता है | यह कैल्शियम का उत्तम स्त्रोत है | यह जोड़ों का दर्द व मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद है | मासिक धर्म के समय होनेवाली पीड़ा को भी यह कम करता है |
v  २ चम्मच मेथीदाना २०० मि.ली. पानी में रातभर भिगोकर रखें | सुबह धीमी आँच पर आधा पानी शेष रहने तक उबाले | छानकर मेथीदाना खायें व जल गुनगुना रहने पर २ चम्मच शुद्ध शहद मिला के पियें | दिनभर शक्ति व स्फूर्ति बनी रहेगी |
मधुमेहवाले शहद का उपयोग न करें |

मनुक्का एवं किशमिश
मुनक्के के नित्य सेवन से थोड़े ही दिनों में रस, रक्त, शुक्र आदि धातुओं तथा ओज की वृद्धि होती है | इसमें मैग्नेशियम, पोटैशियम व लौह तत्त्व काफी मात्रा में होते हैं | पथरी के मरीजों के लिए मुनक्का फायदेमंद है |

v किशमिश दूध की अपेक्षा शीघ्र पचती है | दूध के लगभग सभी तत्त्व किशमिश में पाये जाते हैं | इसमें एंटी ऑक्सीडेंटस भरपूर मात्रा में होते हैं | रात्रि को भिगोयी हुई किशमिश या मुनक्के को सुबह नियमितरूप से खाने से त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनती है |

v  किशमिश और मुनक्के खून की कमी से पीड़ित मरीजों के लिए फायदेमंद है | मुनक्के बीजसहित खाने चाहिए |

 ऋषिप्रसाद – नवम्बर २०१९ से

Thursday, November 14, 2019

व्यर्थ चिंतन से बचने के लिए


इस जगत की मिथ्या चीजों को महत्त्व नहीं दो | ‘इसने ऐसा क्यों किया, वैसा क्यों किया....’ नहीं, शान्तोहं.... आनन्दो हं.... | व्यर्थ के चिंतन से बचने के लिए ॐकार का दीर्घ गुंजन करें और सेवा खोज लें | अच्युत का सुमिरन करें | - पूज्य बापूजी

लोककल्याण सेतु – नवम्बर २०१९ से 

Thursday, October 31, 2019

नॉर्मल डिलीवरी हेतु रामबाण प्रयोग


ब्रह्मज्ञानी संत श्री आशारामजी बापू अपने सत्संगो में सामान्य प्रसूति के लिए रामबाण प्रयोग बताते हैं : “सामान्य प्रसूति में यदि कहीं बाधा जैसी लगे तो देशी गाय के गोबर का १०-१२ ग्राम ताजा रस निकालें,  गुरुमंत्र का जप करके अथवा ‘नारायण.... नारायण.....’ जप करके गर्भवती महिला को पिला दें | 

एक घंटे में प्रसूति नहीं हो तो वापस पिला दें | सहजता से प्रसूति होगी | अगर प्रसव-पीड़ा समय पर शुरू नहीं हो रही हो तो गर्भिणी ‘जम्भला... जम्भला....’ मंत्र का जप करे और पीड़ा शुरू होने पर उसे गोबर का रस पिलायें तो सुखपूर्वक प्रसव होगा |’

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

Wednesday, October 30, 2019

असाध्य रोग का रामबाण इलाज



कोई बीमार व्यक्ति हो और डॉक्टर, वैद्य बोले, ‘यह नहीं बचेगा’ तो वह व्यक्ति गाय को अपने हाथ से कुछ खिलाया करे और गाय की पीठ पर हाथ घुमाये तो गाय की प्रसन्नता की तरंगे हाथों की उँगलियों के अग्रभाग से उसके शरीर के भीतर प्रवेश करेंगी, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी और वह व्यक्ति तंदुरुस्त हो जायेगा; ४ से ६ महीने लगते हैं लेकिन असाध्य रोग भी गाय की प्रसन्नता से ठीक हो सकता है | - पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

देशी गाय के गोबर के लाभ


८४ लाख योनियों के प्राणियों में गाय ही एक ऐसा प्राणी है जिसका गोबर (पुरीष) मल नहीं है बल्कि उत्कृष्ट कोटि का मलशोधक, रोगाणु-विषाणुनाशक तथा लाभकारी जीवाणुओं का पोषक है |
१] गोबर व गोमूत्र से पृथ्वी की उत्पादन शक्ति बढती है |
२] गोबर सभी प्रकार के चर्मरोगों की श्रेष्ठ औषधि है |
३] जले हुए भाग पर स्वस्थ गाय के गोबर का रस लगाना लाभकारी है |
४] गोबर में परमाणु विकिरण व आकाशीय विद्युत् को रोकने की क्षमता है |
५] दीवारों, आँगन, चूल्हे पर इसका लेप करने से सभी प्रकार के कीटाणुओं व रेडिओधर्मिता के प्रभाव से बचा जा सकता है |
६] गोबर में ऐसी क्षमता है कि यदि कूड़े-कचरे के ढेर में इसका घोल डाला जाय तो ३-४ महीने में उसकी उपयोगी खाद बन जाती है |
७] इसके कंडो को ईंधन के रूप में जलाने के बाद बची हुई राख एक उत्तम कीटनाशक व खाद है | खेतों में राख पड़ने से दीमक आदि  कीड़े नहीं पनपते तथा फसल अच्छी होती है |
८] गोबर के कंडों की राख बर्तनों की सफाई में उपयोगी है | क्लीनिंग पाउडर से बर्तन साफ़ करने पर हाथों में चर्मरोग होने का खतरा रहेगा और यदि ठोड़ी भी मात्रा में पाउडर बर्तनों में लगा रह जाता है तो शरीर को हानि पहुंचेगी | गोबर के कंडे की राख से बर्तनों को जो पवित्रता मिलती है वह क्लीनिंग पाउडर आदि से नहीं मिलती है |

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

दिव्य औषधि : गोमूत्र


गोमूत्र सभी रोगों, विशेषकर गुर्दे, यकृत, पेट के रोग, कुष्ठरोग, ह्रदयरोग, दमा, पीलिया, प्रेमह, मधुमेह, अजीर्ण तथा जलोदर के लिए रामबाण औषधि है | इसमें २४ प्रकार के रसायन जैसे – पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, फ्लोराइड, यूरिया, अमोनिया, लौह तत्त्व, ताम्र तत्त्व, सल्फर, लैक्टोज आदि पाये जाते हैं | २५ जून २००२ को भारत लप गोमूत्र का पेटंट मिला | आज सम्पूर्ण विश्व में एंटी-कैंसर ड्रग तथा सर्वोत्तम एंटीबायोटिक एवं हानिरहित सर्वोत्तम कीटकनाशक गोमूत्र है | यह महौषधि है |

भावप्रकाश के अनुसार ‘गोमूत्र तीखा, तेज, उष्ण, क्षार (खारा), कड़वा, कसैला, लघु (पचने में हलका), जठराग्नि-प्रदीपक, मेधा के लिए हितकर, पित्तकारक तथा कफ-वातशामक है | यह शूल (दर्द), गुल्म (उदरस्थ गाँठ), उदररोग, कब्ज, खुजली, कृमि, अतिसार, अफरा, नेत्ररोग, वस्ति संबंधी रोग, मुख के रोग, कुष्ठ, वातरोग, आम, मूत्र-संबंधी रोग, त्वचा-विकार, खाँसी, श्वास (दमा), सूजन, पीलिया तथा पांडूरोग (अनामिया) को नष्ट करता हैं |’

गोमूत्र विषनाशक है | यह विषाक्त भोजन या औषधि के विष को अथवा मानसिक विषादजन्य विष को समाप्त करता है, घाव में पैदा होनेवाले मवाद को सुखाता है | यह सडनरोधी (एन्टीसेफ्टिक) व रोगाणुरोधक (एन्टीबायोटिक) तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है | गोमूत्र में विटामिन ‘बी’ तथा कार्बोलिक एसिड होता है जो रोगाणुओं का नाश करता है | ताजा गोमूत्र सर्वोत्तम है | इसे रखना हो तो काँच के बर्तन में ८ पर्तवाले सूती कपड़े से छानकर रखना चाहिए | यदि गोमूत्र नहीं मिले तो गोमूत्र अर्क का सेवन करें |

गोमूत्र से आँखों को धोने से उनकी ज्योति वृद्धावस्था तक बनी रहती है | इसके सेवन से पेट के कीड़े  मर जाते हैं | इसलिए प्रसूता स्त्री के लिए इसका सेवन महत्त्वपूर्ण बताया गया है | गोमूत्र को गुनगुना करके कान में डालने से कान का बहना बंद हो जाता है | काली गाय के मूत्र को १५ दिन तक पीने से गले में सुंदर स्वर उत्पन्न होता है |

अमेरिकन डॉ, क्रॉफोर्ड हैमिल्टन का कहना है कि, ‘कुछ दिनों तक गोमूत्र के सेवन से धमनियों में रक्त का दबाव सामान्य होने से ह्रदयरोग दूर होता है | इसके सेवन से भूख बढती है तथा पेशाब खुलकर होता है | यह गुर्दे की विफलता की उत्तम औषधि है |’

ध्यान दें : गोमूत्र देशी गाय का ही होना चाहिए, बैल आदि या जर्सी, होल्सटीन आदि विदेशी पशुओं का नहीं.

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

गाय के रंग का उसके दूध पर प्रभाव


काली गाय का दूध अग्निमांद्यजनित रोगों का नाशक, उत्तम वातनाशक तथा अधिक गुणवान होता है | पीली गाय का दूध वात-पित्तशामक होता है | श्वेत गाय का दूध कफकारक तथा पचने में भारी होता है परंतु उसमें सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, पिप्पलीमूल, हल्दी आदि डालकर पीने से वह त्रिदोषशामक व सुपाच्य हो जाता होता है | यह रोगों से रक्षा करता है |

गोदुग्ध-सेवन संबंधी सावधानी :  गोदुग्ध हमेशा छानकर ही पीना चाहिए, अन्यथा उसमें आया गाय का रोम पेट में जा सकता है जो बहुत ही हानिकारक है | इससे रोग हो सकते हैं और पुण्यों का नाश होता है |

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

जठराग्निवर्धक गोतक (मट्ठा )



यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमाहु: ||

‘जिस प्रकार देवताओं के लिए सुखकारी अमृत है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को सुखकारी तक्र है |’ (भावप्रकाश निघंटु)

दही में चौथाई भाग पानी मिलाकर मथने से तक्र तैयार होता है | इसे मट्ठा भी कहते हैं | ताजा मट्ठा सात्त्विक आहार की दृष्टी से श्रेष्ठ द्रव्य है | यह जठराग्नि प्रदीप्त कर पाचन-तंत्र कार्यक्षम बनाता है | अत: भोजन के साथ तथा पश्चात मट्ठा पीने से आहार का ठीक से पाचन हो जाता है | जिन्हें भूख न लगती हो, खट्टी डकारें आती हों और पेट फूलने-अफरा चढने से छाती में घबराहट होती हो, ठीक से पाचन न होता हो उनके मट्ठा अमृत के समान है |

मक्खन निकाला हुआ तक्र पथ्य अर्थात रोगियों के लिए हितकर तथा पचने में हलका होता है | मक्खन नहीं निकाला हुआ तक्र भारी, पुष्टिकारक एवं कफजनक होता है | वातदोष की अधिकता में सोंठ व सेंधा नमक मिला के, कफ की अधिकता में सोंठ, काली मिर्च व पीपर मिलाकर तथा पित्तजन्य विकारों में मिश्री मिला के तक्र का सेवन करना लाभदायी है |

दही को मथकर मक्खन निकाल लिया जाय और अधिक मात्रा में पानी मिला के उसे पुन: मठ जाय तो छाछ बनती है | यह शीतल, हलकी तथा वात-पित्त एवं प्यास का शमन करनेवाली और कफ बढ़ानेवाली होती है |

ताजे दही को मथकर उसी समय मट्ठे का सेवन करें | ऐसा मट्ठा दही से कई गुना अधिक गुणकारी होता है | देर तक रखा हुआ खट्टा व बासी मट्ठा हितकर नहीं है | ताजे दही का अर्थ है – रात को जमाया हुआ दही, जिसका उपयोग सुबह किया जाय एवं सुबह जमाया हुआ दही, जिसका सेवन मध्यान्हकाल में अथवा सूर्यास्त के पहले किया जाय | सायंकाल के बाद दही या छाछ का सेवन नहीं करना चाहिए |

सावधानी : दही या मट्ठा ताँबे, काँसे, पीतल एवं एल्युमिनियम के बर्तन में न रखें | दही बनाने के लिए मिट्टी अथवा चाँदी के बर्तन विशेष उपयुक्त हैं, स्टील के बर्तन भी चल सकते हैं |

अति दुर्बल व्यक्तियों को तथा क्षयरोग, मूर्च्छा, भ्रम, दाह व रक्तपित में तक्र का उपयोग नहीं करना चाहिए | उष्णकाल अर्थात शरद और ग्रीष्म ऋतुओं में तक्र का सेवन निषिद्ध है | इन दिनों यदि तक्र पीना ही हो तो जीरा व मिश्री मिला के ताजा व कम मात्रा में लें | 

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

विशिष्ट गुणों से युक्त दही


सब प्रकार के दहियों में गाय के दूध से बना दही श्रेष्ठ और अधिक गुणकारी है | आयुर्वेद शास्त्र ‘भावप्रकाश निघंटु’ में आता है कि ‘गाय के दूध से बना दही सब प्रकार के दहियों में श्रेष्ठ, विशिष्ट गुणोंवाला, रूचि एवं भूख वर्धक, ह्रदय को बल देनेवाला, पुष्टिकारक व वातशामक है |’

रुसी जीव वैज्ञानिक एली मेचनीकोफ़ ने दही पर अनेक प्रयोग करने पर पाया कि दही में दूध के अम्ल से उत्पन्न सूक्ष्म जीवाणु आँतो में विषाणुओं की उत्पत्ति को रोकते हैं | दही भूख तथा पाचनशक्ति को बढ़ता है | अतिसार का उपचार दही से तत्काल होता है | दही से कैंसर की भी चिकित्सा होती है |

ध्यान दें : उपरोक्त गुण पूरी तरह जमे हुए ताजे व खटासहित दही में होते हैं |

सेवन-विधि : दिन में जब भी दही खाना हो तो गाय का घी, मिश्री, मूँग, शहद, आँवला-इनमें से किसीके साथ खायें | दही में नमक नहीं मिलायें | रात्रि में दही नहीं खाना चाहिए |

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

बलवर्धक मलाई



दूध की मलाई बहुत पौष्टिक और शक्तिवर्धक होती है | आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भावप्रकाश निघंटु’ के अनुसार ‘मलाई भारी, शीतल, तृप्तिकारक, वीर्यवर्धक तथा पित्त-रक्तविकार और वात को दूर करनेवाली, पुष्टिदायी, स्निग्ध तथा कफ, बल, शुक्र एवं रस-रक्तादि वर्धक होती है |’

मलाई में पीसी मिश्री मिलाकर सुबह खाली पेट खाने से शरीर पुष्ट, सुडौल और शक्तिशाली होता है | इसके सेवन से पेट की जलन, वायु-प्रकोप (गैस), पित्त-प्रकोप, प्यास और पेट में बढ़ी हुई गर्मी का शमन होता है | चेहरे की त्वचा पर मलाई का लेप लगाने से त्वचा कांतिपूर्ण, चिकनी, मुलायम और स्वस्थ रहती है | दुध पीते समय मलाई हटानी नहीं चाहीए | सोने के दो घंटे पहले मलाई के साथ ही दूध पीना चाहिए | दूध और मलाई मिलकर बहुत पौष्टिक और शक्तिवर्धक आहार बन जाता है |

सावधानी : कफ, खाँसी, अपच व कब्ज के रोगी को मलाई का सेवन नहीं करना चाहिए |

लोककल्याण सेतु –अक्टूबर २०१९ से

गौर वर्ण व ओजस्वी-तेजस्वी संतान हेतु


काश्यप ऋषि ने कहा है :
श्वेताया: श्वेत पुं वत्साया गो: क्षीरणे | (का.शा. : १९)

यदि गर्भवती माताएँ श्वेत रंग के बछड़ेवाली श्वेत गाय के दूध का चाँदी के पात्र में सेवन करें तो उनको दीर्घायु, गोरे तथा ओजस्वी, तेजस्वी व स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है |

राजस्थान की एक गोपालक संस्था द्वारा यह प्रयोग २५०० महिलाओं पर किया गया | सभीकी सही समय पर प्रसूति हुई | किसी भी महिला को सिजेरियन डिलीवरी (शल्यक्रिया द्वारा प्रसूति) नहीं करवानी पड़ी | सभीके शिशु ओजस्वी, तेजस्वी व स्वस्थ पैदा हुए |

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से

ग्रहबाधा व वास्तुदोष दूर करने का अचूक उपाय


आजकल वास्तुदोष-निवारण के नाम पर तीन टॉग के कछुआ, मेंढक की मूर्ति घरों में रखने का रिवाज चल पड़ा है | यह तथाकथित फेंगशुई चीनी गृहसज्जा करना है | यदि भवन में किसी भी प्रकार का वास्तुदोष है तो उसमें एक देशी गाय रख लें, समस्त वास्तुदोष दूर हो जायेंगे | यदि गाय पालना सम्भव न हो तो ड्योढ़ी (दहलीज या द्वार के पास की भूमि) अथवा आँगन में सवत्सा (बछड़ेवाली) गाय का चित्र लगा लें और घर में गोमूत्र या गोमूत्र अर्क का छिड़काव करें |

शनि, राहू-केतु आदि ग्रहों के दोष-निवारण के लिए प्रत्येक मंगलवार या शनिवार को अपने हाथ से आटे की लोई गुड़सहित प्रेमपूर्वक किसी नंदी अथवा गाय को खिलायें | कैसी भी ग्रहबाधा हो, दूर हो जायेगी |

लोककल्याण सेतु – अक्टूबर २०१९ से